श्री भगवान का चतुर्व्यूह रूप क्या है, उनके अवतार भेद क्या हैं, उनसे जीव की उत्पत्ति कैसे होती है


श्री भगवान का चतुर्व्यूह रूप क्या है, उनके अवतार भेद क्या हैं, उनसे जीव की उत्पत्ति कैसे होती है अवतार का अर्थ सामान्य जन्म से नहीं है। अवतारी की तो जन्म-कर्म-जैसी समस्त लौकिक क्रियाएं दिव्य होती हैं। गीता में श्री भगवान ने अवतार के संबंध में समस्त जिज्ञासाओं का समाधान बड़ी स्पष्टता से किया है एवं कहा है “यद्यपि मैंअजन्मा-जन्म रहित, अव्ययात्मा-अक्षीण ज्ञानशक्ति-स्वभाव वाला और ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों का नियमन करने वाला ईश्वर हूं, तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी माया को, जिसके वश में सम्पूर्ण जगत बसता है और जिससे मोहित हुआ मनुष्य वासुदेव रूप स्वयं को नहीं जान पाता, उस अपनी प्रकृति को अपने वश में रख कर केवल अपनी लीला से ही शरीर वाला-सा-जन्म लिया हुआ-सा हो जाता हूं, साधारण की भांति वास्तव में मै जन्म नहीं लेता।

अवतार के प्रयोजन को पुनः स्पष्ट करते हुए भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि एवं अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं अपनी माया से अपना स्वरूप रचता हूं। ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ (गीता 4।7)। अतः यह स्पष्ट है कि संत-त्राण, धर्म रक्षा, नीति एवं ज्ञान का आलोक फैलाने के निमित्त एवं दुष्टजनों तथा पापकर्मियों के नाश के लिये ही भगवान प्रत्येक युग में प्रकट होते हैं।

अगर हम बात करें सामान्य अर्थ की तो सामान्य रूप से अवतार का अर्थ उतरना, या उदय होना , या आरम्भ, रूप का प्रकट होना, जन्म लेना आदि होता है। ‘अवतार’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘अव’ उपसर्गपूर्वक ‘तृ’ धातु से ‘घ’ प्रत्यय द्वारा होती है। आचार्य पाणिनि के अष्टाध्यायी के 3।3।20 में ‘अवेतृस्त्रोर्धस्त्र’ सूत्र में ‘अवतृ’ उच्च स्थान से नीचे उतरने की क्रिया या उतरने के अर्थ में ही प्रयुक्त है। अवतार मात्र दृष्टदलन एवं संत-त्राण के लिये ही नहीं होते, बल्कि लोक-शिक्षण के निमित्त भी होते हैं, कहा भी गया है ‘मत्र्यावतारस्त्विह मत्र्यशिक्षणम।’

ईश्वरीय सत्ता कण-कण में व्याप्त है। किन्तु इसका सपन्दन शुद्ध हृदय द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। समस्त जीव-जंतुओं जैसे उद्भिज, स्वेदज, अण्डज एवं जरायुज में उसी ईश्वर का ही अंश विद्यमान है। इसलिये संसार के प्रत्येक प्राणी में समत्व-दृष्टि रखनी चाहिये । यही पाठ विश्व बन्धुत्व की आधारशिला भी है, जो हमारी सनातन धर्म की विशेषता है ।

उद्भिज-वनस्पतियों आदि में एक अंश, स्वेदजों में दो अंश, अण्डजों में तीन अंश एवं जरायुजों में चार अंश तक ईश्वरीय चित-सत्ता विद्यमान रहती हैं। अपनी साधना एवं संयम के बल पर मनुष्य पांच से आठ अंशों तक ईश्वरीय चित-कलांश तक धारण कर सकते हैं | लेकिन जिन मनुष्यों के शरीर में वे विद्यमान होंगे वे शरीर दिव्य उपादानों से सम्पन्न एवं आवेष्टित कहे जायंगे।

ऐसी ही प्रज्ञा व दिव्य शरीर धारी, विभूति सम्पन्न अवतारी पुरूष कहे जाते हैं। आठ से पंद्रह कलाओं से सम्पन्न जिन शरीरों में चिदांश की स्थिति होती है, वे अंश अवतार, और फिर पूर्ण अवतार कहे जाते हैं। जो सोलह कलाओं से सम्पन्न होते हैं वे परिपूर्ण अवतार कहे जाते हैं। परिपूर्ण अवतार सर्वज्ञ माने जाते हैं।

