उलूक-युयुत्सु, श्रुतकर्मा-शतानीक, शकुनि-सुतसोम और शिखण्डी-कृतवर्मा में महाभारत का भयानक युद्ध हुआ, अर्जुनके द्वारा अनेकों वीरों का संहार तथा दोनों ओर की सेनाओं में घमासान युद्ध

अर्जुनके द्वारा अनेकों वीरों का संहारमहाभारत युद्ध अपने अंतिम दौर में पहुँच चुका था और धृतराष्ट्र की उत्सुकता अपने चरम पर थी | युद्ध का हाल बताते हुए संजय ने उनसे कहा “राजन् ! एक ओर आपका पुत्र युयुत्सु कौरवों की भारी सेना को खदेड़ रहा था । यह देखकर उलूक बड़ी फुर्ती से उसके सामने आया । उसने क्रोध में भरकर एक क्षुरप्र से युयुत्सु का धनुष काट डाला और कर्णी बाण से उसे भी घायल कर दिया ।

युयुत्सु ने तुरंत ही दूसरा धनुष उठाया और साठ बाणों से उलूक पर एवं तीन से उसके सारथि पर वार करके फिर उसे अनेकों बाणों से बींध डाला । इसपर उलूक ने युयुत्सु को बीस बाणों से घायल कर उसकी ध्वजा को काट डाला, एक भल्ल से उसके सारथि का सिर उड़ा दिया, चारों घोड़ों को धराशायी कर दिया और फिर पाँच बाणों से उसे भी बींध डाला ।

महाबली उलूक के प्रहार से युयुत्सु बहुत ही घायल हो गया और एक दूसरे रथ पर चढ़कर तुरंत ही वहाँ से भाग गया । इस प्रकार युयुत्सु को परास्त करके उलूक झटपट पांचाल और संजय वीरों की ओर चला गया । दूसरी ओर आपके पुत्र श्रुतकर्मा ने शतानीक के रथ, सारथि और घोड़ों को नष्ट कर दिया । तब महारथी शतानीक ने क्रोध में भरकर उस अश्वहीन रथ में से ही आपके पुत्र पर एक गदा फेंकी ।

वह उसके रथ, सारथि और घोड़ों को भस्म करके पृथ्वी पर जा पड़ी । इस प्रकार ये दोनों ही वीर रथहीन होकर एक- दूसरे की ओर देखते हुए रणांगण से खिसक गये | इसी समय शकुनि ने अत्यन्त पैने बाणों से सुतसोम को घायल कर दिया । किन्तु इससे वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ । उसने अपने पिता के परम शत्रु को सामने देखकर उसे हजारों बाणों से आच्छादित कर दिया ।

किंतु शकुनि ने दूसरे बाण छोड़कर उसके सभी तीरों को काट डाला । इसके बाद उसने सुतसोम के सारथि, ध्वजा और घोड़ों को भी तिल-तिल करके काट डाला । तब सुतसोम अपना श्रेष्ठ धनुष लेकर रथ से कूद कर पृथ्वी पर खड़ा हो गया और बाणों की वर्षा करके आपके साले के रथ को आच्छादित करने लगा ।

किंतु शकुनि ने अपने बाणों की बौछार से उन सब बाणों को नष्ट कर दिया । फिर अनेकों तीखे तीरों से उसने सुतसोम के धनुष और तरकसों को भी काट डाला । अब सुतसोम एक तलवार लेकर भ्रान्त, उद्घान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्लुत, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि चौदह गतियों से उसे सब ओर घुमाने लगा ।

इस समय उस पर जो बाण छोड़ा जाता था, उसे ही वह तलवार से काट डालता था । उसकी तलवार इस प्रकार से और इतनी गति से घूम रही थी कि कोई भी अस्त्र या शास्त्र उस तक पहुँच ही नहीं पा रहा था, उस पर छोड़े गए सारे अस्त्र-शास्त्रों को वो तलवार बीच में ही काट दे रही थी | इस पर शकुनि ने अत्यन्त कुपित होकर उस पर सर्पो के समान विषैले बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी ।

परंतु सुतसोम ने अपने शस्त्र कौशल और पराक्रम से उन सबको काट डाला । इसी समय शकुनि ने एक अमोघ शक्ति से उसकी तलवार के दो टुकड़े कर दिये । सुतसोम ने अपने हाथ में रहे हुए तलवार के आधे भाग को ही शकुनि पर खींचकर मारा । वह उसके धनुष और धनुष की डोरी को काटकर पृथ्वी पर जा पड़ा ।

