वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय

 

वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था कि किसी व्यक्ति के घर के शौचालय से उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की झलक मिलती है। गाँधी जी ने सदैव शौचालय की स्वच्छता पर विशेष जोर दिया। इस समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो अपने शौचालय के रखरखाव पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते और दूसरे वे जो अपने शौचालय को ड्राइंगरूम से भी अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास करते हैं। वास्तु शास्त्र में शौचालय के संबंध में अनेक दिशा निर्देश दिए गये हैं।

यदि आप उन्हें मानें तो घर के लोग सदैव प्रसन्नचित्त रहेंगे। क्योंकि शौचालय हमारे स्वास्थ्य से अटूट संबंध रखता है। आपको जानना चाहिए कि जिन घरों के शौचालय वास्तु शास्त्र के अनुरूप होते हैं। वहाँ बीमारियाँ बहुत कम आती हैं। जबकि इसके विपरीत शौचालय का वास्तुशास्त्र के प्रतिकूल होने पर वह बीमारियों को आमंत्रित भी करता है। इसलिए अपना मकान बनवाते समय अन्य स्थानों की तरह शौचालय निर्माण में भी वास्तुशास्त्र के सुझावों को माना जाना चाहिए।

 शौचालय घर के अंदर बनाएं या बाहर

यदि हम थोड़ा पुराने समय की बात करें तो लोग शौचालय अपने आवासीय स्थान से अलग ही बनवाते थे, जो वास्तुशास्त्र की दृष्टि से अति उत्तम था। इसलिए यदि आपके घर का एरिया बड़ा हो तो लैट्रीन- बाथरूम का स्थान रहने वाले एरिया से दूर बनवाने में ही भलाई है। क्योंकि शौचालय से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा हमारे घर में विचरण कर रही सकारात्मक ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है।

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लेकिन इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि शौचालय, घर के मुख्य द्वार के सामने नहीं होना चाहिए। क्यों कि मुख्य द्वार के सामने शौचालय बने होने पर उससे निकलने वाली नेगेटिव एनर्जी घर के अंदर प्रवेश कर जायेगी। इसके अतिरिक्त घर का मुख्य द्वार दैवीय शक्तियों के आगमन का मार्ग होता है। ऐसे में मुख्य द्वार के आस-पास शौचालय बना देने से दैवीय शक्ति आपके घर में प्रवेश करने से बचेगी। क्योंकि जहां दुर्गंध वहां दैवीय शक्तियों का आना बंद।

शौचालय की दिशा कौन सी हो

घर के शौचालय की दिशा क्या होनी चाहिए? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय को कभी पूर्व दिशा में नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि पूर्व दिशा दैवीय शक्तियों की दिशा होती है। ऐसा करने से वे दैवीय शक्तियाँ रुष्ट हो सकती है़। इसके अतिरिक्त पश्चिम दिशा में भी शौचालय बनाना अच्छा नहीं माना जाता है।

वास्तुशास्त्री सदैव दक्षिण- पश्चिमी दिशा में शौचालय बनाने का सुझाव देते हैं। क्योंकि यह दिशा नकारात्मक क्षेत्र की होती है। जो दैवी शक्तियों से दूर रहती है। इसलिए वहाँ बेरोकटोक अपना शौचालय बनाया जा सकता है। इस दिशा में शौचालय बनाने से घर के सदस्यों का आपसी तालमेल अच्छा रहता है।

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लैट्रिन और बाथरूम का एक साथ होना उचित है़

पश्चिमी सभ्यता के अनुकरण के चलते और घर में एरिया की कमी के कारण लोग आजकल लैट्रीन बाथरूम साथ-साथ बनाने लगे हैं। जबकि वास्तु शास्त्र इस बात की अनुमति कदापि नहीं देता। वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय राहु का क्षेत्र होता है जबकि बाथरूम चंद्रमा का क्षेत्र  है। दोनों के एक ही स्थान पर होने से चंद्रमा राहु से प्रभावित हो जाता है जिसके कारण घर के सदस्यों के यश और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

इसके अतिरिक्त वास्तु पंडितों के अनुसार बाथरूम के लिए पूर्व दिशा अच्छी मानी जाती है। जबकि लैट्रिन की दिशा दक्षिण पश्चिम होती है़। ऐसे में दोनों को एक साथ बना देने से वास्तु दोष उत्पन्न हो जाता है। आप स्वयं इस बात का अनुभव करें कि पहले ऐसी जगह नहायें जो पूरी तरह बाथरूम हो, फिर आप ऐसे स्थान पर नहायें जहाँ लेट्रिन बाथरूम एक साथ हो।

तो आप निश्चित रूप से स्वतंत्र बाथरूम में नहा कर बेहतर स्फूर्ति का अनुभव करेंगे। इसलिए आपके लिए सच्ची सलाह यही है़ कि जहाँ तक संभव हो आप निर्माण के समय लैट्रीन और बाथरूम को अलग-अलग ही स्थान दें।

