क्या एलोरा का कैलाश मंदिर (Kailasa Temple) वाकई एलियंस ने बनाया था? जानिए इस मंदिर के वो 5 अनसुलझे रहस्य, 4 लाख टन गायब पत्थर का सच और औरंगजेब की हार की पूरी कहानी। प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का वो चमत्कार जिसने आधुनिक विज्ञान के भी होश उड़ा दिए हैं!
एक ऐसा मंदिर जिसे देखकर दुनिया दंग है
भारत के महाराष्ट्र राज्य के संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले में स्थित एलोरा की गुफा संख्या 16 में एक ऐसा चमत्कार छिपा है, जिसे देखकर दुनिया भर के वैज्ञानिक, इंजीनियर और पुरातत्वविद हैरान हैं। हम बात कर रहे हैं कैलाश मंदिर (Kailasa Temple) की।
यह मंदिर किसी ईंट या पत्थर को जोड़कर नहीं बनाया गया, बल्कि एक विशालकाय पहाड़ को काटकर तराशा गया है। क्या आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी से ऐसा मंदिर दोबारा बनाना संभव है? विशेषज्ञों का जवाब है— ‘नहीं’। तो फिर आज से 1200 साल पहले या शायद कई सहस्त्राब्दियों पहले, हमारे पूर्वजों ने इसे कैसे बनाया? क्या उनके पास कोई ऐसी तकनीक थी जो आज लुप्त हो चुकी है? आइये, इस रहस्य की गहराई में उतरते हैं।
कैलाश मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा
आज कल के आधुनिक (वामपंथी) इतिहासकारों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम (Krishna I) के शासनकाल में हुआ था। लेकिन ठीक से शोध कार्य किये जाएँ तो कदाचित ये कई सहस्त्राब्दियों पूर्व निर्मित हुआ मिलेगा। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसे हिमालय के ‘कैलाश पर्वत’ का रूप देने की कोशिश की गई है। इसलिए इसे कैलाश मंदिर कहा जाता है।
पौराणिक कथा
एक प्राचीन कथा के अनुसार, किसी समय की बात है, राजा कृष्ण प्रथम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। उनकी रानी ने भगवान शिव से मनौती मांगी कि यदि राजा ठीक हो जाते हैं, तो वह एक भव्य मंदिर बनवाएंगी और मंदिर का शिखर देखने तक व्रत रखेंगी। राजा ठीक हो गए, लेकिन वास्तुकारों ने कहा कि मंदिर बनने में तो वर्षों लगेंगे, तब तक रानी व्रत कैसे रखेंगी?
तभी ‘कोकसा’ नाम के एक वास्तुकार ने आश्वासन दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर मंदिर का शिखर तैयार कर देगा। उसने मंदिर को ऊपर से नीचे की ओर काटना शुरू किया, ताकि रानी जल्दी शिखर देख सकें और अपना व्रत खोल सकें। यही कारण है कि यह मंदिर ऊपर से नीचे की ओर बना है।
वैसे देखा जाए तो केवल इस तथ्य को स्थापित करने के लिए कि “यह मंदिर ऊपर से नीचे की ओर बना है”, यह कहानी गढ़ी गयी प्रतीत होती है क्योंकि इतना बड़ा मंदिर बनवाने के लिए राजा कृष्ण और उनके मंत्री परिषद ने केवल एक वास्तुकार के कौशल और विद्या पर विश्वास नहीं किया होगा। निःसंदेह इतने बड़े कार्य के लिए उस तथाकथित कोकसा जैसे प्रतिभाशाली वास्तुकारों का बड़ा समूह लगा होगा।
लेकिन हम सभी जानते है कि उस कालखंड मे (8वीं शताब्दी में) ऐसी किसी Technology का वर्णन नहीं मिलता और ना ही कैलाश मंदिर जैसा कोई दूसरा मंदिर, जो उस कालखंड के आस-पास निर्मित हुआ हो, नहीं मिलता। इसके अलावा उस कालखंड (या उसके आस-पास) मे लिखे गए किसी भी ग्रंथ मे इस Technology से संबंधित कोई बात लिखी हुई मिलती है। निःसंदेह इस मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी से काफी पहले हुआ है।
आधुनिक विज्ञान के लिए चुनौती: ऊपर से नीचे का निर्माण (Vertical Excavation)
दुनिया की हर छोटी-बड़ी इमारत नीचे से ऊपर (नींव से छत) की ओर बनती है। लेकिन कैलाश मंदिर दुनिया का एकमात्र ऐसा विशाल आर्किटेक्चर है, जिसे पहाड़ की चोटी से नीचे की तरफ तराशा गया है, और ऐसा भारतवर्ष ही नहीं विदेशी विद्वानों का भी मानना है।
आज के समय में यदि हमें किसी पहाड़ को काटकर ऐसा मंदिर बनाना हो, तो हमें ‘थ्री-डी सॉफ्टवेयर’, ‘लेजर कटिंग मशीनों’ और ‘हाइ-टेक क्रेन्स’ की जरूरत होगी। लेकिन उस समय केवल छैनी और हथौड़े के दम पर (वामपंथी इतिहासकारों के अनुसार) पत्थरों को इस तरह काटना कि एक भी इंच की गलती न हो, किसी चमत्कार से कम नहीं है।
आधुनिक civil इंजीनियर एवं विशेषज्ञों का मानना है कि इसके निर्माण मे ‘मोनोलिथिक’ (Monolithic) वास्तुकला का इस्तेमाल हुआ है, जिसका अर्थ है—एक ही पत्थर से निर्मित। तात्पर्य यह है कि पूरा मंदिर एक ही प्रस्तर खंड से निर्मित है। यानी आप इसको ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे कोई मूर्तिकार एक पत्थर से पूरी मूर्ति तराश का निकाल देता है वैसे ही किसी वास्तुकार (या वास्तुकारों की एक टीम) ने एक बड़े से पत्थर से पूरा मंदिर तराश का निकाल दिया।
लाखों टन पत्थर का रहस्य: आखिर मलबा गया कहाँ?