इसके बाद वह फुर्ती से श्रुतकीर्ति के रथ पर चढ़ गया तथा शकुनि भी एक दूसरा भयानक धनुष लेकर अनेकों शत्रुओं का संहार करता हुआ दूसरे स्थान पर पाण्डवों की सेना के साथ संग्राम करने लगा । दूसरी ओर शिखण्डी कृतवर्मा से भिड़ा हुआ था । उसने उसकी हँसली में पाँच तीक्ष्ण बाण मारे । इस पर महारथी कृतवर्मा ने क्रोध में भरकर उस पर साठ बाण छोड़े और फिर हँसते-हँसते एक बाण से उसका धनुष काट डाला ।

महाबली शिखण्डी ने तुरंत ही दूसरा धनुष ले लिया और उससे कृतवर्मा पर अत्यन्त तीक्ष्ण नब्बे बाण छोड़े । वे उसके कवच से टकराकर नीचे गिर गये । तब उसने एक पैने बाण से कृतवर्मा का धनुष काट डाला तथा उसकी छाती और भुजाओं पर अस्सी बाण छोड़े । इससे उसके सब अंगों से रुधिर बहने लगा । अब कृतवर्मा ने दूसरा धनुष उठाया और अनेकों तीखे बाणों से शिखण्डी के कंधों पर प्रहार किया ।

इस प्रकार वे दोनों वीर एक-दूसरे को घायल करके लहूलुहान हो रहे थे तथा दोनों ही एक-दूसरे के प्राण लेने पर तुले हुए थे । इसी समय कृतवर्मा ने शिखण्डी का प्राणान्त करने के लिये एक भयंकर बाण छोड़ा । उसकी चोट से वह तत्काल मूर्छित हो गया और विह्वल होकर अपनी ध्वजा के डंडे के सहारे बैठ गया । यह देखकर उसका सारथि उसे तुरंत ही रणभूमि से हटा ले गया ।

इससे पाण्डवों की सेना के पैर उखड़ गये और वह इधर उधर भागने लगी । महाराज ! इस समय अर्जुन आपकी सेना का संहार कर रहे थे । आपकी ओर से त्रिगत, शिबि, कौरव, शाल्व, संशप्तक और नारायणी सेना के वीर उनसे टक्कर ले रहे थे । सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, सुतंजय, सौश्रुति, चित्रसेन, मित्रवर्मा और भाइयों से घिरा हुआ त्रिगतराज-ये सभी वीर संग्राम भूमि में अर्जुन पर तरह-तरहके बाणसमूहों की वर्षा कर रहे थे |

योद्धा लोग अर्जुन से सैकड़ों और हजारों की संख्या में टक्कर लेकर लुप्त हो जाते थे । इसी समय उन पर सत्यसेन ने तीन, मित्रदेव ने तिरसठ, चन्द्रदेव ने सात, मित्रवर्मा ने तिहत्तर, सौश्रुति ने सात, शत्रुंजय ने बीस और सुशर्मा ने नौ बाण छोड़े । इस प्रकार संग्राम भूमि में अनेकों योद्धाओं के बाणों से बिंधकर अर्जुन ने बदले में उन सभी राजाओं को घायल कर दिया या मार डाला ।

उन्होंने सात बाणों से सौश्रुति को, तीन से सत्यसेन को, बीस से शत्रुंजय को, आठ से चन्द्रदेव को, सौ से मित्रदेव को, तीन से श्रुतसेन को, नौ से मित्रवर्मा को और आठ से सुशर्मा को बींधकर अनेकों तीखे बाणों से शत्रुंजय को मार डाला, सौश्रुति का सिर धड़ से अलग कर दिया, इसके बाद फौरन ही चन्द्रदेव को अपने बाणों से यमराज के घर भेज दिया और फिर पाँच-पाँच बाणों से दूसरे महारथियों को आगे बढ़ने से रोक दिया ।

इसी समय सत्यसेन ने क्रोध में भरकर श्रीकृष्ण पर एक विशाल तोमर फेंका और बड़ी भीषण गर्जना की । वह तोमर उनकी दायीं भुजा को घायल करके पृथ्वी पर जा पड़ा । इस प्रकार श्रीकृष्ण को घायल हुआ देख महारथी अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से सत्यसेन की गति रोककर फिर उसका कुण्डलमण्डित विशाल मस्तक धड़ से अलग कर दिया ।

