ब्रह्माण्ड में असंख्य सूर्यों का अस्तित्व


BLACK HOLESहम सभी को पता है कि हमारे सौर-मंडल में एक ही सूर्य (Sun) है और वही इस धरती पर (और अगर इस सौर-मंडल के किसी और ग्रह पर जीवन है तो उस पर भी) जीवन पनपने का मुख्य कारण है | लेकिन अगर हम बात करें ब्रह्माण्ड (Universe) की तो इस ब्रह्माण्ड में हज़ारों मन्दाकिनियाँ (Galaxy) हो सकती हैं और उनमे लाखों सूर्य हो सकते हैं तो इस तरह से हमारे ब्रह्माण्ड (Universe) में करोड़ों या उससे भी अधिक सूर्य हो सकते हैं | अन्तरिक्ष वैज्ञानिक, अपनी विशालकाय दूरबीनों से दिन-रात शोध कर रहे हैं और हमारे आकाश में होने वाली हर हलचल को रिकॉर्ड करने की कोशिश करते हैं |

आज के वैज्ञानिकों के पास अत्याधुनिक यंत्र हैं जिससे वे, जहाँ एक तरफ परमाणु से भी सूक्ष्म कणों की गतिविधियाँ माप सकते हैं वहीँ दूसरी तरफ आकाश में सैकड़ों प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारे के साथ क्या हो रहा है ये भी जान सकते हैं | लेकिन फिर भी आज के ब्रह्माण्ड विज्ञान की परिकल्पनाओं के आधार बहुत मज़बूत नहीं है, फिर वो चाहे ब्लैक-होल (Black Holes) सम्बन्धी परिकल्पना हो या डार्क मैटर (Dark Matter) और डार्क एनर्जी (Dark Energy) सम्बन्धी अवधारणायें |

इन सब के बावज़ूद अगर आप किसी ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक से बात करें तो वो आपको यही बतायेगा की इस, वर्तमान समय में हमने अभूतपूर्व खोजें की है और हम ब्रह्माण्डीय खोजों के स्वर्णिम युग में जी रहे हैं | उस समय वो भूल जाता है कि समय (Time) की गति हमेशा “चक्रीय” होती है | आज जो हमारा वर्तमान है वो कभी किसी का अतीत रहा होगा और किसी न किसी का भविष्य भी होगा | हम भी उसी भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जो कभी किसी का अतीत रहा होगा | कहानियाँ वही रहती है बस पात्र बदल जाते हैं लेकिन पात्र बदलने से उनमे नवीनता तो आती ही है, ‘जीवन्तता’ भी आ जाती है |

kashyap sunभारतीय ग्रंथों के अनुसार प्राचीन ऋषियों ने उन सूर्यों को प्रत्यक्ष देखा जिनको आज के वैज्ञानिक अपने शक्तिशाली दूरवीक्षण यंत्र से न देख पाए | ऐसा ही एक विवरण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक (१ | २ | ७ ) में दिया हुआ है – अपश्यमहमेतान सप्तसूर्यानीति | पञ्च कर्णों वात्स्यायन: | सप्त कर्णश्च प्लाक्षिः | आनुश्राविकरावनौ कश्यप इति | उभौ वेदयिते | नहि शेकुमिव महामेरुम गन्तुम ||

यहाँ पर ये पूरा सम्वाद वत्स ऋषि के पुत्र पंचकर्ण और प्लक्ष ऋषि के पुत्र सप्त्कर्ण के बीच का है | ये दोनों ऋषि-पुत्र आपस में बात कर रहे हैं कि हमने सात सूर्यों को तो प्रत्यक्ष देख लिया है, किन्तु आठवां जो ‘कश्यप’ नामक सूर्य (Sun) हैं, उन्हें हम नहीं देख सके हैं | इससे जान पड़ता है कि कश्यप सूर्य मेरु-मण्डल में ही परिभ्रमण करते रहते हैं | लेकिन हम वहां तक जा न सके |

फिर आगे वर्णन है- अपश्यमह्मेत्सूर्यमंडलम परिवर्तमानम | गार्ग्यः प्राणत्रात: | गच्छन्तमहामेरुम | एवं चाजहतम |

ठीक उसी समय गर्ग के पुत्र प्राणत्रात नामक ऋषि ने कहा “हे पञ्चकर्ण और सप्तकर्ण ! कश्यप नामक अष्टम सूर्य को मैंने प्रत्यक्ष देख लिया है | ये सूर्य, मेरु-मण्डल में ही भ्रमण करते हैं | वहां जा कर उन्हें कोई भी देख सकता है | तुम वहां योग-मार्ग से जा कर देख लो”