शौचालय की दीवारों का रंग कैसा हो

शौचालय की दीवारों का रंग कभी गहरा नहीं होना चाहिए। वास्तुशास्त्र कहता है़ कि शौचालय की दीवारों का रंग सदैव हल्का होना चाहिए। जैसे हल्का नीला, हल्का गुलाबी, हल्का हरा आदि। शौचालय की दीवारों का सफेद होना सबसे अच्छा माना जाता है। जहाँ तक संभव हो शौचालय में किसी व्यक्ति या भगवान आदि की फोटो कभी नहीं लगानी चाहिए। उसके स्थान पर फूल-पौधे और सीनरी की तस्वीरें लगाना अच्छा माना गया  है। क्योंकि ऐसी तस्वीरें शौचालय के वातावरण को स्वस्थ बनाती हैं।

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शौचालय की सीट की दिशा क्या हो

शौचालय की सीट जिस पर बैठकर हम फ्रेश होते हैं उसकी दिशा वास्तु शास्त्र के अनुसार होना घर के सदस्यों के लिए लाभकारी होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय की सीट दक्षिण-पश्चिम दिशा में होनी चाहिए। यह दिशा आपकी पाचन शक्ति को मजबूत बनाये रखती है़।

शौचालय का दरवाजा सदैव बंद होना चाहिए

वास्तु शास्त्र कहता हैं कि घर के शौचालय का दरवाजा सदैव बंद होना चाहिए ताकि उसमें से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा घर में इधर-उधर न फैले। ऐसा देखा गया है कि अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए आजकल लोग शयन कक्ष में ही शौचालय बना लेते हैं। लेकिन ऐसे में इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए कि लैट्रीन का उपयोग करने के बाद उसका दरवाजा सदैव बंद रखा जाए ताकि आपका शयन कक्ष नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त रहे।

शौचालय को कभी सीढ़ियों के नीचे न बनायें

वास्तु शास्त्र कहता है कि घर में कभी शौचालय सीढ़ियों के नीचे नहीं बनवाना चाहिए। वास्तु शास्त्र कहता है़ कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्ते खराब होते हैं। उनमें अलगाव पैदा होता है। ऐसा देखा जाता है कि जिन घरों में सीढ़ियों के नीचे लैट्रिन बनी होती है वहाँ बच्चे बड़े होने पर घर से दूर चले जाते हैं और घर में  माँ बाप अकेले और उदास रह जाते हैं। सीढ़ियों के नीचे वास्तु शास्त्र सुगंध को बढ़ावा देने की बात करता है ऐसे में यदि इसके विपरीत वहाँ दुर्गंधमय स्थान बनाना समस्याओं को दावत देना है।

शौचालय का स्वयं भी दुर्गंध से मुक्त रहना आवश्यक है

वास्तुशास्त्री शौचालय के अंदर की हवा को स्वच्छ बनाए रखने के पक्षधर हैं। इसीलिए वह शौचालय में एग्जास्ट फैन और एयर फ्रेशर आदि का उपयोग करना अच्छा मानते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय स्वयं भी दुर्गंध से मुक्त होना चाहिए। इसके लिए उसमें पर्याप्त तकनीकी व्यवस्था और खिड़कियाँ आदि का होना आवश्यक है। शौचालय में लगाई जाने वाली खिड़की यदि पूर्व दिशा में हो तो अति उत्तम माना जाता है।

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शौचालय का तकनीकी कमियों से मुक्त रहना आवश्यक है़

वास्तु शास्त्र कहता है कि घर के शौचालय को तकनीकी कमियों से मुक्त रहना चाहिए। शौचालय की तकनीकी कमियाँ आर्थिक जीवन पर प्रभाव डालती हैं। इसलिए जहाँ तक हो सके शौचालय की टोटियों से पानी टपकना, शौचालय का दरवाजा बंद आदि करते समय आवाज करना ,शौचालय में पानी  की समुचित निकासी न होना आदि वास्तु दोष को जन्म देता है। इसलिए इससे बचना चाहिए।

शौचालय में वास्तु दोष होने से हानियाँ

शौचालय में वास्तु दोष होने पर घर में निवास करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। शौचालय में गहरे रंग का उपयोग परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों को खराब करता है। शौचालय की गलत दिशा परिवार की उन्नति में बाधक होती है़।

शौचालय का खुला हुआ दरवाजा घर के लोगों में नकारात्मक समझ को जन्म देता है । शौचालय में लगातार टपकने वाला जल धन को व्यर्थ व्यय होने के रास्ते खोलता है। शौचालय की अस्वच्छता घर की मुखिया के सम्मान को कम करती है।