फिर वो कभी नहीं सोया

फिर वो कभी नहीं सोयामनुष्य सामान्य रूप से दिन में छह से आठ घंटे सोता है जो उसके दैनिक जीवन के क्रिया-कलाप के लिए अति आवश्यक है | हिन्दू धर्म-ग्रंथों में प्राचीन ऋषि-मुनि योगनिद्रा की बात करते हैं जिसमे मनुष्य अपनी समस्त प्रकार की स्थूल और सूक्ष्म गतिविधियों को बंद कर देता है | ऐसी अवस्था में उसके ऊपर काल का कोई प्रभाव नहीं होता |

लेकिन भारतीय योगियों एवं तत्वदर्शियों ने ऐसी भी यौगिक साधनाओं का विकास किया जिनसे जीव चेतना अपने चिर जागृत , प्रखर और कारण शरीर में अवस्थित हो जाती है ऐसे योगी को निद्रा की भी आवश्यकता नहीं रहती | गीता में कृष्ण ने महान् योगाभ्यासी अर्जुन को निद्राजित बताया है अर्थात् आत्म चेतना में प्रविष्ट व्यक्ति सोये या न सोये उससे उनके शरीर ,मन और जीवन पर कोई दबाव नहीं आता । लेकिन  ऐसा किसी असामान्य लौकिक घटना के प्रभाव से भी हो सकता है |

यहाँ हम आपको, इस संसार में घटी एक ऐसी ही घटना बताने जा रहे हैं जिससे उक्त दर्शन की पुष्टि होती हैं। आरमण्ड लुहरवेट नाम का एक फ्रांसीसी वकील ऐसा अद्भुत व्यक्ति था जो लगातार 71 वर्ष तक एक दिन तो क्या एक मिनट भी नहीं सोया।

सन् 1791 में पेरिस में जन्मे अरमाण्ड उस समय कुल 2 वर्ष के थे जब 21 जनवरी 1793 को उनकी माँ उन्हें लेकर सम्राट लुई सोलहवें का मृत्यु दण्ड देखने गई। वहाँ का वीभत्स दृश्य देखकर सहमा हुआ बच्चा जब घर आया तो काफ़ी बदहवास था | वह उछल कूद मचा रहा था तभी ऊपर रखी कोई भारी वस्तु उसके सिर पर गिरी उससे सिर में गंभीर चोट आई | बच्चे को तुरंत अस्पताल पहुँचाना पड़ा।

कई दिन तक लगातार बेहोश रहने के बाद जब चेतना वापस लौटी तब न जाने शरीर के किस हिस्से में क्या परिवर्तन हुआ, कौन सी चेतना का उदय हुआ कि उस बच्चे को नींद आना ही समाप्त हो गयी । एक दिन, दो दिन, सप्ताह महीनों तक प्रतीक्षा की जाती रही किन्तु एक बार गई नींद फिर दोबारा आई ही नहीं । ट्रैनकुलाइजर्स (Tranquillizers-नींद लाने वाली औषधियां) से लेकर मालिश तक अनेक तरह के उपचार कर लिये गये पर फिर उस बच्चे को नींद आई ही नहीं।

परिजनों को चिन्ता इस बात की थी कि न सो पाने के कारण बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा | एक-दो दिन ही न सोने पर सामान्य आदमी का मन उद्विग्न हो उठता है, विक्षिप्तता आने लगती है, सामान्य व्यक्ति यदि आठ घण्टे की नींद प्रतिदिन न ले तो उसे जीवन चलाना कठिन हो जाये पर आश्चर्य है कि आरमाण्ड के बारे में की गई ऐसी सारी धारणायें गलत साबित हुई।

ऐसा नहीं था कि उनकी शारीरिक या मानसिक क्षमता में कोई कमी आई थी, वह नियमित रूप से पढ़े, शारीरिक श्रम करते रहे पढ़ लिखकर वकील बन गये, रात में जब लोग सोया करते तब भी वह मुकदमों के मजमून बनाया करते थे या पिछली कोई पुस्तक पढ़ते रहते पर नींद तो घंटों लेटे रहने पर भी उनको नहीं आती थी । 73 वर्ष की आयु में आरमाण्ड की मृत्यु 1864 में हुई। इस बीच उन्हें एक क्षण को भी नींद नहीं आई।

योगवशिष्ठ में जीवात्मा की ऐसी स्थिति के बारे में वर्णन आया है–

कस्मिंश्चित्प्ताक्तनेकल्पेकस्मिंश्चज्जागतिक्वचित्अनिद्रालव एवान्तः संकल्पैक पराः स्थिताः॥ -योग वशिश्ठ 6।2।50।1

अर्थात्-जीव बिना सोये हुए इस कल्प या इस जगत में जब केवल मस्तिष्कीय चेतना में रहते हैं अर्थात् एकल संकल्प स्थिति में रहते हैं तब यह अवस्था होती है।

इस सृष्टि में अनंत रहस्य है ज़रूरी नहीं कि इस लौकिक सृष्टि के सारे रहस्यों के मूल में भौतिक कारण ही हों | जड़ जगत का नियंत्रण चेतन सत्ता के हाँथ में ही होता होता है लेकिन उस स्तर का कंट्रोल हासिल करने के लिए अपनी चेतना का भी विस्तार उसी स्तर का होना चाहिए अन्यथा सब कुछ दिवास्वप्न जैसा ही लगता है |