क्या लोहे को सोने में बदलना संभव है ?

क्या लोहे को सोने में बदलना संभव हैबचपन से हम ‘पारस पत्थर’ की कहानियाँ सुनते चले आएं हैं कि इस जादुई पत्थर में लोहे को सोने में बदल देने की ताक़त थी | ये बात और है कि न तो हम में से किसी ने पारस पत्थर को देखा है और ना ही हमें कहानियाँ सुनाने वालों ने कभी देखा था | फिर ये कहानियाँ कहाँ से और कब से प्रचलित हुईं ?

अतीत में, इसी पारस पत्थर की अवधारणा ने विदेशी विद्वानों में भी हलचल मचा रखी थी जिसकी वजह से उन्होंने अल्केमी (रसायन विद्या) में अपनी ख़ोज जारी रखी | न्यूटन जैसे बड़े वैज्ञानिक भी अपने आप को पारस पत्थर के सम्मोहक पाश से बचा नहीं पाए, अंतिम समय उनकी खोजों के जाल इसी के आस-पास मंडराते रहे |

पारस पत्थर का अस्तित्व इस दुनिया में कभी था या नहीं ये तो रहस्य के गर्भ में हैं, लेकिन ज्ञान की इस पावन धरती (भारत वर्ष) पर ‘सूर्य-विज्ञान’ के सिध्हस्त वैज्ञानिक ज़रूर रहे हैं जिन्होंने दुनिया को बताया कि सूर्य विद्या से सब कुछ सम्भव है |

क्या है ये सूर्य-विद्या ? सूर्य-विद्या के सिद्धांतों पर चर्चा करने की बजाय हम आपको ‘महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज’ (जो कि सूर्य-विद्या के स्वयं बहुत बड़े ज्ञाता थे) जी का एक अविस्मर्णीय अनुभव उन्ही के शब्दों में बताते हैं-

“काफी समय पहले की बात है, जिस दिन से मुझे श्री विशुद्धानंद जी महाराज का पता लगा था तभी से उनके सम्बन्ध में बहुत सी अलौकिक शक्तियों की बातें सुनने को मिल रही थी | बातें इतनी असाधारण थी कि उन पर सहसा कोई भी विश्वास नहीं कर सकता था |

हांलाकि मैंने कई योगी एवं सिद्ध महात्माओं की कथाएं ग्रंथों में पढ़ी थी और उनके जीवन में घटित अनेक अलौकिक घटनाओं पर मेरा विश्वास भी था लेकिन फिर भी आज, हम लोगों के बीच में ऐसा कोई योगी महात्मा विद्यमान है यह बात प्रत्यक्षदर्शी के मुह से सुनकर भी ठीक से विश्वास नहीं हो रहा था |

उस समय संध्या निकट थी, सूर्यास्त में कुछ ही समय बचा था | मैंने जा कर देखा, बहुत सारे भक्तों और दर्शकों से घिरे हुए, एक अलग आसन पर, एक सौम्यमूर्ति महापुरुष व्याघ्र-चर्म पर विराजमान हैं |

उनकी सुन्दर लम्बी दाढ़ी है, चमकती हुई विशाल आँखें हैं, पकी हुई उम्र, गले में सफ़ेद जनेऊ, शरीर पर काषाय वस्त्र और पैरों पर भक्तों द्वारा चढ़ाए गए फूल और फूलमालाओं के ढेर लगे हुए थे | पास में ही एक स्वच्छ कश्मीरी उपल से बना हुआ एक विचित्र यंत्र रखा था | वो महात्मा उस समय योगविद्या और प्राचीन आर्षविज्ञान के गूढ़तम रहस्यों की बड़े सामान्य रूप से व्याख्या कर रहे थे |

कुछ समय तक उनका उपदेश सुनने पर ऐसा लगा की इनमे असाधारण विशेषता है क्योकि उनकी प्रत्येक बात पर इतना जोर था मानो वो अपनी अनुभवसिद्ध बात कह रहे हों | इतना ही नहीं, बीच में वे ऐसा भी कह रहे थे कि शास्त्र की सभी बातें सत्य है, आवश्यकता पड़ने पर किसी भी समय योग्य अधिकारी को मै दिखला भी सकता हूँ |

