मयूर सिंहासन यानी तख्ते ताऊस के रहस्यमयी ख़जाने का इतिहास


मयूर सिंहासन यानी तख्ते ताऊस के रहस्यमयी ख़जाने का इतिहास
मयूर सिंहासन यानी तख्ते ताऊस के रहस्यमयी ख़जाने का इतिहास

मुग़ल सम्राट शाहजहाँ बड़े अरमानो से बैठा था मयूर सिंहासन पर | मयूर सिंहासन इतिहास की उन कीमती वस्तुओं में से है जिसके बारे में किम्वदंतियां फ़ैली हुई थीं कि ऐसा सिंहासन फिर दूसरा इस संसार में नहीं बना | आखिर क्या था उस सिंहासन में? हीरे, जवाहरात या कोई खज़ाना ?

यह प्रमाणित करना थोड़ा मुश्किल हैं कि मयूर सिंहासन का वास्तविक निर्माता कौन था लेकिन जैसा कि मुग़ल इतिहासकारों की परंपरा रही है कि जबरन कब्जाई हुई वस्तु में मनमाफ़िक परिवर्तन करके उसे अपनी कृति बताने की (जैसा की ताजमहल के साथ हुआ) वैसा ही हुआ मयूर सिंहासन के साथ भी | इतिहास की पुस्तकों से लेकर इन्टरनेट तक हर जगह यही जानकारी है कि सल्तनत में अमन-ओ-चैन (?) क़ायम होने के बाद मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने मयूर सिंहासन यानी तख्ते ताऊस का निर्माण कराया |

भारतीय संस्कृति की परम्परा में मोर बहुत ही पवित्र पक्षी माना गया है | आज भी यह हमारे देश का राष्ट्रीय पक्षी है | यह स्कन्द भगवान का वाहन भी है | इस सिंहासन का निर्माण भी इस प्रकार से किया गया था कि उस सिंहासन के नीचे थोड़ा पीछे की ओर दो मोर और आगे दोनों बाजुओं पर दो अतिसुन्दर मोर अपनी चोंच में रंग बिरंगी झिलमिल करती मोतियों की लड़ी को दबाये हुए अपने पंख फैलाये हुए इस प्रकार दिखाई देते थे मानो ये मोर ही इस सिंहासन के वाहन हों | इसीलिए इसका नाम मयूर सिंहासन था |

इसके अलावा मुग़ल बादशाहों के काल में आम जनता की स्थिति बहुत ही दयनीय थी | विशेष रूप से हिन्दुओं की जिन्हें ज़ज़िया कर भी देना पड़ता था | जिज्ञासु पाठक अधिक जानकारी के लिए स्वर्गीय श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक जी की पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान’ (यह दो भागों में उपलब्ध है) पढ़ सकते हैं जिन्होंने पूरे प्रमाण के साथ वामपंथी इतिहास कारों का कच्चा चिटठा खोल दिया है |

यह पुस्तक इन्टरनेट पर ईबुक के रूप में भी उपलब्ध है | मुग़ल काल में हिन्दू, जो ऐसी कलाओं के जानकार एवं संरक्षक थे, बहुत ही दयनीय अवस्था में थे इसलिए उनसे भी मुग़ल काल में इस प्रकार की कारीगरी की उम्मीद करना थोड़ा कठिन है | यह मयूर सिंहासन भी पहले आगरा के लाल कोट (लाल किले) में था जिसे मुग़ल बादशाहों ने जबरन हथियाया था | अपनी ताजपोशी के कुछ ही समय बाद शाहजहाँ ने मयूर सिंहासन को आगरा से दिल्ली मँगवा लिया था |

मयूर सिंहासन: यह सिंहासन तेरह गज लम्बा, तीन गज चौड़ा, और पांच गज ऊंचा था | पाठक गण अनुमान लगा सकते हैं कि कितना विशालकाय रहा होगा यह सिंहासन | उस समय के हिसाब से बारह करोड़ के केवल रत्न जड़े थे उसमे | इस सिंहासन में अन्दर की तरफ पन्ने से बने हुए पाँच खम्भे लगे थे जिनके ऊपर मीनाकारी का छत्र बना हुआ था |

यह पूरा सिंहासन छह पायों पर स्थापित था जो ठोस सोने के बने हुए थे | अन्दर की तरफ़, पन्ने के बने हुए प्रत्येक खम्भे पर दो-दो मोर नृत्य करते हुए बनाए गए थे | मोर के प्रत्येक जोड़े के बीच रंग-बिरंगे मोती, माणिक, हीरे, पन्ने आदि रत्नों से जड़ा एक-एक पेड़ था | बैठने के स्थान तक पहुँचने के लिए तीन रत्न-जड़ित सीढ़ियाँ थीं | उसमे कुल मिलकर ग्यारह चौखटें थीं |

कलाकृतियों से सजाया हुआ उसका स्वर्ण-छत्र तो बिलकुल अद्भत था | उस सिंहासन को खींच कर पूरी तरह फैला देने पर सूर्य-रश्मियों में उसके झिलमिलाते हुए रत्न किसी आसमानी बहार का वातावरण उपस्थित कर देते थे जिसे देखने वाले का मुह खुला का खुला रह जाता था | लेकिन जिन अरमानो के साथ शाहजहाँ ने उसे आगरा से दिल्ली मँगवाया था वे पूरे न हो सके |

