कर्ण वध के पश्चात्, दुर्योधन का पाण्डव सेना में अपना पराक्रम दिखाना, अपनी भागती हुई सेना को प्रेरित करते हुए एकत्रित करने का असफल प्रयास करना और अंत में घोर विलाप करना

Duryodhanaकर्ण वध के पश्चात्, युद्ध स्थल का आँखों देखा हाल बताते हुए संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं-महाराज ! उस समय कौरव-सैनिक भीमसेन के भय से व्याकुल होकर भाग रहे थे । उनकी यह अवस्था देख दुर्योधन हाहाकार करके उठा और अपने सारथि से बोला “सूत ! तुम धीरे धीरे घोड़ों को आगे बढ़ाओ । जब हाथ में धनुष लेकर मैं अपनी सम्पूर्ण सेना के पीछे खड़ा रहूँगा, उस समय अर्जुन मुझे परास्त नहीं कर सकते ।

यदि वो मुझसे लड़ने आएगा तो निस्सन्देह मै उसे मार डालूँगा । आज मैं अर्जुन, श्रीकृष्ण तथा घमंडी भीमसेन को बचे-खुचे अन्य शत्रुओं के साथ मौत के घाट उतारकर कर्ण के ऋण से मुक्त होऊँगा । दुर्योधन की यह शूरवीरों के योग्य बात सुनकर सारथि ने घोड़ों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया । आपकी ओर से युद्ध के लिये पचीस हजार पैदल खड़े थे, उन्हें भीमसेन और धृष्टद्युम्न ने अपनी चतुरंगिणी सेना से घेर लिया और बाणों से मारना आरम्भ किया ।

वे भी भीम और धृष्टद्युम्न का डटकर मुकाबला करने लगे । उस समय भीमसेन क्रोध में भरकर हाथ में गदा लिये रथ से उतर पड़े और उन सबके साथ युद्ध करने लगे । भीमसेन युद्धधर्म का पालन करने वाले थे, इसीलिये स्वयं रथ पर बैठकर उन्होंने उन पैदलों के साथ युद्ध नहीं किया । उन्हें अपने बाहुबल का पूरा भरोसा था । गदा हाथ में लिये बाज की तरह विचरते हुए महाबली भीम ने आपके पचीसों हजार योद्धाओं को मार गिराया ।

एक ओर से अर्जुन ने रथियों की सेना पर धावा किया । फिर तो उनमें भयंकर युद्ध होने लगा । उधर, अर्जुन को आते देख आपके योद्धा भय के मारे भागने लगे । बहुतों के रथ टूट गये, बहुत-से सायकों की मार से अत्यन्त घायल हो गये; इस प्रकार अर्जुन के भी हाथ से मारे जाकर पचीस हजार योद्धा काल के गाल में समा गये | इधर, धृष्टद्युम्न के डर से आपके सैनिकों में भगदड़ पड़ गयी ।

चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदी के पुत्र आपकी बड़ी भारी सेना का संहार करके शंख बजाने लगे । उन्होंने आपके भागते हुए सैनिकों का भी पीछा किया । इसके बाद अर्जुन ने पुनः रथ सेना पर चढ़ाई की और अपने विश्वविख्यात गाण्डीव धनुष की टंकार करते हुए उन्होंने सहसा सबको बाणों से ढक दिया । पृथ्वी से धूल उठी और चारों ओर घना अन्धकार छा गया ।

किसी को कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था । उस समय कौरव-सेना में फिर से भगदड़ पड़ी-यह देख आपके दूसरी ओर नकुल, सहदेव तथा सात्यकि-ये तीनों मिलकर दुर्योधन की सेना का संहार करते हुए शकुनि के ऊपर जा चढ़े । शकुनि के बहुत-से घुड़सवारों को अपने तीखे बाणों से मारकर वे उसकी ओर भी दौड़े । पुत्र दुर्योधन ने शत्रुओं पर धावा किया और पाण्डवों को युद्ध के लिये ललकारा ।

पाण्डव-सेना दुर्योधन पर टूट पड़ी । उसने भी क्रोध में भरकर सैकड़ों और हजारों योद्धाओं को यम लोक पठा दिया । उस युद्ध में हम लोगों ने दुर्योधन का अद्भुत पुरुषार्थ देखा, वह अकेला होने पर भी समस्त पाण्डव-सेना से युद्ध कर रहा था ।

दुर्योधन ने जब अपनी सेना पर दृष्टिपात किया तो सबको दुःखी पाया; तब उसने सबका उत्साह बढ़ाते हुए कहा “योद्धाओ ! मैं जानता हूँ तुम भय से काँप रहे हो; परंतु मेरे देखने में ऐसा कोई भी देश नहीं है, जहाँ तुम लोग भागकर जाओ और वहाँ पाण्डवों से तुम्हारी जान बच जाय । ऐसी दशा में भागने से क्या लाभ है ?

अब शत्रुओं के पास थोड़ी-सी सेना रह गयी है, श्री कृष्ण और अर्जुन भी खूब घायल हो चुके हैं, आज मैं इन सब लोगों को मार डालूँगा । हम लोगों की विजय निश्चित है । जितने क्षत्रिय यहाँ उपस्थित हैं, सब ध्यान देकर सुन लें-जब मौत शूरवीर और कायर दोनों को ही मारती है तो मेरे-जैसा क्षत्रियव्रत का पालन करने वाला होकर भी कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो युद्ध नहीं करेगा ?

हमारा शत्रु भीमसेन क्रोध में भरा हुआ है; यदि भागोगे तो उसके वश में पड़कर तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा । इसलिये बाप-दादों के आचरण किये हुए क्षत्रियधर्म का त्याग न करो | क्षत्रिय के लिये युद्ध में पीठ दिखाकर भागने से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है तथा युद्ध धर्म के पालन से बढ़कर स्वर्ग का दूसरा कोई मार्ग नहीं है । संग्राम में मरा हुआ योद्धा तुरंत उत्तम लोक प्राप्त करता है” ।’

आपका पुत्र इस प्रकार व्याख्यान देता ही रह गया, किंतु घायल सैनिकों में से किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया । सब-के-सब चारों ओर भाग गये । उस समय मद्रराज शल्य ने दुर्योधन से कहा “राजन् ! जरा इस रणभूमि की ओर तो दृष्टि डालो, कितने मनुष्यों और घोड़ों की लाशें बिछी हुई हैं, पर्वताकार गजराज बाणों से छिन्न-भिन्न होकर मरे पड़े हैं और ये शूरवीर सैनिक नाना प्रकार के भोग, वस्त्राभूषण, मनोरम सुख तथा शरीर को भी त्यागकर धर्म की पराकाष्ठा का पालन करते हुए अपने यश के साथ ही स्वर्गादि लोकों में पहुँच गये हैं । दुर्योधन ! अब ये सूर्यदेव ! अस्ताचल को जाना ही चाहते हैं, तुम भी छावनी की ओर लौट चलो” ।

राजा शल्य इतना कह कर चुप हो गये । उनका चित्त शोक से व्याकुल हो रहा था । उधर दुर्योधन की भी बड़ी दयनीय अवस्था थी, वह आर्त होकर ‘हा कर्ण! हा कर्ण!!’ पुकार रहा था । उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी । अश्वत्थामा तथा दूसरे दूसरे राजालोग आकर उसे बारंबार धीरज बँधाते रहे |