विक्रमादित्य के राज्य में सुदूर देशों से विद्वान तथा प्रतिभावन, सम्मान तथा पारितोषिक पाने आते थे

विक्रमादित्य के राज्य में सुदूर देशों से विद्वान तथा प्रतिभावन, सम्मान तथा पारितोषिक पाने आते थेराजा विक्रमादित्य कला तथा प्रतिभा का बहुत सम्मान करते थे | उनकी गुणग्राहिता का कोई जवाब नहीं था । वे विद्वानों तथा कलाकारों को बहुत सम्मान देते थे । इसके परिणाम स्वरूप उनके दरबार में एक से बढ़कर एक विद्वान तथा कलाकार मौजूद थे, फिर भी अन्य राज्यों से भी योग्य व्यक्ति आकर उनसे अपनी योग्यता के अनुरुप आदर और पारितोषिक प्राप्त करते थे ।

एक दिन विक्रम के दरबार में दक्षिण भारत के किसी राज्य से एक विद्वान आया उसका मानना था कि विश्वासघात विश्व का सबसे नीच कर्म है । उसने राजा विक्रमादित्य को अपना विचार स्पष्ट करने के लिए एक कथा सुनाई ।

उसने कहा “आर्यावर्त में बहुत समय पहले एक राजा हुआ करता था । उसका भरा-पूरा परिवार था, फिर भी सत्तर वर्ष की आयु में उसने एक रूपवती कन्या से विवाह किया । वह नई रानी के रूप पर इतना अधिक मोहित हो चुका था कि उसे, उससे एक पल भी अलग होने का उसका मन नहीं करता था ।

वह राजा चाहता था कि हर क्षण उसका चेहरा उसके सामने ही रहे । वह नई रानी को दरबार में भी अपने बगल में बिठाने लगा । राजा के सामने कोई भी कुछ बोलने का साहस नहीं करता, मगर उसके पीठ पीछे सब उसका उपहास करते । राजा के महामन्त्री को यह बात बुरी लगी ।

उसने एकांत में राजा को समझाया कि सब उसकी इस अधीरता की आलोचना करते हैं, आड़े, तिरछे उपहास उड़ाते हैं । अगर वह हर पल नई रानी का चेहरा देखता रहना चाहता है तो उसकी अच्छी-सी तस्वीर बनवाकर राजसिंहासन के सामने रखवा दे । चूँकि इस राज्य में राजा के अकेले बैठने की परम्परा रही है, इसलिए उसका रानी को दरबार में अपने साथ लाना अशोभनीय है ।

महामन्त्री राजा का युवाकाल से ही मित्र जैसा था और राजा उसकी हर बात को गंभीरतापूर्वक लेता था । महामंत्री के इस प्रकार से समझाने पर उसे बात समझ में आ गयी | उसने महामन्त्री से किसी अच्छे चित्रकार को छोटी रानी के चित्र को बनाने का काम सौंपने को कहा । महामन्त्री ने एक बड़े ही योग्य चित्रकार को बुलवाया ।

चित्रकार ने बड़े मनोयोग से रानी का चित्र बनाना शुरू कर दिया । जब चित्र बनकर राजदरबार में आया, तो हर कोई उस बेजोड़ चित्रकार का प्रशंसक बन गया । बारीक से बारीक चीज़ को भी चित्रकार ने उस चित्र में उतार दिया था । चित्र ऐसा जीवंत था मानो छोटी रानी किसी भी क्षण बोल पड़ेगी ।

राजा को भी वह चित्र बहुत पसंद आया । तभी उसकी नज़र चित्रकार द्वारा बनाई गई रानी की जंघा पर गई, जिस पर चित्रकार ने बड़ी सफ़ाई से एक तिल दिखा दिया था । राजा सकते में आ गए | उनको शंका हुई कि रानी के गुप्त अंग भी चित्रकार ने देखे होंगे और क्रोधित होकर उस बूढ़े राजा ने चित्रकार से सारी सच्चाई बताने को कहा ।

भरे दरबार में चित्रकार ने उसे पूरी शालीनता से विश्वास दिलाने की कोशिश की कि प्रकृति ने उसे सूक्ष्म दृष्टि दी है जिससे उसे छिपी हुई बात भी पता चल जाती है । तिल उसी का एक प्रमाण है और उसने तिल को सुन्दरता बढाने के लिए दिखाने की कोशिश की है । उस बूढ़े सनकी राजा को उसकी बात का ज़रा भी विश्वास नहीं हुआ ।

उसने जल्लादों को बुलाकर तत्काल घने जंगल में जाकर उसकी गर्दन उड़ा देने का आदेश दिया तथा कहा कि उसकी आँखें निकालकर दरबार में उसके सामने पेश करें । लेकिन बुद्धिमान महामन्त्री को पता था कि चित्रकार द्वारा बतायी गयी सारी बातें सच हैं ।