अब बात करते हैं इस मंदिर का सबसे बड़े और डरावने रहस्य की। पुरातत्वविदों ने गणना की है कि इस मंदिर को बनाने के लिए पहाड़ से लगभग 4,00,000 (4 लाख) टन पत्थर काटकर निकाला गया था, मलबे के रूप मे।
अब सवाल यह उठता है कि वह 4 लाख टन पत्थर गया कहाँ?
मंदिर के आसपास के कई किलोमीटर के इलाके में उस मलबे का कोई निशान या कोई अवशेष भी नहीं मिलता। आमतौर पर जब कोई निर्माण होता है, तो उसका कचरा या पत्थर पास के ही किसी प्रयोग मे न आने वाले स्थान पर ही फेंक दिया जाता है।
लेकिन कैलाश मंदिर के मामले में, मलबे के रूप मे निकला इतना सारा पत्थर जैसे हवा में गायब हो गया। कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि शायद उस पत्थर का इस्तेमाल किसी और निर्माण में हुआ होगा, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण आज तक नहीं मिला। कदाचित मिलेगा भी नहीं क्योंकि कोई मलबा था ही नहीं।
इंजीनियरिंग का चमत्कार: बिना मशीनों के सटीकता (Precision)
कैलाश मंदिर की लंबाई 142 फीट, चौड़ाई 154 फीट और ऊंचाई 100 फीट है। मंदिर के अंदर अद्भुत नक्काशी, हाथी, घोड़े, पशु-पक्षी, यक्ष-यक्षिणी, देवी-देवताओं की मूर्तियां और खंभे हैं। जिन लोगों ने भी उस मंदिर के दर्शन किये हैं, उनके अनुभव अद्भुत थे।
निकासी तंत्र (Drainage System): मंदिर के भीतर बारिश के पानी की निकासी के लिए जो नालियां बनाई गई हैं, वे हजारों वर्ष बाद आज भी निष्कंटक, पूरी तरह से काम करती हैं।
पुल और छज्जे: मंदिर के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने के लिए पत्थर के ही पुल बनाए गए हैं, जो बिना किसी सपोर्ट के टिके हैं, आधुनिक विशेषज्ञों को स्तब्ध करते हुए।
सटीकता: मंदिर के दोनों किनारों पर बनी मूर्तियां और खंभे एक-दूसरे के बिल्कुल मिरर इमेज (समान) हैं। बिना आधुनिक गणितीय उपकरणों के इतनी सटीकता कैसे हासिल की गई? ये ऐसा रहस्य है जो कदाचित इतिहास ही बदल दे!
औरंगजेब की हार: जब 1000 सैनिक भी मंदिर का कुछ न बिगाड़ सके
इतिहास की पुस्तकों मे लिखा है कि म्लेच्छ मुगल शासक औरंगजेब हिंदू मंदिरों को नष्ट करने के लिए कुख्यात था। 1682 में उसने कैलाश मंदिर को भी मटियामेट करने का आदेश दिया। उसने अपने 1000 सैनिकों को इस काम पर लगाया और कहा कि जब तक यह मंदिर गिर न जाए, तब तक वापस मत आना।
आश्चर्य! वे सैनिक 3 साल तक दिन-रात मंदिर को तोड़ने की कोशिश करते रहे। लेकिन पत्थर इतना मजबूत था कि वे केवल कुछ मूर्तियों को खंडित कर पाए, मंदिर के ढांचे को एक इंच भी नुकसान नहीं पहुँचा सके। अंत में औरंगजेब को हार माननी पड़ी और उसने यह मिशन छोड़ दिया।
बात केवल पत्थरों की नही थी, पत्थर की मूर्तियों को तोड़ना म्लेच्छ मुस्लिम सैनिकों को लिए कोई बहुत कठिन कार्य नही था, वो भी तब जब मंदिर को नष्ट करने के लिए उन्होंने भारी-भरकम तोपों का भी प्रयोग किया हो। सबसे आश्चर्य की बात ये थी कि 1000 सैनिक, 3 साल तक अपना सारा प्रयास कर लेने के बाद भी उस मंदिर के आर्किटेक्चर को जरा भी क्षति नहीं पहुँच सके।
क्या यह प्राचीन ‘एलियन टेक्नोलॉजी’ का परिणाम है?