INFINITE SUNवेदों में इनके बारे में कहा गया है कि ये आठवें सूर्य कश्यप भूत, भविष्य और वर्तमान घटनाओं को अतिसूक्ष्म रूप से जानते हैं | यह इनका वैशिष्ट्य (Specialty) है | इसीलिए कश्यप सूर्य को पश्यक नाम से भी पुकारते है | एक प्राचीन आरण्यक ग्रन्थ में इन आठों सूर्यों का नाम दिया गया है | उनके नाम इस प्रकार हैं –

  1. आरोग
  2. भाज
  3. पटर
  4. पतंग
  5. स्वर्णर
  6. ज्योतिषीमान
  7. विभास
  8. कश्यप

हम प्रतिदिन जिन सूर्य (Sun) को अपने आकाश में देखते हैं, उनका नाम ‘आरोग’ है और शेष सारे सूर्य हमसे अतिशय दूर हैं अतः हम उन्हें अपनी आँखों से नहीं देख सकते | अब यहाँ ये कहना कठिन है कि ये हमसे समय (Time) में अत्यधिक दूर हैं या स्थान (Space) में !

यहाँ एक रहस्यमय शब्द ‘मेरु-मण्डल’ का प्रयोग हुआ है, ये मेरु-मण्डल क्या है ? दरअसल जैसे हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती (जिससे दिन और रात संभव होता है) है वैसे ही हमारा ब्रह्माण्ड (जिसका आकार दो कड़ाहियों के एक दूसरे के ऊपर रख देने से जो अकार बनता है, उसके जैसा है) भी अपनी धुरी पर घूमता है | ब्रह्माण्ड (Universe) का ये धुरी वाला हिस्सा, जो ब्रह्माण्ड के सबसे उच्च स्थान को उसके सबसे नीचे वाले स्थान से जोड़ता है, मेरु-मण्डल कहलाता है | तो मेरु-मंडल इस ब्रह्माण्ड की धुरी है जिसके चारो तरफ़ ये ब्रह्माण्ड चक्कर लगाता है |

इस ब्रह्माण्ड के आधे-उच्च (Upper Half) भाग में सात भुवन हैं और नीचे के आधे भाग (Lower Half) में सात भुवन हैं | इस प्रकार से ब्रह्मा जी ने प्रकृति (माया) की सहायता से जो ये ब्रह्माण्ड रचा उसमे चौदह भुवन हैं | यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समय तथा स्थान भेद से इस ब्रह्माण्ड में अनंत लोक संभव है…ये बिलकुल वैसे ही है कि रात को सोने के बाद आप क्या स्वप्न देखेंगे उसकी संभावनाएं अनंत है |

INFINITYअब फिर से लौटते है वेदों में | यजुर्वेद में आगे स्पष्ट किया गया है कि इन आठों सूर्य में कश्यप ही प्रधान सूर्य हैं | आरोग आदि सभी सूर्य, इन कश्यप सूर्य से ही अपनी प्रकाशक शक्ति भी प्राप्त करते हैं | आरोग सूर्य के परिभ्रमण को तो हम जानते हैं, अन्य सूर्यों में भाज, पटर और पतंग- ये तीनो सूर्य अधोमुख हो कर मेरुमार्ग में नीचे की और (Lower Half) परिभ्रमण करते हैं और वहाँ के लोकों, भुवनों एवं प्राणी-समूहों में अपना प्रकाश फैलाते हैं | स्वर्णर, ज्योतिषीमान और विभास- ये तीनो सूर्य ऊर्ध्व मुखी हो कर मेरु मार्ग में ऊपर की ओर परिभ्रमण करते हैं और वहां के चराचर वस्तुओं को प्रकाश देते हैं |

कश्यप सूर्य की अक्षय ऊर्जा से प्रकाशित ये सातो सूर्य अपने-अपने आयाम (Dimensional Plane) में स्थित अन्य, सैकड़ों-सहस्त्रों सूर्यों को प्रकाशित करते हैं | चूंकि इस ब्रह्माण्ड (Universe) में समय तथा स्थान के विभेद से असंख्य लोक संभव है उनमे से बहुसंख्य लोकों में प्राणी-जगत और ऋतुओं का आविर्भाव आदि की सम्भावना प्रबल है और इन सब के लिए एक सूर्य (Sun) का होना अत्यावश्यक है | ऋषि वैशम्पायन जी का कथन है कि “ऐतयैवावृता सहस्त्रसूर्यताया इति वैशम्पायन:” अर्थात “जहाँ-जहाँ वसंतादी ऋतुओं और तत्त्द्धर्मों (और उनके निर्दिष्ट धर्मों) का आविर्भाव है वहाँ-वहाँ उन सब के सम्पादन के लिए एक सूर्य का अस्तित्व रहता ही है | इस न्याय के अनुसार सहस्त्रों या असंख्य सूर्यों का अस्तित्व संभव है” |