उस समय वो समझा रहे थे कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में सर्वत्र ही सत्तामात्र रूप में, सूक्ष्म भाव से सारे पदार्थ विद्यमान रहते हैं परन्तु जिसकी मात्रा अधिक प्रस्फुटित रहती है वही अभिव्यक्त होता है और हमें वही दिखाई एवं सुनाई पड़ता है |

हम व्यव्हार जगत में जिस पदार्थ को जिस रूप में पहचानते हैं, वह उसकी आपेक्षित सत्ता है | वह केवल, हम जिस रूप में पहचानते हैं, वही है- ऐसा किसी को नहीं समझना चाहिए | लोहे का टुकड़ा केवल लोहा ही है, ऐसा किसी को नहीं समझना चाहिए बल्कि उसमे सारी प्रकृति ही निहित होती है |

परन्तु लौह भाव की प्रधानता से अन्यान्य समस्त भाव उसमे विलीन होकर अदृश्य हो रहे हैं | किसी भी विलीन (अदृश्य) भाव को (जैसे सोना) उसमे प्रत्यक्ष कर के उसकी मात्रा बढ़ा दी जाय तो पहले वाला लौह भाव स्वाभाविक रूप से अव्यक्त (अदृश्य) हो जाएगा और फिर उस में स्वर्ण के प्रत्यक्ष भाव के प्रबल हो जाने से वो वस्तु सोने (स्वर्ण) के रूप में ही जानी समझी जायेगी |

प्रकृति द्वारा रची गयी इस सृष्टि में सर्वत्र ऐसा ही है | वस्तुतः यहाँ लोहा, सोना नहीं हुआ, बल्कि वह अव्यक्त (अदृश्य) हो गया और स्वर्ण (उस वस्तु में) अपनी अव्यक्तता को हटाकर उस वस्तु में प्रकाशित हो गया | योगशास्त्र में इसी को ‘जात्यंतर परिणाम’ कहते हैं |

पतंजलि जी कहते हैं कि प्रकृति के ‘आपूरण’ से जात्यंतर परिणाम होता है – यानि एक जातीय वस्तु अन्य जातीय वस्तु में बदल जाती है | ये कैसे होता है, इसकी प्रक्रिया क्या है यह भी योगशास्त्र में बताया गया है [लेकिन समय तथा स्थानाभाव से उसका वर्णन यहाँ नहीं किया जा रहा है, यदि आदरणीय पाठकों की इच्छा हुई तो उसका वर्णन भी एक अन्य लेख में किया जाएगा] |

कुछ देर तक जिज्ञासु रूप में मेरे पूछताछ करने पर उन्होंने मुझसे कहा- तुम्हे यह कर के दिखाता हूँ | इतना कह कर उन्होंने आसन पर से एक गुलाब का फूल उठाया और हाँथ में ले कर मुझसे पूछा “बोलो इसको किस रूप में बदल दिया जाय ?” वहां चारो तरफ कहीं भी जवाफूल नहीं था इसी से मैंने उन्हें उसको जवाफूल बना देने को कहा |

उन्होंने मेरी बात स्वीकार कर ली और बाएं हाँथ में गुलाब का फूल लेकर दाहिने हाँथ से, उस स्फटिक यंत्र के द्वारा उस पर पड़ने वाली सूर्य-रश्मियों को संहत करने लगे | मैंने स्पष्ट देखा कि उसमे क्रमशः एक स्थूल परिवर्तन होने लगा था |

पहले उसमे से एक लाल आभा सी प्रस्फुटित हुई और धीरे-धीरे पूरा गुलाब का फूल विलीन होकर अव्यक्त हो गया और उसकी जगह एक ताज़ा, हाल का खिला हुआ जवा का फूल प्रकट हो गया | कौतूहल वश उस जवापुष्प को मै अपने घर ले आया था |

श्री विशुद्धानंद जी ने बताया कि इसी प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकृति का खेल रहा है | जो प्रकृति की इस लीला के तत्वों को कुछ समझते हैं, वे ही ज्ञानी हैं और जो नहीं जानते वो इससे मोहित होकर आत्मविस्मृत हो जाते हैं |

