समुद्र मंथन

समुद्र मंथन

समुद्र मंथन की कहानी

पौराणिक काल की समुद्र मंथन की कहानी वास्तव में वह रहस्यमय कथा है जिसका रहस्य समुद्र से भी अधिक गहरा है। कभी-कभी इस घटना को काल्पनिक मानने का मन करता है। क्योंकि समुद्र मंथन में जिन भी घटनाओं का वर्णन किया गया है वह असंभव सी प्रतीत होती है लेकिन जब उनकी सच्चाई के जीते-जागते प्रमाण हमारी पृथ्वी पर मिलते हैं तो मन इस अदभुत घटना को सच मानने  के लिए विवश हो जाता है़।

आज हम आपको इस समुद्र मंथन की दिलचस्प कथा से आपका विस्तार से परिचय कराते हैं, जिसमें भगवान विष्णु ने वह चमत्कारी लीला दिखायी जिसे, जिस किसी ने भी देखा दंग गया। यह वह समय था जब ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण देवताओं की शक्ति क्षीण होती जा रही थी। दैत्यराज बालि ने देवलोक पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। असुरों ने तीनो लोक में त्राहि-त्राहि मचा रखी थी।

ऐसे में देवताओं को एक ऐसे उपाय की आवश्यकता थी ताकि वे अपनी खोयी हुई शक्ति फिर से पा सकें और उनका अपना खोया हुआ स्वाभिमान उन्हें पुनः प्राप्त हो सके। क्योंकि अब देवतागण असुरों के अत्याचार से तंग आ गये थे। इस गंभीर समस्या के समाधान पाने हेतु मंत्रणा करने के लिए देवताओं ने एक बैठक बुलाई। काफी समय तक इस विषय पर विचार विमर्श चला कि हम देवता किस प्रकार फिर से, असुरों से अधिक बलिशाली बन सकते हैं ताकि देवता अपना खोया हुआ साम्राज्य फिर से प्राप्त कर सकें।

लेकिन बैठक में कोई उपाय न निकल सका। तब देवगणों ने आपस में विचार-विमर्श किया कि क्यों न बैकुंठ धाम में निवास करने वाले विष्णु जी के पास चला जाये। वही देवताओं को इस भारी संकट से बाहर निकाल सकते हैं। इस निर्णय के अनुसार सभी देवता गण ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु के पास पहुंचे। इससे पहले कि भगवान विष्णु के सामने देवता गण अपनी समस्या को रखते वह पहले ही मुस्कुराने लगे।

तब देवताओं ने इस बात का अनुमान लगा लिया कि विष्णु जी को उनकी समस्या का पहले से ही ज्ञान है। बल्कि उन्हें इस बात का भी पूर्वानुमान था कि आज ब्रह्मा जी के साथ सभी देवतागण उनसे मिलने आ रहे हैं। अब सभी देवता लोग अपना हाथ जोड़कर भगवान विष्णु के सामने खड़े हुए। असुरों के भय से ग्रस्त किसी देवता के मुख से कोई शब्द नहीं निकल रहा था।

जब विष्णु भगवान ने देखा कि सारे देवता गण मौन है तो वह खुद ही बोल उठे, “क्यों न आप सभी लोग देवता गण, असुरों से मैत्री कर लें।” विष्णु जी के मुख से यह बात सुनकर सभी देवता गण आश्चर्यचकित रह गए। वह सभी एक दूसरे का मुंह देखने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि विष्णु जी देवताओं के सामने दैत्यों से इस प्रकार मैत्री करने का परामर्श क्यों दे रहे हैं?