उसने रास्ते में उन जल्लादों को धन का लोभ देकर चित्रकार को मुक्त करवा लिया तथा उन्हें किसी हिरण को मारकर उसकी आँखे निकाल लेने को कहा ताकि राजा के विश्वास हो जाए कि चित्रकार को खत्म कर दिया गया है । चित्रकार को लेकर महामन्त्री अपने भवन ले आये तथा चित्रकार वेश बदलकर उन्ही के साथ रहने लगा ।

कुछ दिनों बाद उस राजा का पुत्र शिकार खेलने गया, तो एक शेर उसके पीछे पड़ गया । राजकुमार जान बचाने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गया । तभी उसकी नज़र पेड़ पर पहले से मौजूद एक भालू पर पड़ी । भालू से जब वह भयभीत हुआ तो भालू ने उससे निश्चिन्त रहने को कहा । भालू ने उसे कहा कि वह भी उसी की तरह शेर से डरकर पेड़ पर चढ़ा हुआ है और शेर के जाने की प्रतीक्षा कर रहा है ।

शेर भूखा था और उन दोनों पर आँख जमाकर उस पेड़ के नीचे बैठ गया । राजकुमार को बैठे-बैठे नींद आने लगी और जगे रहना उसे मुश्किल दिख पड़ा । भालू ने अपनी ओर उसे बुला लिया और एक घनी शाखा पर कुछ देर सो लेने को कहा ।

भालू ने कहा कि जब वह सोकर उठ जाएगा तो वह जागकर रखवाली करेगा और भालू सोएगा जब राजकुमार सो गया तो शेर ने भालू को फुसलाने की कोशिश की । उसने कहा कि वह और भालू वन्य प्राणी हैं, इसलिए दोनों को एक दूसरे का भला सोचना चाहिए । मनुष्य कभी भी वन्य प्राणियों का मित्र नहीं हो सकता ।

उसने भालू से राजकुमार को गिरा देने को कहा जिससे कि वह उसे अपना भोजन बना सके । मगर भालू ने उसकी बात नहीं मानी तथा कहा कि वह विश्वासघात नहीं कर सकता । शेर मन मसोसकर रह गया । चार घंटों की नींद पूरी करने के बाद जब राजकुमार जागा, तो भालू की बारी आई और वह सो गया ।

शेर ने मौका देख कर अब राजकुमार को फुसलाने की कोशिश की । उसने कहा कि क्यों वह भालू के लिए दुख भोग रहा है । वह अगर भालू को गिरा देता है तो शेर की भूख मिट जाएगी और वह आराम से राजमहल लौट जाएगा ।

विश्वासघाती राजकुमार की आँखों में उसकी बातों को सुन कर चमक आ गयी । उसने धक्का देकर भालू को गिराने की कोशिश की । मगर भालू न जाने कैसे जाग गया और राजकुमार को विश्वासघाती कहकर खूब धिक्कारा । राजकुमार की अन्तरात्मा ने उसे इतना कोसा कि वह गूंगा हो गया ।

जब शेर भूख के मारे जंगल में अन्य शिकार की खोज में निकल गया तो वह गूंगा राजकुमार राजमहल पहुँचा । किसी को भी उसके गूंगा होने की बात समझ में नहीं आई । कई बड़े वैद्य आए, मगर राजकुमार का रोग किसी की समझ में नहीं आया । आखिरकार महामन्त्री के घर छिपा हुआ वह कलाकार वैद्य का रूप धरकर राजकुमार के पास आया ।

उसने गूंगे राजकुमार के चेहरे का भाव पढ़कर सब कुछ जान लिया । उसने राजकुमार को संकेत की भाषा में पूछ कि क्या आत्मग्लानि से पीड़ित होकर वह अपनी वाणी खो चुका है, तो राजकुमार फूट-फूट कर रो पड़ा ।

रोने से उस पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ा और उसकी खोई वाणी लौट आई । राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसने राजकुमार के चेहरे को देखकर सच्चाई कैसे जान ली तो चित्रकार ने जवाब दिया कि जिस तरह उस कलाकार ने उनकी रानी की जाँघ का तिल देख लिया था ।

राजा तुरन्त समझ गया कि वह वही कलाकार था जिसके वध की उसने आज्ञा दी थी । वह चित्रकार से अपनी भूल की माफी माँगने लगा तथा ढेर सारे इनाम देकर उसे सम्मानित किया । उस दक्षिण के विद्वान की कथा से विक्रमादित्य बहुत प्रसन्न हुए तथा उसके पाण्डित्य का सम्मान करते हुए उन्होंने उसे एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दी ।