सीता जी के आँसू गिरे थे जहाँ श्री राम से बिछड़ के

asha-devi-templeआपको याद होगा श्री राम कथा का वह प्रसंग, जब श्री राम ने अयोध्या के कुछ निवासियों द्वारा उलाहना देने पर माता सीता का परित्याग कर दिया था। उसके बाद जब माता सीता भारी मन से अयोध्या से चल पड़ीं थीं तब वाल्मीकि जी के आश्रम में जाने से पहले वह जिस ममतामयी देवी के स्थान पर रुकीं थीं आज हम उसी अदभुत धाम में आपको लिये चल रहें हैं।

यही वह आस्था का धाम है़ जहाँ श्री राम से बिछड़ कर माता सीता ने आँसू बहाये थे। यही वह देवी हैं जिन्होंने माता सीता के बहते आंसुओ को अपने ममतामयी आँचल से पोंछ दिया था। जी हाँ, यह वह देवी धाम है़ जहाँ अपनी अयोध्या से बिछड़कर जनक दुलारी सीता जी कुछ समय के लिए रुकीं थीं।

यही वह अदभुत स्थान है़ जहाँ माता सीता के आँसू आज भी अपनी बेबसी की कहानी कह रहें हैं। यही वह धार्मिक स्थल है़ जहाँ माता सीता ने देवी माँ से यह आशा की थी कि वही अब उनके बिखरे हुये जीवन को अपनी ममता का आश्रय दे सकती हैं। आइये जानते हैं कहाँ है़ इन देवी का धाम ? किन देवी की बसी है़ वहाँ शक्ति ? क्या हैं वहाँ की अदभुत मान्यतायें? क्यों लगती है़ यहाँ भक्तों की भारी भीड़?

कहाँ स्थापित है़ यह अदभुत धाम

देवी माँ का यह अदभुत धाम आज भी उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के कल्याण थाने के निकट स्थित है़। यह धाम खुले आसमान के नीचे अपने पौराणिक इतिहास की कहानी कह रहा है़। इस धार्मिक स्थान से बिठूर का बहुत पुराना संबंध है़। जहाँ माता सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था। इस मंदिर को माँ आशा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है़।

कौन हैं इस मंदिर की देवी

खुले आसमान के नीचे विराजमान इस धाम की देवी माँ दुर्गा हैं। जो माँ भगवती के रूप में भक्तों पर अपनी कृपा  बरसा रहीं हैं। यह आराधना स्थल माँ आशा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है़। अपने नाम के अनुरूप यह मंदिर अपने शरण में आने वाले भक्तों में आशा का संचार करता है़। यहाँ माँ दुर्गा की मूर्ति शिला रूप में स्थापित है़। लोगों का ऐसा मानना है़ कि माता के इस दरबार में हर बेसहारा को सहारा मिलता है़।

खुले आसमान के विराजमान देवी का रहस्य

इस देवी मंदिर में एक अनसुलझा रहस्य वर्षों से बरकरार है़। ऐसा कहा जाता हैं कि न जाने कितनी बार इस मंदिर की छत बनायी गयी, लेकिन वह टिक न सकी । जितनी बार छत का निर्माण किया गया उतनी बार वह नीचे गिर गयी। तब लोगों ने यही निर्णय निकाला कि इस धाम की देवी खुले आकाश के नीचे ही रहना चाहतीं हैं।

इसके बाद लोगों  ने मंदिर के ऊपर छत बनाने का ख्याल मन से निकाल ही दिया। आज भी इस देवी के धाम में खुले आसमान के नीचे स्थापित माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है़। जो अपने भक्तों को शक्ति प्रदान करतीं हैं। विज्ञान भी इस मंदिर के छत के बार-बार गिरने के रहस्य को सुलझा नहीं पाया है़ बल्कि निर्माण कार्य से जुड़े विशेषज्ञ छत गिरने के रहस्य से अचंभित है़।

भेंट मे फल और मिष्ठान नहीं, पत्थर चढ़ाये जाते हैं देवी को 

एक और अदभुत परंपरा इस देवी धाम को और अधिक रहस्यमय बना देती है़। कि इस अदभुत देवी के धाम में श्रध्दालु माँ भगवती को भेंट स्वरूप ईंट और पत्थर चढ़ाते हैं। इस अजीबोगरीब मान्यता के कारण इस मंदिर में भारी संख्या में ईंट और पत्थर एकत्र हो गये हैं। इस धाम की देवी को ईंट-पत्थर चढ़ाने की मान्यता बहुत पुरानी है़।