समुद्र मंथन का सुझाव भगवान विष्णु ने दिया

देवराज इंद्र एकाएक बोल उठे,  “हे नारायण ! आप यह क्या कह रहे हैं? हमें राक्षसों से मैत्री करने की सलाह दे रहे हैं ?” तब भगवान विष्णु ने बड़े ही रहस्य भाव से कहा कि आप देवताओं को यह नहीं मालूम की इसी मित्रता में आपकी सारी  चिंता से मुक्ति का उपाय छिपा है। भगवान विष्णु की बात सुनकर सभी देवता चौंक उठे। उन्हें भगवान विष्णु की गोल मोल बात समझ में नहीं आ रही थी।

तब विष्णु जी ने बताया कि देवताओं को पुनः शक्ति पाने का जो रास्ता है वह बहुत कठिन है। जिस लक्ष्य को पाने के लिए काफी शक्ति की आवश्यकता है। विष्णु जी ने आगे बताया कि आप देवता लोगों की शक्ति इस समय दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण क्षीण हो चुकी है। इसलिए अपनी शक्ति को पुनः पाने के लिए आप लोगों को असुरों की सहायता लेनी होगी तभी यह कार्य सिद्ध होगा।

विष्णु जी का यह तर्क सुनकर देवतागण फिर आश्चर्य से एक दूसरे का मुंह देखने लगे। देवता गण यह सोच रहे थे कि हमारे प्रबल शत्रु असुर हमारी सहायता क्यों करने लगे। फिर विशेष रूप से उस कार्य के लिए जिस कार्य से हमें शक्ति प्राप्त होने वाली हो। विष्णु जी ने देवताओं की जिज्ञासा को शांत करने के लिए कहा कि मेरी बात ध्यान से सुनिए, तब अपनी बात मुझसे कहिए। आप देवताओं की क्षीण शक्ति को पुनः बल प्रदान करने के लिए मैं अपनी संपूर्ण योजना आप सबके सम्मुख रख रहा हूं।

विष्णु जी ने आगे बताया कि आप देवताओं को इस भारी संकट से उबरने के लिए समुद्र मंथन करना होगा। समुद्र मंथन से निकलने वाले अमृत को पीकर सभी देवतागण अमरत्व को प्राप्त कर लेंगे। तब देवताओं ने यह प्रश्न उठाया कि हमें अमरता प्रदान करने के लिए असुर हमारी सहायता क्यों करेंगे।

तब विष्णु जी ने कहा कि समुद्र मंथन से पूर्व असुरों को यह बताना होगा इस समुद्र मंथन से निकलने वाले अमृत को उनको भी बांटा जाएगा। जिससे की वे भी अमरता को प्राप्त कर लेंगे। विष्णु जी की बात पर देवतागण बोल उठे तो क्या असुरों को भी अमरत्व प्रदान कराना है? देवताओं के इस प्रश्न पर विष्णु जी ने अपनी एक अंगुली अपने होठों पर इस प्रकार रखी जैसे की वह देवताओं को इस बात पर चुप रहने के लिए कह रहे कह रहे हों।

विष्णु जी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी। उनकी इस रहस्यमयी मुस्कान के पीछे असुरों को अमृत देने का लालच देकर उनके साथ छल करने का भाव था। लेकिन देवतागण जानते थे कि असुरों के साथ छल करना इतना आसान नहीं है। उन्हें इस प्रकार अमृत का लालच देकर फिर उनके मुख से अमृत का प्याला छीन लेना उन्हें असंभव प्रतीत हो रहा था। लेकिन फिर सभी देवताओं ने सोचा कि भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन का रास्ता दिखाया है। वही इस समस्या को आगे भी संभालेंगे।

समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा, यह सुन कर असुर भी तैयार हो गए

भगवान विष्णु की योजना के अनुसार उस समय तीनों लोकों में राज्य करने वाले असुरों के राजा बलि को समुद्र मंथन की सारी योजना से अवगत कराया गया। योजना के अनुसार असुरों को इस बात का आश्वासन दिया गया कि समुद्र मंथन से निकलने वाले अमृत का पान उन्हें भी कराया जाएगा। अमृत का लालच पाकर असुरगण समुद्र मंथन में देवताओं की सहायता के लिए तैयार हो गए।

अब इतने विशाल समुद्र को दही की तरह मथ पाना किसी भी तरह से आसान नहीं था। जिस प्रकार दही से मक्खन (नवनीत) निकालने के लिए उसे मथनी से मथा जाता है उसी प्रकार समुद्र को मथकर उसमें से अमृत निकालने के लिए विशाल मथनी की आवश्यकता थी। तब यह विचार किया गया कि समुद्र को मथने के लिए इतनी इतनी विशाल मथनी ही नहीं है, कहां से लाई जाए ऐसी मथनी ?