इस सम्बन्ध में श्रुति (वेद) का एक कथन देखना काफी दिलचस्प होगा | “यद्द्याव इंद्र ते शतं शतं भूमिः | उत स्यु: | न त्वा वज्रिन्सहस्त्रसूर्या: | अनु न जातमष्ट रोदसी इति” | (१|७|६)

Suryanarayanअर्थात “हे इन्द्र ! यद्यपि तुमसे शत-शत स्वर्ग लोकों का निर्माण संभव है और सैकड़ों भू-लोकों का सृजन संभव है, तथापि आकाश में स्थित सहस्त्रों सूर्यों के प्रकाश को पूर्णतया तुम और तुमसे निर्मित स्वर्गादि लोक सब मिल कर भी नहीं ले सकते”

यहाँ इस श्लोक में श्रुति स्पष्ट रूप से उदघोष करती है कि ब्रह्माण्ड (Universe) में एक दो नहीं सहस्त्रो सूर्य (Sun) हैं और उनके प्रकाश को इस ब्रह्माण्ड में स्थित असंख्य लोक मिल कर भी नहीं ले सकते | बात जितनी साधारण दिख रही है उतनी साधारण है नहीं लेकिन मूल रूप से यह इसी सत्य को स्थापित कर रही है कि इस ब्रह्माण्ड के प्रधान अधिपति कश्यप सूर्य ही हैं जो इस ब्रह्माण्ड के केंद्र-बिंदु में परिभ्रमण कर रहे हैं |

केंद्र-बिंदु में स्थापित होने और वहां परिभ्रमण करने से उन पर, इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त समय का प्रभाव लगभग नगण्य है इसीलिए कहा गया है कि वहां भूत-भविष्य-वर्तमान निरपेक्ष हो जाते हैं और वहां विराजते हैं साक्षात् महाकाल ! ऐसे महाकाल स्वरुप भगवान् कश्यप सूर्य को प्रणाम है

अन्य रहस्यमय आर्टिकल्स पढ़ने के लिए, कृपया नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें
https://rahasyamaya.com/how-aliens-move-and-how-they-disappear/
https://rahasyamaya.com/mysterious-relationship-of-hitler-with-aliens/
https://rahasyamaya.com/was-interstellar-inspired-by-ancient-indian-cosmology-universe-black-holes-time-space-vedas-god-world/
https://rahasyamaya.com/strange-and-mysterious-divine-coincidence/

You can find the Universe, Time, Space and Big Bang Theory related articles through the following searches
universe mysteries, Top Ten Mysteries of the Universe, Astronomy’s 50 Greatest Mysteries, Top 10 Unsolved Mysteries of Science, Universe, Anti-Universe, Anti Universe, Parallel Universe, Universe, Big Bang Theory, Theory of relativity, Tim, Space, Einstein, Albert Einstein, Time-Space Theory, Time-Space Continuum, The 18 Biggest Unsolved Mysteries in Physics, 10 Interesting Mysteries of the Universe, 10 Interesting Mysteries of the Universe, big bang theory, ब्रह्माण्ड की रचना, ब्रह्माण्ड का रहस्य, ब्रह्माण्ड पुराण, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई, ब्रह्माण्ड की जानकारी, ब्रह्माण्ड कैसे बना, ब्रह्माण्ड इमेज, ब्रह्माण्ड रहस्य, ब्रह्माण्ड के रहस्य, ब्रह्मा और ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड: क्या? क्यों? कैसे?, ब्रह्माण्ड: कहाँ है इसका ओर-छोर, ब्रह्माण्ड किसे कहते है, ब्रह्माण्ड की अद्भुत आकाशगंगाएं, ब्रह्माण्ड In English, बिग बैंग सिद्धांत, जानिये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई, सृष्टि रचना, बिग बैंग थ्योरी इन हिंदी, पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई, Theory of Universe Origin, ब्रह्माण्ड, विज्ञान और ब्रह्माण्ड के रहस्य, ब्रह्माण्ड किसे कहते हैं, आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड विज्ञान, सामानांतर ब्रह्माण्ड, प्रति ब्रह्माण्ड, प्रति-ब्रह्माण्ड, आखिर कितने ब्रह्माण्ड हैं?, ब्रह्माण्ड के बाहर क्या है?, क्या इस ब्रह्माण्ड में सचमुच कोई ईश्वर है?, ब्रह्माण्ड किसे कहते हैं, सामानांतर ब्रह्माण्ड क्या है? आइंस्टीन, अल्बर्ट आइंस्टीन, वेद, पुराण, संहिता, ऋषि, मुनि