यह 16वीं सदी के अमेरिका की एक ऐसी सच्ची और रौंगटे खड़े कर देने वाली घटना है, जिसे इतिहासकार “द लॉस्ट कॉलोनी ऑफ़ रोअनोक” (The Lost Colony of Roanoke) के नाम से जानते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह एक ऐसा रहस्य है जिसका जवाब आज लगभग 440 साल बाद भी आधुनिक विज्ञान और इतिहास के पास नहीं है। तो आइये प्रारम्भ से समझते हैं इस घटना को।
ये साल था 1587 का। अमेरिका तब आज जैसा विकसित देश नहीं था, बल्कि एक अनजान, जंगली और रहस्यमयी महाद्वीप था। दुनिया में होड़ मची थी इस पर कब्जे की। इसी क्रम में ब्रिटिश साम्राज्य भी इस नई दुनिया में अपना कब्ज़ा जमाना चाहता था। इसी उद्देश्य से इंग्लैंड से 115 साहसी लोगों का एक समूह अमेरिका के लिए निकला। इनमें 87 पुरुष, 17 महिलाएं और 11 बच्चे शामिल थे।
इस दल का नेता और गवर्नर था जॉन व्हाइट । कई हफ़्तों की खतरनाक समुद्री यात्रा के बाद, यह दल अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित रोअनोक द्वीप पर उतरा। उन्होंने वहां पर लकड़ियों के घर बनाए, खाने पीने की व्यवस्था की और एक छोटी सी बस्ती बसा ली।
सब कुछ ठीक चल रहा था। इसी बीच जॉन व्हाइट की बेटी ने एक बच्ची को जन्म दिया, जिसका नाम वर्जीनिया डेयर रखा गया। वैसे कहा जाए तो यह ब्रिटिश इतिहास के लिए एक गर्व का पल था क्योंकि वर्जीनिया अमेरिका की धरती पर पैदा होने वाली पहली अंग्रेज़ बच्ची थी।
लेकिन ये खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक सकीं। दुर्भाग्य उनके दरवाज़े पर दस्तक़ दे रहा था। सर्दियां करीब आ रही थीं, और उस द्वीप पर राशन ख़त्म होने लगा था और स्वयं के श्रेष्ठ होने की भावना की वजह से, स्थानीय आदिवासियों के साथ उनके रिश्ते बिगड़ने लगे थे। उन लोगों में डर फैलने लगा था।
उस ग्रुप के लगभग सभी लोगों ने जॉन व्हाइट से मिन्नतें कीं कि वह वापस इंग्लैंड जाएं और वहां से राशन, हथियार और और लोगों को लेकर आएं। लेकिन जॉन अपनी बेटी, नन्हीं नातिन और अपने लोगों को उस जंगली इलाके में छोड़कर नहीं जाना चाहता था, पर उसके पास कोई चारा भी नहीं था।
जाते समय जॉन व्हाइट ने अपने लोगों के साथ एक गुप्त समझौता किया। उसने कहा, “मैं जल्द ही मदद लेकर लौटूंगा। लेकिन अगर मेरे आने से पहले तुम पर कोई बड़ा खतरा आए या तुम्हें अपनी जान बचाकर यह जगह छोड़नी पड़े, तो जाते-जाते किसी पेड़ पर एक ‘माल्टीज़ क्रॉस’ (Maltese Cross – ✠) का निशान बना देना, ताकि मैं समझ जाऊं कि तुम मुसीबत में हो।”
यह कहकर जॉन व्हाइट वहाँ से इंग्लैंड के लिए रवाना हो गया। इंतज़ार की ये घड़ियाँ समय के समंदर में खो सी गयी। उधर जॉन व्हाइट जब इंग्लैंड पहुंचा, तो वहां की परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं। वहाँ इंग्लैंड और स्पेन के बीच एक भयंकर समुद्री युद्ध छिड़ चुका था। महारानी एलिजाबेथ ने आदेश दे दिया था कि कोई भी जहाज़ इंग्लैंड छोड़कर नहीं जाएगा।
जॉन तड़पता रहा। समंदर पार उसकी बेटी, एक नन्हीं बच्ची और 115 लोग भूखे-प्यासे उसका इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था।
सहायता और राशन जुटाने में जॉन व्हाइट को एक या दो महीने नहीं, बल्कि पूरे तीन साल लग गए।
17 अगस्त 1590, आखिरकार तीन साल बाद जॉन व्हाइट दो जहाज़ों के साथ वापस रोअनोक द्वीप के तट पर पहुंचा। शाम ढल रही थी। दूर से ही व्हाइट को बस्ती के पास आसमान में धुआं उठता हुआ दिखाई दे दिया था। उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। इसका मतलब था कि वहां आग जलाई गई है, यानी उसके लोग, उसकी बेटी और नातिन ज़िंदा हैं!