इसके बाद उन्होंने अपने पैने बाणों से मित्रवर्मा पर आक्रमण किया तथा एक तीखे वत्सदन्त से उसके सारथि पर चोट की फिर महाबली अर्जुन ने सैकड़ों बाणों से संशप्तकों पर वार किया और उनमें से सैकड़ों-हजारों वीरों को धराशायी कर दिया । उन्होंने एक क्षुरप्र से मित्रसेन का मस्तक उड़ा दिया और सुशर्मा की हँसली पर चोट की ।

इसपर सारे संशप्तक वीर उन्हें चारों ओर से घेरकर तरह-तरह के शस्त्रों से पीड़ित करने लगे । अब महारथी अर्जुन ने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया । उसमें से हजारों बाण निकलने लगे, जिनकी चोट से अनेकों राजकुमार, क्षत्रियवीर और हाथी-घोड़े पृथ्वी पर लोट-पोट हो गये । इस प्रकार जब धनुर्धर धनंजय संशप्तकों का संहार करने लगे तो उनके पैर उखड़ गये । उनमेंसे अधिकांश वीर पीठ दिखाकर भाग गये ।

इस प्रकार वीरवर अर्जुन ने उन्हें रणांगण में परास्त कर दिया । राजन् ! दूसरी ओर महाराज युधिष्ठिर बाणों की वर्षा कर रहे थे । उनका सामना स्वयं राजा दुर्योधन ने किया । धर्मराज ने उसे देखते ही बाणों से बींध डाला । इस पर दुर्योधन ने नौ बाणों से युधिष्ठिर पर और एक भल्ल से उनके सारथि पर चोट की । तब तो धर्मराज ने दुर्योधन पर तेरह बाण छोड़े ।

उनमें से चार से उसके चारों घोड़ों को मारकर पाँचवें से सारथि का सिर उड़ा दिया, छठे से उसकी ध्वजा काट डाली, सातवै से धनुष के टुकड़े कर दिये, आठवें से तलवार काटकर पृथ्वी पर गिरा दी और शेष पाँच बाणों से स्वयं दुर्योधन को पीड़ित कर डाला । अब आपका पुत्र उस अश्वहीन रथ से कूद पड़ा । दुर्योधन को इस प्रकार विपत्ति में पड़ा देखकर कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि योद्धा उसकी रक्षाके लिये आ गये |

इसी समय सब पाण्डव लोग भी महाराज युधिष्ठिर को घेरकर संग्राम भूमि में बढ़ने लगे । बस, अब दोनों ओर से खूब संग्राम होने लगा । दोनों ही पक्ष के वीर, वीरधर्म के अनुसार एक-दूसरे पर प्रहार करते थे; जो कोई पीठ दिखाता था, उस पर कोई चोट नहीं करता था । राजन् ! इस समय योद्धाओं में बड़ी मुक्का-मुक्की और हाथा-पाई हुई । वे एक-दूसरे के केश पकड़कर खींचने लगे । युद्ध का जोर यहाँ तक बढ़ा कि अपने-पराये का ज्ञान भी लुप्त हो गया ।

इस प्रकार जब घमासान युद्ध होने लगा तो योद्धालोग तरह-तरह के शस्त्रों से अनेक प्रकार से एक-दूसरे के प्राण लेने लगे । रणभूमि में सैकड़ों-हजारों कबन्ध खड़े हो गये । उनके शस्त्र और कवच खून में लथपथ हो रहे थे । इस समय योद्धाओं को यद्यपि अपने=पराये का ज्ञान नहीं रहा था, तो भी वे युद्ध को अपना कर्तव्य समझकर विजय की लालसा से बराबर जूझ रहे थे ।

उनके सामने अपना या पराया-जो भी आता, उसी का वे सफाया कर डालते थे । संग्रामभूमि दोनों ओर के वीरोंसे खलबला-सी रही थी तथा टूटे हुए रथ और मारे हुए हाथी, घोड़े एवं योद्धाओं के कारण अगम्य-सी हो गयी थी । वहाँ क्षण में खून की नदी बहने लगती थी । कर्ण पांचालों का, अर्जुन त्रिगातों का और भीमसेन कौरव तथा गजारोही सेना का संहार कर रहे थे। इस प्रकार तीसरे पहर तक यह कौरव और पाण्डव-सेनाओं का भीषण संहार चलता रहा |