समुद्र मन्थन के लिए मथनी और रस्सी के रूप में मंदराचल पर्वत और नागराज वासुकि को प्रयोग करने का सुझाव भगवान् विष्णु ने दिया

तभी उपाय निकाला गया कि मंदराचल पर्वत को मथनी बनाकर उसमें वासुकी नाग को रस्सी की तरह बांधा जाएगा। फिर उसके बाद एक ओर से देवता गण और दूसरी ओर से असुर उसे खींचेंगे। जिसके कारण मंदराचल पर्वत तेज गति से चारों ओर घूमेगा और समुद्र में क्षोभ उत्पन्न होगा। जिसके कारण समुद्र के अंदर से अमृत निकल आएगा। समुद्र मंथन के लिए मथानी और रस्सी के रूप में मंदराचल पर्वत और नागराज वासुकि को प्रयोग करने का विचार भी भगवान विष्णु ने ही दिया जिसे सभी ने स्वीकार कर लिया।

समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले 

निर्धारित तिथि और समय पर समुद्र मंथन आरंभ हुआ। एक-एक करके इस समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। यद्यपि इसके प्रारम्भ में न तो देवताओं को और न ही असुरों को इस बात का अंदाज़ा था की इस समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकलेंगे। उन्हें लगा की इस समुद्र मंथन से केवल अमृत ही निकलेगा जिसकी उन सभी को लालसा थी किन्तु ऐसा नहीं हुआ।

समुद्र मंथन से केवल अमृत ही नहीं बल्कि चौदह रत्न निकले। यह वह अद्भुत घटना थी जिसे सृष्टि के सारे जीव-जंतु आश्चर्य से देख रहे थे। देवराज इंद्र के साथ देवता गण और दैत्यों के राजा बाली के साथ असुर अपनी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। इस समुद्र मंथन में रस्सी की तरह मंदराचल पर्वत पर लिपटे हुए वासुकी नाग के मुख की तरफ असुर और पूछ की तरफ देवता लोग थे। दोनों अपनी पूरी शक्ति के साथ समुद्र मंथन कर रहे थे।

समुद्र मंथन का पहला रत्न हलाहल विष था 

अमृत के लालच में असुर और देवताओं के पक्ष के सारे लोग समुद्र मंथन में हिस्सा ले रहे थे। दोनों पक्षों को यह आशा थी कि उनके समुद्र मंथन करते ही अमृत निकलने लगेगा। लेकिन सबसे पहले अमृत के स्थान पर निकला विष, महा भयंकर हलाहल विष। यह समुद्र मंथन का पहला रत्न था।

उस विष का प्रभाव इतना भयंकर था कि उसके निकलना शुरू होते ही वहाँ कोहराम मच गया। अब असुर और देवता सोंचने लगे कि इस नए संकट से किस तरह उबरा जाये। अब समुद्र मंथन से निकलने वाले उस महा भयंकर विष का क्या किया जाये? यदि यह विष चारों ओर फैल गया तो इस सृष्टि के सारे जीव जंतु मृतप्राय हो जाएंगे।

तब असुरों और देवताओं ने, एक से बढ़कर एक, विषैले सर्पों को अपनी जटाओं में धारण करने वाले भगवान शिव से यह प्रार्थना की, कि उन्हीं में यह क्षमता है कि किसी प्रकार से समुद्र मंथन से निकलने वाले इस महा भयंकर हलाहल विष से उन्हें और सम्पूर्ण जीव जगत को मुक्ति दिलायें।

असुरों और देवताओं की प्रार्थना को स्वीकार कर भगवान शिव ने समुद्र से निकलने वाले विष को अपनी अपनी अंजुलि में ले लिया और उस भयंकर विष को अपने कंठ में उतार लिया। क्योंकि उन्हें सृष्टि के समस्त जीव जंतुओं की रक्षा करनी थी। सभी असुर भगवान शंकर की अद्भुत लीला को देखकर आश्चर्यचकित रह गए।

