क्या महभारत की कथाओं में अनसुलझी पहेलियाँ हैं जिन्हे सुलझाना सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं


महभारत की अनसुलझी पहेलियाँ महर्षि लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूतवंश के एक श्रेष्ठ पौराणिक कथा वाचक थे। एक बार जब नैमिषारण्य क्षेत्र में कुलपति शौनक अपने बारह वर्ष का सत्संग-सत्र कर रहे थे, तभी उग्रश्रवा बड़ी विनम्रता के साथ सुखासन पर बैठे हुए व्रतनिष्ठ ब्रह्मर्षियों के पास आये। जब नैमिषारण्यवासी तपस्वी ऋषियों ने देखा कि उग्रश्रवा हमारे आश्रममें आ गये हैं, तब उनसे चित्र-विचित्र कथा सुनने के लिये उन लोगों ने उन्हें घेर लिया । उग्रश्रवा ने हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया और  ऐसा सत्कार पाकर उनकी तपस्या के सम्बन्ध में कुशल-प्रश्न किये । सब  ऋषि-मुनि अपने-अपने आसन पर विराजमान हो गये और उनके आज्ञानुसार वे भी अपने आसन पर बैठ गये ।

जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर चुके, तब किसी ऋषि ने कथा का प्रसंग प्रस्तुत करने के लिये उनसे यह प्रश्न किया “सूतनन्दन ! आप कहाँसे आ रहे हैं? आपने अब तक का समय कहाँ व्यतीत किया है?” उग्रश्रवा ने कहा, “मैं परीक्षित्-नन्दन राजर्षि जनमेजय के सर्प-सत्र में गया हुआ था। वहाँ श्री वैशम्पायनजी के मुख से मैंने भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन के द्वारा निर्मित महाभारत ग्रन्थ की अनेकों पवित्र और विचित्र कथाएँ सुनीं । इसके बाद बहुत-से तीर्थों और आश्रमों में घूमकर समन्त पंचक क्षेत्र में आया, जहाँ पहले कौरव और पाण्डवों का महान् युद्ध हो चुका है । वहाँ से मैं आप लोगों का दर्शन करने के लिये यहाँ आया हूँ। आप सभी चिरायु और ब्रह्मनिष्ठ हैं। आपका ब्रह्मतेज सूर्य और अग्नि के समान है। आप लोग स्नान, जप, हवन आदि से निवृत्त होकर पवित्रता और एकाग्रता के साथ अपने-अपने आसन पर बैठे हुए हैं। अब कृपा करके बतलाइये कि मैं आप लोगों को कौन सी कथा सुनाऊँ”।

ऋषियों ने कहा “सूतनन्दन ! परमर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायन ने जिस ग्रन्थ का निर्माण किया है और ब्रह्मर्षियों तथा देवताओं ने जिसका सत्कार किया है, जिसमें विचित्र पदों से परिपूर्ण पर्व हैं, जो सूक्ष्म अर्थ और न्याय से भरा हुआ है, जो पद-पद पर वेदार्थ से विभूषित और आख्यानों में श्रेष्ठ है, जिसमें भरतवंश का सम्पूर्ण इतिहास है, जो सर्वथा शास्त्र सम्मत है और जिसे श्री कृष्ण द्वैपायन की आज्ञा से वैशम्पायन जी ने राजा जनमेजय को सुनाया है, भगवान् व्यास की वही पुण्यमयी, पाप नाशिनी, और वेदमयी संहिता हम लोग सुनना चाहते हैं”।

भगवान कृष्ण ही सबके आश्रय हैं

उग्रश्रवा जी ने कहा “भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके आदि हैं। वे अन्तर्यामी, सर्वेश्वर, समस्त यज्ञों के भोक्ता, सबके द्वारा प्रशंसित, परम सत्य ॐकार स्वरूप ब्रह्म हैं। वे ही सनातन व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप हैं। वे असत् भी हैं और सत् भी हैं, वे सत्-असत् दोनों हैं और दोनों से परे हैं। वे ही विराट् विश्व भी हैं। उन्होंने ही स्थूल और सूक्ष्म दोनों की सृष्टि की है। वे ही सबके जीवनदाता, सर्वश्रेष्ठ और अविनाशी हैं। वे ही मंगलकारी, मंगलस्वरूप, सर्वव्यापक, सबके वांछनीय, निष्पाप और परम पवित्र हैं। उन्हीं चराचर गुरु नयन मनोहारी हृषिकेश को नमस्कार करके सर्वलोक पूजित अद्भुत कर्मा भगवान् व्यास की पवित्र रचना महाभारत का वर्णन करता हूँ। पृथ्वी में अनेकों प्रतिभाशाली विद्वानों ने इस इतिहास का पहले भी वर्णन किया है, अब ही करते हैं और आगे भी किया करेंगे। यह परमज्ञान स्वरूप ग्रन्थ तीनों लोकों में प्रतिष्ठित है। कोई संक्षेप से, तो कोई विस्तार से इसे धारण करते हैं। इसकी शब्दावली शुभ है। इसमें अनेकों छन्द हैं और देवता तथा मनुष्यों की मर्यादा का इसमें स्पष्ट वर्णन है”।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई

