व्यासजी द्वारा पांडवों को द्रौपदी के पूर्वजन्म के बारे में बताना


व्यासजी द्वारा पांडवों को द्रौपदी के पूर्वजन्म के बारे में बताना परीक्षित नंदन जन्मेजय को महाभारत की कथा सुनते हुए वैशम्पायन जी कहते हैं-जनमेजय ! द्रौपदी के जन्म की कथा और उसके स्वयंवर का समाचार सुनकर पाण्डवों का मन उसे देखने के लिए बेचैन हो गया । उनकी व्याकुलता और द्रौपदी के प्रति प्रेम देखकर कुन्ती ने कहा कि “बेटा ! हम लोग बहुत दिनों से इस ब्राह्मण के घर में आनन्द पूर्वक रह रहे हैं ।

अब यहाँ का सब कुछ हम लोग देख चुके, चलो न, तुम्हारी इच्छा हो तो पंचाल देश में चलें” । युधिष्ठिर ने कहा कि यदि सब भाइयों की सम्मति हो तो चलने में क्या आपत्ति है । सबने स्वीकृति दे दी । प्रस्थान की तैयारी हुई ।

उसी समय श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास ऋषि पाण्डवों से मिलने के लिये एक चक्रा नगरी में आये । सब उनके चरणों में प्रणाम करके हाथ जोड़ खड़े हो गये । व्यास जी ने, एकान्त में पाण्डवो का किया सत्कार स्वीकार करके उनके धर्म, सदाचार, शास्त्राज्ञा-पालन, पूज्यपूजा, ब्राह्मण पूजा आदि के सम्बन्ध में पूछकर धर्मनीति और अर्थ नीति का उपदेश किया |

उन्हें चित्र-विचित्र लोकों की कथाएँ सुनायीं इसके बाद प्रसंगानुसार कहने लगे, “पाण्डवो ! बहुत पहले की बात है । एक बड़े महात्मा ऋषि की सुन्दरी और गुणवती कन्या थी । परंतु रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी होने पर भी पूर्व जन्मों के बुरे कर्मो के फल स्वरूप किसी ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया । इससे दुःखी होकर वह तपस्या करने लगी ।

उसकी उग्र तपस्या से भगवान् शंकर सन्तुष्ट हुए । उन्होंने उसके सामने प्रकट होकर कहा, “तू मुंह मांगा वर माँग ले” । उस कन्या को भगवान् शंकर के दर्शन से और वर माँगने के लिये कहने से इतना हर्ष हुआ कि वह बारबार कहने लगी “मैं सर्व गुणयुक्त पति चाहती हूँ” । शंकर भगवान् ने कहा कि “तुझे पाँच भरतवंशी पति प्राप्त होंगे” ।

कन्या बोली, “मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति चाहती हूँ” । भगवान् शंकर ने कहा, “तूने पति प्राप्त करने के लिये मुझसे पाँच बार प्रार्थना की है । मेरी बात अन्यथा नहीं हो सकती । दूसरे जन्म में तुझे पाँच ही पति प्राप्त होंगे” । पाण्डवो ! वही देव रूपिणी कन्या द्रुपद की यज्ञवेदी से प्रकट हुई है ।

तुम लोगों के लिये विधि-विधान के अनुसार वही सर्वांगसुन्दरी कन्या निश्चित है | तुम जाकर पांचालनगर में रहो । उसे पाकर तुम लोग सुखी होओगे” । इस प्रकार कहकर पाण्डवों की अनुमति से व्यासजी ने प्रस्थान किया । उनके जाने के पश्चात् पांडव भी धर्म-अधर्म की सोच विचार में पड़े हुए आगे की ओर प्रस्थान किये |





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