समुद्र मंथन की दूसरी रत्न कामधेनु गाय थी 

इस अति भयंकर घटनाक्रम से पस्त हुए असुरों और देवताओं का भगवान विष्णु ने उत्साह बढ़ाया और असुर तथा देवता गण एक बार फिर समुद्र मंथन में जुट गए। देवता और असुर दोनों पक्षों का यही सोचना था कि विष तो निकल चुका है इस बार अमृत ही निकलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ इस बार समुद्र मंथन में कामधेनु गाय निकली। जिसे ऋषि-मुनियों ने अपने लिए मांग लिया। यह समुद्र मंथन की दूसरी रत्न थी।

समुद्र मंथन का तीसरा रत्न उच्चैश्र्वा घोड़ा था 

असुरों को तो केवल अमृत की इच्छा थी। उन्होंने सहर्ष कामधेनु गाय को ऋषियों को दे दिया। कामधेनु गाय वह चमत्कारी गाय थी जिससे जो कुछ कामना करें वह मिल जाता था। कामधेनु गाय मिलने के बाद समुद्र मंथन फिर आरंभ हुआ अबकी बार समुद्र मंथन में उच्चैश्र्वा नाम का घोड़ा निकला। यह समुद्र मंथन का तीसरा रत्न था। यह उच्चैश्र्वा घोड़ा भी बहुत अद्भुत था।

पौराणिक गाथाओं के अनुसार यह घोड़ा सुंदर- सफेद रंग का था। जिसके सात मुख थे। उस अद्भुत घोड़े को देखते ही दैत्यों के राजा बलि के मन में उसे पाने की अभिलाषा जाग उठी। अब तक समुद्र मंथन में असुरों को कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ था देवताओं ने सोचा कि इससे पहले कि असुरों के मन में असंतोष व्याप्त हो और वे समुद्र मंथन करने से मना कर दें। उससे पहले ही देवताओं ने इस बात को मान लिया।

वह उच्चैश्र्वा नामक उस अद्भुत घोड़े को राजा बलि को प्रदान करने के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन से निकले उस अद्भुत घोड़े को पाकर अब असुर भी प्रसन्न हो गए। क्योंकि उन्हें लगा कि अब समुद्र मंथन का लाभ उन्हें भी मिलने लगा है। उसके बाद तो वे पूरे उत्साह के साथ देवताओं का समुद्र मंथन में साथ देने लगे।

समुद्र मंथन का चौथा रत्न ऐरावत हाथी था 

इसके बाद समुद्र मंथन से एरावत नाम का हाथी निकला। यह समुद्र मंथन का चौथा रत्न था। इस एरावत हाथी को देवराज इंद्र ने ले लिया। यह ऐरावत हाथी क्या, एक प्रकार का दिव्य विमान थी जो अद्भुत एवं अद्वितीय शक्तियों तथा क्षमताओं से परिपूर्ण थी। कहा जाता है कि इसमें इतनी क्षमताएं थी कि इस पर सवार हुए योद्धा को युद्ध में हरा पाना लगभग असंभव था।

समुद्र मंथन का पाँचवा रत्न कौस्तुभ मणि थी 

उसके बाद समुद्र मंथन से कौस्तुभ मणि निकली। यह समुद्र मंथन का पाँचवा रत्न था। इस बहुमूल्य रत्न को भगवान विष्णु ने अपने पास रख लिया, और अपनी क्षाती पर धारण कर लिया। इसी प्रकार समुद्र मंथन से एक के बाद एक रत्न निकलते गए । इन रत्नों की संख्या 14 थी।

