वैज्ञानिक अन्धविश्वास बनाम धार्मिक अन्धविश्वास


अक्सर किसी तथ्य को लेकर विज्ञान और आध्यात्म आमने सामने होते हैं लेकिन ऐसी किसी परिस्थिति में विज्ञान को ही पूर्ण सत्य मानना भी एक प्रकार का अन्ध विश्वास है । विज्ञान सामयिक विश्लेषण है अंतिम सत्य नहीं ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार अन्ध विश्वास एक सामयिक भ्रम हो सकता है पर निश्चित रूप से असत्य नहीं ।

“टालेमी” के सिद्धान्त किसी समय खगोल विद्या के अंतिम सत्य माने थे पर आज के ब्रह्माण्ड वैज्ञानिकों एवं अत्याधुनिक वेधशालाओं ने उसे झूठा साबित कर दिया है । आज तो स्थिति ये है कि जहाँ कहीं विज्ञान की पुस्तकों में “डाल्टन की एटामिक थ्योरी” पढ़ाते समय बेचारे विज्ञान के लेक्चरार भी अनुभव करते हैं कि हम विद्यार्थियों को एक खण्डित हो गया सिद्धान्त केवल इसी लिये पढ़ाते हैं कि वह इस पाठ्यक्रम में शामिल है ।

परमाणु अब सबसे छोटा ज्ञात कण नहीं रह गया बल्कि यह सिद्धान्त अब उससे कहीं आगे निकल चुका है | पदार्थ विज्ञान अब पार्टिकल एंड एण्टी पार्टिकल के सिद्धान्त तक जा पहुँचा है | जेनेवा की लार्ज हेड्रोंन कोलाईडर (Large Hadron Collider) नित नयी संभावनाएं प्रस्तुत कर रही है | फिर भी अगर वही पुरानी पढ़ाई विज्ञान के पाठ्यक्रम में पढाई जाए तो उसे वैज्ञानिक अंधविश्वास नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा ।

जीव विकास शास्त्री मनुष्य को एक कोशीय जीव से विकसित जन्तु मानते हैं । “दि ओल्ड राइडिल एण्ड दि न्यूएस्ट एन्सर” पुस्तक के पेज 64 में डॉ॰ जे हक्सले ने कुछ अस्थिपंजरों द्वारा सिद्ध किया है कि यह घोड़े के जातियों वाले मनुष्य के पूर्वज है ।

उसकी यह प्रतिस्थपना ही मनुष्य के विकास का सिद्धांत बन गया ।और उसके बाद सर डासन ने एक पुस्तक लिखी “मार्डन आइडिया आफ इवोलेशन” नामक इस पुस्तक के पेज नंबर 116 में उन्होंने प्रमाण देकर हक्सले के सिद्धांत को गलत सिद्ध कर दिया । उसे मुख्य धारा के वैज्ञानिकों ने माना भी लेकिन हक्सले का सिद्धान्त अभी भी अपने स्थान पर टिका हुआ है ।

इससे पता चलता है कि आज का विज्ञान वस्तुतः अन्ध विश्वास से भरा हुआ है और इस कम्युनिस्ट मान्यता पर टिका हुआ है कि सच्चाई कुछ भी हो लेकिन प्रचार इतना अधिक करो कि झूठ भी सच साबित हो जाये । वस्तुतः यही आज हमें चारो तरफ देखने को मिल रहा है |

विख्यात वैज्ञानिक और महान् लेखक डॉ॰ विलियम ली हावर्ड ने एक “रोगमुक्त करने की क्षमता” पर पुस्तक लिखी जिसमे उन्होंने ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान को-अन्धा-बहरा-लूला और लंगड़ा बनाने वाला लिखा |

उन्होंने जोर दे कर इस तथ्य को लिखा कि ये औषधियां सन्देशवाहक तंत्रिकाओं तथा उनके प्रमुख स्टेशनों को नष्ट कर डालती है | प्रमाण स्वरुप उन्होंने उसके सैकड़ों उदाहरण देकर इस दावे को सिद्ध भी किया ।

“एनसाइक्लोपीडिया अमेरिकाना” कि लेखक डॉ॰ ओस्लर ने भी एलोपैथी के सिद्धांतों का खंडन करते हुये लिखा है कि रोग को औषधियां नहीं उपवास, व्यायाम, स्नान मालिश आदि विजातीय द्रव्य हटाने वाले साधन ही ठीक करते हैं फिर भी इसे आज का बुद्धिवादी अन्ध विश्वास ही कहना चाहिये कि दिनों दिन उसी हानिकारक चिकित्सा पद्धति पर लोगों का विश्वास बढ़ता चला जा रहा है ।

आज के इस अन्ध विश्वास को, जिसने सभ्यता का रूप ले लिया उस पर हँसी आती है, उधर प्राचीन अंधविश्वासों के पीछे खड़ा सत्य व्यक्त होने के लिये रो रहा है । इस धमा चौकड़ी में अंतिम विजय किसकी होगी यह निश्चित करना आज के युग के विद्वानों पर है वही इस समस्या का कुछ समाधान प्रस्तुत करेंगे अन्यथा वैज्ञानिक अन्ध विश्वास, धार्मिक अन्ध विश्वास से कही अधिक पतन और संकट का कारण हो सकता है ।