उग्रश्रवा जी ने बताना शुरू किया “जिस समय यह जगत् ज्ञान और प्रकाश से शून्य तथा अन्धकार से परिपूर्ण था, उस समय एक बहुत बड़ा अण्डा उत्पन्न हुआ और वही समस्त ब्रह्माण्ड की प्रजा की उत्पत्ति का कारण बना। वह बड़ा ही दिव्य और ज्योतिर्मय था । श्रुति उसमें सत्य, सनातन, ज्योतिर्मय ब्रह्म का वर्णन करती है। वह ब्रह्म अलौकिक, अचिन्त्य, सर्वत्र सम, अव्यक्त, कारण स्वरूप तथा सत् और असत् दोनों हैं। उसी अण्डे से लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी प्रकट हुए। इसके बाद दस प्रचेता, दक्ष, उनके सात पुत्र, सात ऋषि और चौदह मनु उत्पन्न हुए ।

विश्वेदेवा, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, यक्ष, साध्य, पिशाच, गुह्यक, पितर, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, जल, धुलोक, पृथ्वी, वायु, आकाश, दिशाएँ, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, दिन, रात तथा जगत में और जितनी भी वस्तुएँ हैं, सब उसी अण्डे से उत्पन्न हुई। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रलय के समय, जिससे उत्पन्न होता है, उसी परमात्मा में लीन हो जाता है । ठीक वैसे ही, जैसे ऋतु आने पर उसके अनेकों लक्षण प्रकट हो जाते और बदलने पर लुप्त हो जाते हैं। इस प्रकार यह कालचक्र, जिससे सभी पदार्थों की सृष्टि और संहार होता है, अनादि और अनन्त रूप से सर्वदा चलता रहता है।

देवताओं की संख्या कितनी है

संक्षेप में इस ब्रह्माण्ड में देवताओं की संख्या तैंतीस हजार तैंतीस सौ तैंतीस (छत्तीस हजार तीन सौ तैंतीस) है। विवस्वान के बारह पुत्र हैं-दिव:पुत्र, बृहद्भानु, चक्षु, आत्मा, विभावसु, सविता, ऋचीक, अर्क, भानु, आशावह, रवि और मनु। मनु के दो पुत्र हुए-देवभ्राट् और सुभ्राट्। सुभ्राट के तीन पुत्र हुए-दशज्योति, शतज्योति और सहस्रज्योति। ये तीनों ही प्रतिभावान और विद्वान् थे। दशज्योति के दस हजार, शतज्योति के एक लाख और सहस्रज्योति के दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए। इन्हीं से कुरु, यदु, भरत, ययाति और इक्ष्वाकु आदि राजर्षियों के वंश चले। बहुत-से वंशों और प्राणियों की सृष्टि को यही परम्परा है।

भगवान् व्यास समस्त लोक, भूत-भविष्य-वर्तमान के रहस्य, कर्म-उपासना-ज्ञान रूप वेद, अभ्यास युक्त योग, धर्म, अर्थ और काम, सारे शास्त्र तथा लोकव्यवहार को पूर्ण रूप से जानते हैं। उन्होंने महाभारत के इस ग्रन्थ में व्याख्या के साथ सम्पूर्ण इतिहास और सारी श्रुतियों का तात्पर्य कह दिया है। भगवान् व्यास ने इस महान् ज्ञान का कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से वर्णन किया है, क्योंकि विद्वान् लोग ज्ञान को भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रकाशित करते हैं। उन्होंने तपस्या और ब्रह्मचर्य की शक्ति से वेदों का विभाजन करके इस ग्रन्थ का निर्माण किया और सोचा कि इसे शिष्यों को किस प्रकार पढ़ाऊँ? भगवान् व्यास का यह विचार जानकर स्वयं ब्रह्मा जी उनकी प्रसन्नता और लोकहित के लिये उनके पास आये।