आजकल इंटरनेट पर एक थ्योरी बहुत प्रसिद्ध है कि कैलाश मंदिर को इंसानों ने नहीं बल्कि एलियंस (Aliens) ने बनाया था। इसके पीछे जो तर्क दिये जाते हैं उनका हमने नीचे वर्णन किया है, किन्तु हमे यह ध्यान रखना चाहिए कि आज के आधुनिक विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक जिन तकनीकों को असंभव मान लेते है, उन्हे अक्सर वो प्राचीन एलियंस की टेक्नॉलजी का नाम दे देते हैं।
समय की कमी: 4 लाख टन पत्थर निकालने के लिए अगर 7000 मजदूर 150 साल तक काम करते, तब जाकर यह संभव था। लेकिन यह मंदिर मात्र 18 साल में बना। सीमित दृष्टिकोण एवं बुद्धि का प्रयोग करने वाले अक्सर ऐसा सोचते हैं।
उन्नत उपकरण: पत्थर के अंदर ऐसी बारीक नक्काशी की गई है जो केवल आधुनिक लेजर मशीनों से ही संभव है। लेकिन प्राचीन काल मे भी ऐसी उन्नत तकनीकी (Advance Technology) हो सकती है, ऐसा उनकी बुद्धि मानने से हिचकती है।
भीतरी गुफाएं: मंदिर के नीचे ऐसी संकरी गुफाएं हैं जहाँ मनुष्यों का जाना मुश्किल है। कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ महाभारत काल के कुछ प्राचीन विमान (Vimana) या मशीनों को रखने की जगह थी। कदाचित वे आज भी रखे हुए हों? हालांकि, वैज्ञानिक इस थ्योरी को नकारते हैं, लेकिन उनके पास भी इस बात का कोई पुख्ता जवाब नहीं है कि बिना मशीनरी के यह कैसे संभव हुआ।
मंदिर के नीचे स्थित गुप्त सुरंगों का रहस्य
कैलाश मंदिर के नीचे कई ऐसी सुरंगों का जाल है, जिन्हें भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया है। स्थानीय लोगों और कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि ये सुरंगें एक पाताल लोक (Underground City) की ओर जाती हैं। कई साल पहले कुछ वैज्ञानिकों ने इन सुरंगों के अंदर से ‘रेडियोधर्मी’ (Radioactive) किरणों का अनुभव किया था, जिसके बाद से इन्हें आम लोगों के लिए पूरी तरह सील कर दिया गया।
क्या इन सुरंगों में प्राचीन काल की कोई गुप्त तकनीक छिपी है? या फिर यहाँ हमारे पूर्वजों ने कुछ ऐसा छिपाया है जिसे आज का मनुष्य देखने के लिए तैयार नहीं है? या कदाचित कुछ ऐसा जिसके सामने आते ही ये दुनिया बदल जाएगी ?
एलोरा का कैलाश मंदिर केवल एक पत्थर की संरचना नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की महानता और प्राचीन भरत वंशियों के अविश्वसनीय विज्ञान का प्रतीक है। यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वज तकनीक के मामले में हमसे कहीं आगे थे।
चाहे वह एलियन टेक्नोलॉजी हो या फिर योग और ध्यान से प्राप्त की गई अलौकिक शक्ति, कैलाश मंदिर आज भी एक ऐसी पहेली है जिसका उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। अगर आप भी इतिहास और रहस्यों मे दिलचस्पी रखते हैं, तो आपको एक बार जीवन में इस मंदिर के दर्शन जरूर करने चाहिए।
प्रश्न: कैलाश मंदिर किसने बनवाया था?
उत्तर: इसे राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम ने 8वीं शताब्दी में बनवाया था।
प्रश्न: कैलाश मंदिर कहाँ स्थित है?
उत्तर: यह महाराष्ट्र के संभाजीनगर (औरंगाबाद) में एलोरा की गुफाओं (गुफा संख्या 16) में स्थित है।
प्रश्न: क्या कैलाश मंदिर को एलियंस ने बनाया था?
उत्तर: यह एक थ्योरी है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन इसकी वास्तुकला आज भी विज्ञान के लिए रहस्य है।