ऐसा माना जाता है़ कि इस धाम की देवी को ईंट -पत्थर चढ़ाकर भक्तगण अपना दुख भरा भारी मन देवी के चरणों में अर्पित कर देतें हैं। जिसके बाद उनका मन हल्का हो जाता है़ और वह निराशा के अंधकार से आशा के प्रकाश की ओर बढ़ जाते हैं। इसीलिए तो इस धाम की देवी का नाम ही माँ आशा देवी है़।

इस मंदिर में देवी माँ को भेंट स्वरूप पत्थर चढ़ाये जाने की परंपरा के पीछे एक कहानी प्रचलित है़। कहा जाता है़ कि एक बार एक बहुत गरीब महिला माँ आशा देवी के दर्शन करने के आ रही थी। उसके मन में यह विचार आया कि माँ के दरबार में कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे कि वह देवी माँ को भेंट देने के लिए कुछ खरीद पाती।

इसलिए उसने रास्ते पर पड़ा एक पत्थर उठा लिया। जिसे माँ आशा देवी के धाम में पहुँच कर चढ़ा दिया। कहते हैं कि उस पत्थर को माँ दुर्गा को अर्पित करते ही उसके मन का पत्थर जितना भारी बोझ माँ ने अपने ऊपर ले लिया और उसके जीवन में खुशियों का उजाला भर गया। उस दिन के बाद यह चर्चा चारों ओर फैल गयी कि इस धाम की देवी भेंट स्वरूप ईंट-पत्थर आदि चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं।

आज भी भक्तगण फूल-माला आदि साथ यहाँ की देवी को ईंट- पत्थर आदि अर्पित करते हैं। कहते हैं कि इस आस्था स्थल की देवी भक्तों के डिप्रेशन को दूर कर देतीं हैं साथ ही उन्नति का रास्ता प्रशस्त करतीं हैं। क्योंकि यह वही देवी हैं जिन्होंने त्रेता युग में सीता माता के आँसुओ को मुस्कान में बदल दिया था।

सीता जी ने धरती में समा जाने की प्रार्थना इन्हीं भगवती माँ से की थी

कानपुर में स्थित यह माँ आशा देवी मंदिर वही आस्था  का धाम है़ जहाँ सीता जी अपने सभी उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर जाने के बाद इन्हीं दुर्गा माँ के पास आयीं थीं और उनसे प्रार्थना की थी कि ‘हे माँ ,मुझे अपने पास बुला लें’। माँ ने उनकी विनती सुन ली। जिसके बाद ही धरती माँ फटी और सीता जी उसमें समा गयीं थीं। आज भी यहाँ श्री राम कथा से जुड़े मार्मिक प्रसंगों की जीवंतता का अनुभव होता है़।

कभी लवकुश भी इस मंदिर में आये थे

ऐसा कहा जाता है़ कि सीता जी के साथ उनके दोनों पुत्र लव और कुश भी कभी यहाँ आये थे। सीता माँ अपने दोनों पुत्रों को इस धाम की देवी का आशीर्वाद दिलाने लायीं थीं। ताकि उनके इस धरती से चले जाने के बाद इस मंदिर की देवी का आशीर्वाद उन पर सदा बना रहे।

महिलाओं की आस्था का प्रमुख केंद्र

इस देवी के धाम में महिलाओं की गहरी श्रध्दा देखते ही बनती है़। इस मंदिर का पौराणिक इंतिहास प्रभु श्री राम की पत्नी सीता जी से जुड़े होने के कारण धर्म -कर्म से में रुचि लेने वाली महिलाओं की भारी भीड़ यहाँ देखते ही बनती है़। लोगों की ऐसी मान्यता है़ कि इस धाम की देवी सच्ची हैं। जिन्होंने माता सीता का कल्याण किया। अब वह अपने शरण में आने वाले प्रत्येक भक्त पर अपनी कृपा बरसा रहीं हैं। दूर-दराज से स्त्रियाँ यहाँ आकर देवी माँ को चूड़ियाँ, चुनरी और वस्त्र आदि चढ़ाती हैं। ताकि उनका सुहाग बना रहे।

पर्यटकों के आकर्षण का धाम

जब लोग भारत भ्रमण के दौरान श्री राम कथा से जुड़े स्थानों पर पहुँचते हैं तो यह माँ आशा देवी का मंदिर भी उनके आकर्षण का प्रमुख केंद्र होता है़। इसलिए वे इस धाम की देवी के समक्ष नतमस्तक होने अवश्य आते हैं। भेंट में ईंटें-पत्थर स्वीकार करने वाली इस धाम की देवी माँ लोगों के मन में कौतूहल पैदा करतीं हैं। लोगों के मन में यह भी जिज्ञासा रहती है़ कि आखिर वह कौन सी देवी हैं जिन्होंने अयोध्या से परित्याग के बाद सीता जी को अपनी आँचल की छाँव दी थी।