इनके शरीर सर्व व्यापक, सर्वज्ञ, सर्व गुणसम्पन्न एवं दिव्य होते हैं। अतः इन्हें जीव नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ये ब्रह्म रूप होते हैं। इन्हीं अंशों के क्षीण होेने पर मनुष्य अल्पज्ञ जीव कहलाता है। पूर्ण अवतार एवं परिपूर्ण अवतार में आध्यात्मिक-दार्शनिक दृष्टिकोण से अभेद भी माना गया है।
इन्हीं ईश्वरीय विभूतियों में कला, अंश, आवेश आदि किंचित विभेद भी माना गया है।

अंशावतार क्या होते है

मानव को भी ईश्वर का अंश माना गया है। कभी-कभी कुछ मानवों के कार्य में अगर ऐसी विशिष्टता दिखायी पड़ती है तो वे उत्कृष्ट माने जाते हैं। इन्हीं विशिष्ट एवं संचित गुणों को हम ईश्वरीय अंश कह सकते हैं। विभिन्न देवी-देवताओं के दिव्य गुणों में संचित ईश्वरीय अंश विद्यमान रहते हैं। जैसे-इन्द्र, अग्नि, वरूण, सोम, वायु, सूर्य आदि को भी अंश अवतार कहा गया है। घरों में होने वाले अतिथि-यज्ञ को सम्पादित करने वाले ‘होता’ आदि में ईश्वरीय अंश का होना परिकल्पित हैं लक्ष्मी को भी अंश अवतार कहा गया है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण के 35वें अध्याय के प्रकृति खण्ड में कहा गया है कि राधा के बायें अंश से लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ और श्री कृष्ण के वामांश से चतुर्भुज विष्णु हुए। अध्यात्म रामायण (1।2।27) में भगवान के अपने पृथक-पृथक अंशों में प्रकट होकर गर्भवास करने का भी वर्णन मिलता है | वहीं योगमाया का सीता रूप में एवं समस्त देवगणों का महा बलवान वानरों के अंश रूप में जंम लेकर लीला-विस्तार का प्रकरण महत्वपूर्ण है।

विष्णु पुराण (4।11।20) में कार्तवीर्यार्जुन का वध करने वाले परशुराम को अंश अवतार माना गया है। महाभारत (1।67।116, 150) में अर्जुन को इन्द्र एवं कर्ण को सूर्य का अंश कहा गया है। इन्द्र, पवन, यम, सूर्य, अग्नि, वरूण, चन्द्र एवं कुबेर-इन आठों के नित्य अंश से राजा की रचना हुई। अतः इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि राजा देव प्रतिनिधि माने गये हैं। केनोपनिषद (2।1) में अत्यन्त ही गूढ़ रूप में परम ब्रह्म के अंश रूप जीवात्मा, जो मन, बुद्धि, प्राण रूप है, उसमें भी ब्रह्म का ही अंश है, ऐसा कहा गया है।

भगवान के कलावतार क्या हैं

सनातन धर्म के ग्रंथों के अनुसार कला के विभिन्न अर्थ बताये गये हैं। जैसे-समय की कलाएं, राशि की कलाएं, प्रयोगात्मक कलाएं, संगीत-नृत्य की कलाएं, चंद्रमा की कलाएं आदि। परंतु कला का अर्थ अवतार के संदर्भ में भिन्न है। प्रश्नोपनिषद (6।2) में सोलह कलाओं वाले पुरूष का वर्णन मिलता है-
‘स पुरूषो यस्मिन्न्ेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति।’

अर्थात सोलहों कलाओं से पूर्ण जगत रूप विराट शरीर उत्पन्न हुआ, वे ही पुरूष कहलाये। ये पुरूष ही हमारे अन्तःकरण में विराजमान हैं। अतः इन्हें अपने अंदर ही खोजने की अभिलाषा रखनी चाहिये। छान्दोग्योपनिषद (6।7।1) में भी पुरूष को सोलह कलाओं वाला कहा गया है-‘षोडशकलः सोम्य पुरूषः।’