मैंने पूछा “इस फूल का परिवर्तन आपने योगबल से किया या किसी और उपाय से ?” स्वामी जी बोले अभी मैंने ये फूल सूर्य-विज्ञान द्वारा बनाया है, हाँलाकि योगबल या शुद्ध इच्छाशक्ति से भी सृष्टि के सारे कार्य किये जा सकते हैं लेकिन बिना इच्छाशक्ति और योगबल का प्रयोग किये विज्ञान की सहायता से भी इस तरह के कार्य किये जा सकते हैं |

फिर मैंने पूछा ‘सूर्य-विज्ञान’ क्या है ? उन्होंने जवाब दिया “जो व्यक्ति सूर्य की रश्मियों या उसकी वर्णमालाओं को अच्छे तरीके से पहचान गया है और उसके वर्णों (Spectrum) को शोधित (Filter) करके परस्पर मिश्रित करना (मिलाना) सीख गया है, वह सहज ही सभी पदार्थों का संघटन (Fusion) या विघटन (Fission) कर सकता है |

वह देख सकता है कि सभी पदार्थों का मूल बीज इन रश्मि वर्णों के विभिन्न प्रकार के संयोग से ही उत्पन्न होता है | वर्ण-भेद से और विभिन्न वर्णों के संयोग से भेद, अलग-अलग ‘पद’ (Level) उत्पन्न होते हैं और ठीक इसी प्रकार से रश्मि-भेद से और विभिन्न रश्मियों के मिश्रण भेद से, इस सृष्टि के हर तरह के पदार्थ उत्पन्न होते हैं | रश्मियों को शुद्ध रूप से पहचान कर उनकी योजना करना ही सूर्य-विज्ञान का मुख्य विषय है |

जो लोग ऐसा कर सकते हैं, वे सभी स्थूल और सूक्ष्म कार्य करने में समर्थ होते हैं | सुख-दुःख, पाप-पुण्य, काम-क्रोध, लोभ, प्रीति, भक्ति आदि सभी वृत्तियाँ और संस्कार भी रश्मियों के संयोग से ही उत्पन्न होते हैं, स्थूल वस्तुओं के लिए तो कुछ कहना ही नहीं हैं |

इसलिए जो लोग इस योजन और वियोजन की प्रणाली को जानते हैं, वे सब कुछ कर सकते हैं-निर्माण भी कर सकते हैं और संहार भी, परिवर्तन की तो कोई बात ही नहीं है, यही सूर्य-विज्ञान है” | मैंने पूछा “आपको यह कहाँ से मिला ? मैंने तो कहीं भी इस विज्ञान का नाम नहीं सुना” उन्होंने हँसकर कहा, “तुम लोग सुन भी कैसे सकते हो, तुम लोगों का ज्ञान ही कितना है |

यह विज्ञान भारत-वर्ष की ही वस्तु है, उच्च कोटि के ऋषि-मुनि लोग इसको जानते थे और उपयुक्त क्षेत्र में ही इसका प्रयोग किया करते थे | अब भी इस विज्ञान के पारदर्शी विद्वान आचार्य मौजूद हैं |

वे हिमालय और तिब्बत में गुप्त रूप से रहते हैं | मैंने स्वयं तिब्बत में ‘ज्ञानगंज’ नाम के एक बहुत बड़े योगाश्रम में रहकर एक योगी और वैज्ञानिक महापुरुष से लम्बे समय तक कठोर साधना करके इस विद्या को तथा ऐसी ही और भी अनेक लुप्त विद्याओं को सीखा है |

यह अत्यंत ही जटिल और दुर्गम विषय है- इसकी जिम्मेदारी भी अत्यंत अधिक है इसलिए आचार्य गण सभी को ये विषय नहीं सिखाते | मैंने पूछा “क्या इस प्रकार की और भी विद्याएँ हैं”? उन्होंने कहा “हाँ…हैं…..जैसे चन्द्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, वायु विज्ञान, क्षण विज्ञान, शब्द विज्ञान और मनोविज्ञान आदि बहुत विद्याएँ हैं | केवल नाम सुनकर तुम क्या समझोगे” ?
………..क्रमशः