समुद्र मंथन का छठा रत्न कल्पवृक्ष था

अब समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष नाम का पेड़ निकला। यह समुद्र मंथन का छठा रत्न था। कहा जाता है कि कल्पवृक्ष वह अद्भुत वृक्ष था जिसके सामने जिस किसी भौतिक वस्तु की अभिलाषा की जाती वह वहाँ उपस्थित हो जाती। प्रकृति के पंचतत्वों से निर्मित प्रत्येक वस्तु को प्रकट करने में सक्षम था कल्पवृक्ष। इस वृक्ष को देवताओं ने रख लिया।

samudra manthanसमुद्र मंथन की सातवीं रत्न अप्सरा रम्भा थी

इसके बाद समुद्र मंथन से रंभा नाम की अपूर्व सुंदरी अप्सरा निकली। यह समुद्र मंथन की सातवीं रत्न थी। रम्भा अभूतपूर्व सुंदरी थी। उसका रूप, यौवन की अतुलनीय राशि से भरा हुआ था। उसके लम्बे तथा घुँघराले केश, विस्तृत, उन्नत एवं सुडौल वक्षस्थल, मनोहर कटिप्रदेश तथा अत्यंत मनोहारी मुखाकृति देवताओं को भा गयी। अप्सरा रम्भा को देवताओं ने अपने पास रख लिया।

समुद्र मंथन की आठवीं रत्न लक्ष्मी जी थीं 

इसी प्रकार समुद्र मंथन से आगे, कमल पुष्प पर मां लक्ष्मी प्रकट हुईं। वह समुद्र मंथन की आठवीं रत्न थी, जिन्हें भगवान विष्णु ने अपनी अर्धांगिनी बना लिया।

समुद्र मंथन की नौवीं रत्न वारुणी देवी थीं 

उसके बाद कन्या रूप में वारुणी देवी समुद्र मंथन से प्रकट हुई। वह समुद्र मंथन की नौवीं रत्न थी। वैसे तो वारुणी, एक विशिष्ट प्रकार की मदिरा को भी कहते हैं जो कदम्ब के फलों से बनायी जाती है किन्तु समुद्र मंथन से प्रकट हुई वारुणी देवी पुण्य सलिला हैं, जिन्हे असुरों ने अपने पास रख लिया। पाताल लोक की सबसे विस्तृत नदियों में से एक वारुणी आज भी वहां निरंतर बह रही हैं।

समुद्र मंथन के दसवें रत्न चंद्रमा थे

इसी क्रम में समुद्र मंथन में आगे चंद्रमा निकले। यह समुद्र मंथन के दसवें रत्न थे। समुद्र मंथन से इनकी उत्पत्ति होने के कारण जल (प्रकृति के पांच तत्वों में से एक तत्व) से सम्बंधित वस्तुओं एवं घटनाओं पर इनका महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है। यहाँ तक की समुद्रों एवं महासमुद्रों में आने वाले ज्वार भाटा पर भी इनका प्रभाव रहता है।

अत्यंत मनोहारी पुरुष के रूप में निकले चन्द्रमा का देवताओं ने स्वागत किया किन्तु उस समय उनके महत्व को न तो देवता और न ही असुरगण समझ सके। फिर भगवान विष्णु ने उनका तिलक करके उन्हें सौरमंडल के एक विशिष्ट स्थान पर स्थापित किया।

समुद्र मंथन का ग्यारहवाँ रत्न परिजात वृक्ष था

इसके बाद समुद्र मंथन से परिजात वृक्ष निकला। यह समुद्र मंथन का ग्यारहवाँ रत्न था। धरती पर जो पारिजात का वृक्ष उपस्थित है उसका तो अधिकतर उपयोग पूजा एवं उपासना में ही किया जाता है किन्तु देवताओं एवं असुरों द्वारा किये गए समुद्र मंथन से जो पारिजात वृक्ष निकला वह अद्भुत औषधीय गुणों से परिपूर्ण था। कहा जाता है कि पारिजात वृक्ष में शरीर के समस्त प्रकार के दोषों को दूर करने की क्षमता थी।  इसे भी देवताओं ने अपनी अमरावती के लिए रख लिया।