बृहदारण्यकोपनिषद (1।5।14) मे भी संवत्सर रूपी प्रजापति को सोलह कलाओं से युक्त कहा गया है। प्रश्नोपनिषद (6।6) में बतलाया गया है कि जिस प्रकार रथ के पहिये में लगे रहने वाले सभी अरे उस पहिये के केन्द्र में प्रविष्ट रहते हैं, जिसे नाभि कहते हैं, उस नाभि के बिना ये टिक नहीं सकते, उसी प्रकर प्राण आदि सोेलह कलाएं जिनके आश्रित हैं, जिनसे उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, उन्हें ही परमेश्वर जानना-समझना चाहिये।
इस प्रकार षोडश कलाओं से युक्त जिन पुरूष को व्यक्त किया गया है, वे और कोई नहीं बल्कि षोडश कलाओं की प्रतिमूर्ति ब्रह्मरूप महा विष्णु हैं।

विभूति किसे कहते हैं

विभूति का सामान्य अर्थ अति मानव एवं दिव्य शक्तियों से है, जिनमें अष्ट सिद्धियों का भी समावेश है। वैसे शक्ति, प्रतिष्ठा, कीर्ति आदि-ये विभूतियों में ही गिनी जाती हैं। गीता (10।7) में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहतेे हैं कि जो मेरी विभूति (विस्तार) और योग (विस्तार करने की युक्ति)-के तत्व को जानता है, वह निःसंदेह स्थिर कर्मयोेग को प्राप्त होता है।

भगवत-विभूतियों के माहात्म्य की चर्चा करने में कोई्र भी सांसारिक मनुष्य सक्षम नहीं। इस संसार में जो भी पदार्थ विभूतिमान हैं तथा श्री और लक्ष्मी से युक्त हैं, उनमें ईश्वर के तेजोमय अंश की स्थिति को ही मानना चाहिये। गीता के 10वे अध्याय में भगवत-विभूतियों का बड़ा ही रोचक वर्णन है; जिनमें विष्णु, सूर्य, चंद्रमा, इन्द्र, सामवेदादि-जैसे समस्त श्रेष्ठ विभूतियों एवं पदार्थों मेें दिव्य सत्ता की उपस्थिति दिखायी गयी है।

भगवान् के आवेशावतार क्या होते हैं

भगवान् के आवेश अवतार भी हुए हैं । आवेश का अर्थ होता है प्रविष्ट होना अथवा किसी एक शक्ति सम्पन्न के अधिकार क्षेत्र में रहना है। आवेश अवतार में दिव्य सत्ता अपनी शक्तियों को किसी व्यक्ति या वस्तु विशेष मे आरोपित करती है। गर्ग संहिता (1।21) मे श्री नारद द्वारा आवेश अवतार के बारे में कहा गया है कि भगवान विष्णु स्वयं जिनके अन्तःकरण में आविष्ट होते हैं और अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हों-ऐसे अवतार को आवेश अवतार जानना चाहिये।

भक्त भी कभी-कभी अपनी अप्रितम भक्ति के कारण आवेशित हो जाते हैं, उस समय इन्हें न तो भूख सताती है और न प्यास। शारीरिक कष्ट होते हुए भी इसका आभास नहीं होता। इस समय इनके द्वारा असाधारण कार्य भी सम्पन्न होने लगते हैं। चैतन्य महा प्रभु के जीवन-चरित पर दृष्टि डालें तो ऐसे अनेक दृष्टान्त उनके जीवन में मिलतेे हैं।

अवतारों में अंशांश, अंश, कला, पूर्ण एवं परिपूर्णतम प्रकार भी बतलाये गये हैं। परशुराम आदि को भी किन्हीं-किन्हीं ग्रंथों ने आवेश अवतार की श्रेणी में रखा है। इनके अतिरिक्त दत्तात्रेय, कपिल, व्यास आदि मुनि भी इसी आवेश अवतार के रूप में, हमारे सनातन ग्रंथों में वर्णित हैं।

क्या होते हैं भगवान के पूर्णावतार

गर्ग संहिता का स्प्ष्ट रूप से कथन है कि जहां ईश्वर का चतुर्व्यूह एक साथ प्रकट हो, वहां पूर्ण अवतार का प्रभाव परिलक्षित होता है, जैसे-राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न; वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरूद्ध। इन्होंने अपनी दिव्य शक्तियों, बल, पराक्रम, तेज आदि के माध्यम से दानवदलन कर संतों को आश्रय देकर धर्मराज्य की स्थापना की।

वैष्णव साहित्य में राम एवं कृष्ण की महत्ता विशेष रूप से उल्लिखित है। पूर्ण अवतार के परिप्रेक्ष्य में विष्णु ही मुख्य लीलानायक हैं तो भी राम एवं कृष्ण के व्यूह में भी अंश अवतार के समान ही इन्होंने अनेक कार्य सम्पादित किये हैं।