महाभारत में समस्त ज्ञान है

उस समय भगवान् वेदव्यास उन्हें देखकर बहुत ही विस्मित और चकित हुए और मुनियों के साथ उठकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा आसन पर बैठाया । स्वागत-सत्कार के बाद ब्रह्माजी की आज्ञा से वे भी उनके पास ही बैठ गये तब व्यास जी ने बड़ी प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए कहा, “भगवन् ! मैंने एक श्रेष्ठ काव्य की रचना की है । इसमें वैदिक और लौकिक सभी विषय हैं इसमें वेदांग सहित उपनिषद, वेदों का क्रिया विस्तार, इतिहास, पुराण, भूत, भविष्यत और वर्तमान के वृत्तान्त, बुढ़ापा, मृत्यु, भय, व्याधि आदि के भाव-अभाव का निर्णय, आश्रम और वर्णोंका धर्म, पुराणों का सार, तपस्या, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा और युगों का वर्णन, उनका परिमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,अथर्वेद, अध्यात्म, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, पाशुपत धर्म, देवता और मनुष्यों की उत्पत्ति, पवित्र तीर्थ, पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन, समुद्र, पूर्व कल्प, दिव्य नगर, युद्ध कौशल, विविध भाषा, विविध जाति, लोकव्यवहार और सब में व्याप्त परमात्मा का भी वर्णन किया है; परंतु पृथ्वी में इसको लिपिबद्ध कर देने वाला कोई नहीं मिलता, यही मेरी चिन्ता का विषय है”।

ब्रह्मा जी ने कहा “महर्षे ! आप तत्त्वज्ञान सम्पन्न हैं । इसलिये मैं तपस्वी और श्रेष्ठ मुनियों से भी आपको श्रेष्ठ समझता हूँ। आप जन्म से ही अपनी वाणी के द्वारा सत्य और वेदार्थ का कथन करते हैं। इसलिये आपका अपने ग्रन्थ को काव्य कहना सत्य होगा। उसकी प्रसिद्धि काव्य के नाम से ही होगी। आपके काव्य से श्रेष्ठ काव्य का निर्माण जगत में कोई नहीं कर सकेगा। आप अपना ग्रन्थ लिखने के लिये गणेश जी का स्मरण कीजिये”। यह कहकर ब्रह्माजी तो अपने लोक को चले गये और व्यास जी ने गणेश जी का स्मरण किया।

महाभारत की अनसुलझी पहेलियाँ

स्मरण करते ही भक्त वांछाकल्पतरु गणेशजी उपस्थित हुए। व्यास जी ने पूजा करके उन्हें बैठाया और प्रार्थना की, “भगवन् ! मैंने मन-ही-मन महाभारत की रचना की है। मैं बोलता हूँ, आप उसे लिखते जाइये”। गणेश जी ने कहा, “यदि मेरी कलम एक क्षण के लिये भी न रुके तो मैं लिखने का काम कर सकता हूँ”। व्यासजीने कहा, “ठीक है, किन्तु आप बिना समझे न लिखियेगा” । गणेश जी ने ‘तथास्तु’ कहकर लिखना स्वीकार कर लिया। भगवान् व्यास ने कौतूहलवश कुछ ऐसे श्लोक बना दिये जो इस ग्रन्थ की गाँठ हैं।

इनके सम्बन्ध में उन्होंने प्रतिज्ञा पूर्वक कहा है कि ‘आठ हजार आठ सौ श्लोकों का अर्थ मैं जानता हूँ, शुक देव जानते हैं। संजय जानते हैं या नहीं, इसका कुछ निश्चय नहीं है।’ वे श्लोक अब भी इस ग्रन्थ में हैं। बिना विचार किये उनका अर्थ नहीं खुल सकता। और तो और, सर्वज्ञ गणेश जी जब एक क्षण तक उन श्लोकों के अर्थ का विचार करते थे उतने ही में महर्षि व्यास दूसरे बहुत-से श्लोकों की रचना कर डालते थे। इस प्रकार से पूरे महाभारत में आठ हजार आठ सौ श्लोकों के रूप में पहेलियाँ हैं जिन्हे सुलझाना सामान्य मनुष्यों के वश की बात नहीं |

यह महाभारत, ज्ञान रूप अंजन की सलाई से अज्ञान के अन्धकार में भटकते हुए लोगों की आँखें खोलने वाला है। इस भारत रूपी सूर्य ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थों का संक्षेप और विस्तार से वर्णन करके लोगों का अज्ञानान्धकार नष्ट कर दिया है। इस भारत पुराणरूपी पूर्णचन्द्र ने श्रुत्यर्थरूप चन्द्रिका को छिटकाकर मनुष्यों की बुद्धिरूप कुमुदों को विकसित कर दिया है, इस इतिहास रूप दीपक ने संसार के तहखाने को उजाले से भर दिया है। भगवान् श्री कृष्ण द्वैपायन ने इस ग्रन्थ में कुरुवंश का विस्तार, गान्धारी की धर्मशीलता, विदुर की प्रज्ञा, कुन्ती के धैर्य, दुर्योधन की दुष्टता और पाण्डवों की सत्यता का वर्णन किया है। इसकी प्रत्येक कथा से भगवान् श्री कृष्ण की अनिर्वचनीय महिमा प्रकट होती है। यह महाभारत रूप कल्पवृक्ष समस्त कवियों के लिये आश्रय स्थान है। इसी के आधार पर सब अपने अपने काव्य का निर्माण करेंगे।