समुद्र मंथन का बारहवाँ रत्न शंख था

इसके बाद समुद्र मंथन से एक दिव्य शंख निकला। यह समुद्र मंथन का बारहवाँ रत्न था। पहले तो किसी के समझ में नहीं आया की ये क्या वस्तु है। जब सारे देवता और असुर गण असमर्थ हो गए उसे समझने में तो उन्होंने उसे भगवान विष्णु को दिया। भगवान् विष्णु ने उसे अपने दोनों हांथों में ले कर अपने मुख से लगाया और उसमे फूंक मारी, जिससे, उससे गंभीर नाद (एक प्रकार की ध्वनि) निकलने लगा जो गंभीर से गंभीरतर होता चला गया।

उससे निकलने वाली अत्युच्च आवृत्ति वाली अनाहत ध्वनि तरंगो से ब्रह्माण्ड डोलने लगा।  सारे देवगण एवं असुर गण भगवान् विष्णु के आगे नतमस्तक हो गए और उन्होंने उस शंख को भगवान् विष्णु को ही समर्पित कर दिया। तबसे भगवान् विष्णु एवं माँ लक्ष्मी की पूजा में शंख को रखना भी अनिवार्य माना जाता है।

समुद्र मंथन के तेरहवें रत्न वैद्यराज धन्वंतरि थे

अंत में असुरों और देवताओं की प्रतीक्षा समाप्त हुई। उन्हें समझ आ चुका था कि अब उन्हें अमृत मिलने का समय आ चुका था। फिर समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक, वैद्य-शिरोमणि भगवान धन्वंतरि स्वयं अमृत का कलश हाथों में लेकर समुद्र से प्रकट हुए। वैद्यराज धन्वंतरि समुद्र मंथन के तेरहवें रत्न थे। उनके चेहरे पर गज़ब की सौम्यता एवं सम्मोहन था। भगवान शिव के समान अधखुली हुई आँखों के साथ उनका शरीर-सौष्ठव चमत्कार सा प्रकट कर रहा था।

समुद्र मंथन का चौदहवां रत्न अमृत था

वैद्यराज धन्वंतरि के दाहिने हाँथ में एक कलश था जिसमे अमृत भरा था, वही अमृत जिसे पी लेने के बाद कोई भी अजर और अमर हो सकता था और कल्पांत तक अपनी आयु जी सकता था। यह अमृत ही समुद्र मंथन का चौदहवां रत्न था, जिसे पाने के लिए समुद्र मंथन किया गया था।

इससे पहले कि देवतागण भगवान धन्वंतरि के हाथों से उस अमृत कलश को ले पाते, तब तक असुरों ने अमृत से भरे हुए उस कलश को धनवंतरी जी के हाथों से छीन लिया। अब सभी असुर आपस में उस समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत को सर्वप्रथम पीने के लिए लड़ने-झगड़ने लगे। कहते हैं की असुरों की छीना-झपटी में अमृत कलश की कुछ बूंदे धरती पर जा गिरी।

जहां आज हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक जैसे पावन स्थान स्थित हैं। बताया जाता है कि अमृत कलश से अमृत पाने के लिए संघर्ष 11 दिन चला। दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण क्षीण शक्ति वाले देवता केवल मूक दर्शक बन गए थे  उस समय । असुरों के बल के आगे उनकी हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी कि उस अमृत पर अपना भी दवा ठोक सकें।

समुद्र मंथन के बाद अमृत के बॅटवारे के लिए ब्रह्माण्ड सुंदरी, जगत मोहिनी प्रकट हुई 

ऐसा लग रहा था कि समुद्र मंथन से निकलने वाले अमृत को असुरगण केवल स्वयं पीकर अमर हो जाने के लिए उतारू थे। तभी सभी देवताओ और असुरों ने एक चमत्कार देखा। जिस स्थान पर उस अमृत को पाने के लिए राक्षसों में आपस में झगड़ा हो रहा था, उसी स्थान पर एक अत्यंत सुंदर स्त्री असुरों के बीच प्रकट हो गई। वह स्त्री इतनी अधिक सुंदर थी कि वहाँ उपस्थित सारे असुर उसे देखकर मोहित हो गए ।