इस प्रकार अंश अवतार का पूर्ण अवतार से अनन्य संबंध है। वैष्णव साहित्य के शीर्ष ग्रंथ अहिर्बुध्न्य संहिता (2।56) में बताया गया है कि परब्रह्म ही प्राकृत गुणों से रहित होकर निर्गुण बन जाते हैं और जब ये षडगुणों (ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य, बल, वीर्य, तेज) से सम्पन्न होते हैं तो सगुण रूप में होते हैं। इन षडगुणों मेें ज्ञान ही वासुदेव रूप हैं, शेष शक्ति आदि अन्य गुण तो ज्ञान (वासुदेव)-के सहचर हैं।

जीव की उत्पत्ति कैसे होती है

संकर्षण में ज्ञान और बल, प्रद्युम्न में ऐश्वर्य और वीर्य एवं अनिरूद्ध्र में शक्ति और तेज-जैसे गुणों का प्राधान्य है। संकर्षण का कार्य है-जगत की सृष्टि करना, प्रद्युम्न का कार्य है-मार्ग के अनुसार क्रिया की शिक्षा देना एवं अनिरूद्ध का कार्य है-क्रिया का फल देना अर्थात मोक्ष रहस्य का शिक्षण देना। इस प्रकार वासुदेव को मिलाकर उपर्युक्त व्यूह चतुर्व्यूह कहलाता है। चतुर्व्यूह वासुदेव ही इनकी उत्पत्ति के मुख्य स्रोत हैं, इनसे ही संकर्षण अर्थात जीव की, संकर्षण से प्रद्युम्न अर्थात् मन की एवं मन से अनिरूद्ध अंहकार की उत्पत्ति होती है।

व्यूहों के बारे में हमारे सनातन साहित्य में यत्र-तत्र अनेक दृष्टान्त के साथ प्रकरण भी मिलते हैं। श्री राम के व्यूह में लक्ष्मण को संकर्षण, शत्रुघ्न को प्रद्युम्न एवं भारत को अनिरूद्ध के रूप में माना गया है एवं राम स्वयं वासुदेव के रूप में स्थित हैं।

गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद में भगवान ने स्वयं कहा है कि उत्तम बुद्धि से सम्पन्न भक्त जन चारों रूपों (चतुव्र्यूह) में मेरी उपासना करते हैं। अवतार भेदों में व्यूहवाद निश्चित ही अवतारवाद से पृथक नहीं, किंतुुु अवतार के रूपों एवं प्रयोजनों में भिन्नता अवश्य ही परिलक्षित होती है। व्यूह के केन्द्र में वासुदेव हैं, जहां इन्हीें से निःसृत शक्ति ही अनिरूद्ध आदि की विशिष्टता प्रकट करती है।

पांचरात्र साहित्य में व्यूहवाद की विशेष चर्चा हैं एवं इसमें कहा गया है कि ब्रह्म की समस्त शक्तियां ब्राह्म रूप में ही दृश्य होती हैं, अतः इन्हें अलग-अलग देखना निरर्थक है। नारद पांचरात्र में तो उपव्यूह का भी सिद्धांत प्रतिपादित है। दृष्टान्त रूप में वासुदेव से केशव, नारायण, माधव; संकर्षण से गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन; प्रद्युम्न से त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर एवं अनिरूद्ध से ऋषीकेश, पद्यनाभ और दामोदर प्रकट होते हैं।

क्या होता है परिपूर्णावतार

श्री कृष्ण की भगवान के परिपूर्णतम अवतार के रूप में मान्यता है। वासुदेव कृष्ण को महाभारत (1ं67।151)-में नारायण अथवा विष्णु का अवतार कहा गया है | पुनः श्रीमद भागवत (1।3।28) में ‘कृष्णस्तु भगवान स्वयम’ कहा गया है। अवतारों में चाहे वे दस अवतार हों अथवा चैबीस अवतार, यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि श्री विष्णु अपने कला, अंश, अंशांश, आवेश, पूर्ण आदि रूपों में अवस्थित होकर अवतार लेते हैं। ये सभी अखिल ब्रह्माण्ड के अधिपति भगवान की दिव्य शक्तियां हैं, जो संसार के कल्याणार्थ लीला हेतु अवतरित होती हैं।