रात होने के कारण जॉन व्हाइट और उसके लोग तट पर ही रुक गए। अगली सुबह, 18 अगस्त 1590 को, जॉन व्हाइट और उसके कुछ सैनिक हथियारों के साथ बस्ती की ओर बढ़े।
जैसे-जैसे वे लोग बस्ती के करीब पहुंच रहे थे, एक अजीब सा सन्नाटा उन्हें घेरने लगा था। न किसी के बात करने की आवाज़, न किसी जानवर की आवाज़, न ही खेलते हुए बच्चों का शोर। वहां सिर्फ हवा की भयानक सांय-सांय थी।
जॉन व्हाइट का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने आवाज़ लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
जब उन्होंने बस्ती के मुख्य द्वार के अंदर कदम रखा, तो जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
पूरी की पूरी बस्ती… खाली थी!
वहां एक भी इंसान मौजूद नहीं था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वहां किसी भी तरह के हमले या युद्ध का कोई नामोनिशान नहीं था।
ना तो किसी की कोई लाश नहीं थी।
खून की एक बूंद तक ज़मीन पर नहीं थी।
घर तोड़े नहीं गए थे, बल्कि उन्हें बहुत ही सलीके से खोलकर उनकी लकड़ियां निकाल ली गई थीं, जैसे कोई इत्मीनान से शिफ्ट हो रहा हो।
जॉन व्हाइट पागलों की तरह अपनी बेटी को खोजने लगा, उसकी आँखों से आंसूं थमने का नाम नहीं ले रहे थे। तभी उसकी नज़र बस्ती के किनारे गड़े हुए लकड़ी के एक बड़े खंभे पर पड़ी। उस खंभे पर चाकू से छीलकर बड़े अक्षरों में एक शब्द लिखा गया था—
“CROATOAN”
और पास ही एक पेड़ के तने पर लिखा था— “CRO”
जॉन व्हाइट ने तुरंत उस निशान को ध्यान से देखा। क्या वहां कोई ‘क्रॉस’ (✠) का निशान था, जो खतरे का संकेत था? नहीं। वहां कोई क्रॉस नहीं था। इसका मतलब था कि 115 लोगों ने बिना किसी दबाव या खतरे के, अपनी मर्ज़ी से यह जगह छोड़ी थी।
CROATOAN, रोअनोक द्वीप से 50 मील दूर एक दूसरे द्वीप का नाम था, और वहां रहने वाली एक स्थानीय आदिवासी जनजाति का भी यही नाम था। जॉन व्हाइट को लगा कि शायद राशन ख़त्म होने पर उसके लोग CROATOAN आदिवासियों के पास मदद मांगने उस द्वीप पर चले गए हैं।
उसने तुरंत अपने जहाज़ों को क्रोएटोअन द्वीप की तरफ मोड़ने का आदेश दिया। लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, समंदर में एक बहुत ही भयानक तूफ़ान आ गया। हवाएं इतनी तेज़ थीं कि जहाज़ के लंगर टूट गए। तूफ़ान उन्हें अमेरिका के तट से दूर, वापस अटलांटिक महासागर में धकेलने लगा।
मानो, प्रकृति जैसे नहीं चाहती थी कि जॉन वहां जाए। कई दिनों तक तूफ़ान से लड़ने के बाद, जहाज़ों को भारी नुकसान पहुंचा और उन्हें मजबूरन वापस इंग्लैंड लौटना पड़ा।
जॉन व्हाइट इसके बाद कभी अमेरिका वापस नहीं लौट सका। उसकी बेटी, नातिन वर्जीनिया और वे 115 लोग कहां गए? यह जॉन व्हाइट के लिए हमेशा एक रहस्य ही रह गया।
इतिहास का सबसे बड़ा सवाल
आज 438 साल बीत चुके हैं। आधुनिक पुरातत्वविदों ने CROATOAN द्वीप, जिसे आज हैटेरास द्वीप कहा जाता है, उस की चप्पा-चप्पा खुदाई कर ली है। लेकिन आज तक उन 115 अंग्रेज़ों के कंकाल, उनके कपड़े या उनका कोई भी पुख्ता सुराग नहीं मिला है। तो क्या वे समुद्र में डूब गए? या
क्या उन्हें स्पेन की सेना ने पकड़कर मार डाला? क्या वे आदिवासियों के साथ घुल-मिल गए और अपनी पहचान खो दी?
या उस रात उस द्वीप पर कुछ ऐसा हुआ था, जो इंसानी समझ से परे है?
सच कहूँ तो इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। 16वीं सदी की वह, “द लॉस्ट कॉलोनी”, इतिहास के पन्नों में हवा की तरह भाप बन कर उड़ गई और पीछे छोड़ गई लकड़ी के खंभे पर खुदा हुआ सिर्फ एक रहस्यमयी शब्द— “CROATOAN”।