ऐसा लग रहा था कि उसके अंग-प्रत्यंग किसी और ही दुनिया में तराशे गए हों। देवता भी उस अप्रतिम रूप सौंदर्य को देख कर हतप्रभ से खड़े रह गए। सही मायने में पूरे ब्रह्माण्ड में उससे अधिक सुंदरी स्त्री कोई नहीं हो सकती थी। अब वह असुर गण उस अमृत कलश की अभिलाषा को छोड़कर उस सुंदर स्त्री की कामना करने लगे थे। वे उसे रिझाने में लग गए।

उस सुंदर स्त्री ने अपनी मोहनी सूरत और अत्यंत कमनीय काया का असुरों पर जो जाल फेंका था उस जाल में असुरगण पूरी तरह फंस गए थे। जब उस सुंदर स्त्री ने अपनी मधुर, संगीतमय वाणी में  बोलना आरंभ किया तो सभी असुर सम्मोहित हो गए और अपनी सुध-बुध भूल गए। बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि समुद्र मंथन कर रहे सारे असुर उस सुंदरी के रूप-पाश में बंध गए।

जैसा वह सुंदरी कह रही थी असुर वैसा ही कर रहे थे, क्योंकि अब वे भूल चुके थे कि वे समुद्र मंथन क्यों कर रहे थे? उनकी अमृत पाने की चाह सुंदर स्त्री को पाने में बदल गई थी। उस रहस्यमयी सुंदर स्त्री ने असुरों से कहा कि वह उस अमृत कलश को उसे दे दे, जिससे वहअसुरों और देवताओं दोनों को अमृत पान करा सकें। यद्यपि दैत्य राज बलि एक गंभीर व्यक्ति थे लेकिन वे उस सुंदरी के रूप के जादू में इस तरह बंध गए थे कि वे मना नहीं कर सके और उन्होंने अपने पास के अमृत कलश को अब उस मोहिनी स्त्री को दे दिया।

उसके बाद उस स्त्री ने कहा कि आप असुर और देवता सभी लोग अलग-अलग पंक्ति में बैठ जाएं, ताकि वह बारी-बारी सबको अमृत बांट सके। असुर और देवता अलग-अलग पंक्तियों में बैठ गए। उस सुंदरी ने सर्वप्रथम देवताओं को अमृत बांटना शुरू किया।

समुद्र मंथन के चौदहवें रत्न अमृत को अंततः देवताओं ने पी ही लिया 

उस सुंदरी ने असुरों को अपने मोहपाश में बाँध दिया था। वह स्त्री कलश से अमृत तो देवताओं को बांट रही थी लेकिन अपने चेहरे एवं कमनीय काया की भाव भंगिमा से अपने अतुलनीय यौवन एवं रूप का जादू असुरों पर छलका रही थी ।असुर गण तो उस सुंदरी के मोह में इस तरह पागल हो गए थे कि वे अपनी सारी सुध बुध खो चुके थे।

लेकिन देवताओं की अमृत पीने की इस चाल को राहु नामक दैत्य समझ गया था। वह उन सब में सबसे अधिक बुद्धिमान था, इसलिए वह चुपके से देवता का रूप धारण कर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और उसने अमृत पी लिया। चंद्र और सूर्य ने भगवान विष्णु को इस बात से अवगत करा दिया।

भगवान विष्णु जो अब तक उस सुंदर स्त्री का रूप धारण किए हुए थे अपने असली रूप में प्रकट हो गये और सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक काट दिया। समुद्र मंथन से निकले हुए अमृत को सारे देवता भी पी चुके थे। जब असुरों ने देखा कि वह सुंदरी भगवान विष्णु के रूप में परिवर्तित हो गई। तब उन्हें पता चला कि उनके साथ धोखा हुआ है।

उस स्त्री के प्रेम में वशीभूत होकर असुरों ने अमृत कलश खो दिया था। अब तो असुर और देवताओं के मध्य भयंकर संग्राम आरंभ हो गया। जिसे देवासुर संग्राम के नाम से जाना जाता है । लेकिन अब देवताओं ने अमृत को पीकर अमरता को प्राप्त कर लिया था। अंततः असुर पराजित हुए और उन्हें देवताओं को देवलोक वापस करना पड़ा।