अभी उसको सिंहासन पर बैठे कुछ ही वर्ष हुए थे कि उसके छोटे बेटे औरंगज़ेब आलमगीर ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया | दक्षिण में बीजापुर की जंग जीतने के बाद ही औरंगज़ेब को पुख्ता खबर मिल गयी थी कि दिल्ली की गद्दी उसके बड़े भाई दारा शिकोह के हाँथ में जाने वाली थी | इसीलिए लौटते वक़्त सीधे दिल्ली न जाकर आगरा में वह रुक गया और वहां से शाहजहाँ को मिलने अपने पास बुलवाया |

दारा शिकोह मुंहफट किस्म का राजा था | दरबार में अक्सर अमीर, उमरा को अपमानित कर दिया करता था जिससे एक बड़ा शासक वर्ग उससे नाराज़ रहता था इसके अलावा उसमे वैसी षड्यंत्रकारी बुद्धि न थी जैसी औरंगज़ेब में थी | इन सब का खामियाज़ा दारा शिकोह को अपने बेटे के साथ अपनी जान दे कर भुगतना पड़ा |

औरंगज़ेब ने अपने बाप शाहजहाँ की ज़िन्दगी भी उदासियों से भर दी जो उसकी बची हुई ज़िन्दगी भर उसके पीछे साए की तरह लगी रहीं | अपने अत्यधिक अत्याचारों की वजह से औरंगज़ेब का शासन काल, मुग़लों का पतन-काल सिद्ध हुआ |

औरंगज़ेब के बाद ‘मुहम्मद शाह रँगीला’ मुग़लों का राज्याधिकारी हुआ | उसके दुर्भाग्य से, उसकी रंगीन महफ़िलों पर, ईरान से चली हुई ‘नादिरशाह’ नाम की आंधी कहर बन कर टूट पड़ी | यद्यपि मुहम्मद शाह की फौज़, नादिरशाही फौज़ से दो गुनी थी लेकिन मुहम्मद शाह की फौज में ज्यादातर रसोइये, बावर्ची, गवैये, तबलची और कारीगर आदि थे | मुख्य लड़ाकों की संख्या कम थी |

करनाल के युद्ध में महज़ ढाई घंटे में फैसला हो गया कि ‘अब’ दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा | लेकिन नादिरशाह हिन्दुस्थान पर राज करने नहीं आया था उसे केवल अपनी लूट के माल-आसबाब से मतलब था | नादिरशाह ने पूरे शाही खजाने पर झाड़ू फेर दी और सारे अमीरों को उल्टा लटकवा कर पैसे से ख़ाली करवा लिया | अपनी तमाम लूट-खसोट के साथ वह तख्ते ताऊस को भी ईरान ले गया |

लेकिन लुटेरे नादिर शाह को उसके गढ़ फ़ारस में भी चैन न मिला | वहां उसी के ख़ानदान से ताल्लुक़ रखने वाले एक अमीर कुर्दां ने उसकी बेरहमी से हत्या कर दी और उसका सारा माल-आसबाब छीन लिया जिसमे तख्ते-ताऊस भी था | ज़ाहिल लुटेरो ने उस मयूर सिंहासन (तख्ते-ताऊस) के टुकड़े-टुकड़े कर डाले | उन ज़ाहिलों को उस सिंहासन की सुन्दरता से कोई मतलब नहीं था | उन्हें केवल उसके अन्दर जड़े हुए हीरे, जवाहरात और स्वर्ण से मतलब था |

इस प्रकार से लुटेरे नादिरशाह के जाहिल वंशजों ने उसकी बेरहमी से हत्या करके उसकी भीषण लूट के टुकड़ों को आपस में बाँट लिया | समय ने पलटा खाया और ईरान की हुकूमत आग़ा मुहम्मद शाह के हांथों में चली गयी | उसने नादिरशाह के वंशजों को पकड़-पकड़ कर अमानवीय यातनाएं दीं और उसने नादिरशाही लूट का सारा माल कहाँ रखा है, यह राज़ उगलवा लिया |

आग़ा मुहम्मद शाह ने अपने देश के सर्वश्रेष्ठ जौहरियों को तख्ते ताऊस के पुनर्निर्माण के कार्य में लगा दिया | जौहरियों ने उन टुकड़ों को जोड़-तोड़ कर एक नया तख्ते ताऊस बनाया जो वास्तविक मयूर सिंहासन से अलग था | लेकिन आग़ा मुहम्मद शाह को उनको काम पसंद आया |

परन्तु इसके बाद फिर से वहां विद्रोहियों द्वारा गृहयुद्ध छेड़ दिया गया | इससे पहले कि आग़ा मुहम्मद शाह नए तख्ते-ताऊस पर बैठ पाता, उसे फिर से लूट लिया गया | ज़ूनूनी ज़ाहिल लुटेरों ने फिर से उस तख्ते-ताऊस के रत्नों, जवाहरातों, और स्वर्ण के टुकड़ों को उखाड़ लिया |

कहा जाता है कि उन अत्यंत दुर्लभ और कीमती मणियों को, भविष्य में फिर कभी काम में लाने की दृष्टी से वहीँ समुद्र की अथाह जलराशि में किसी विशेष जगह छिपा दिया गया था | छिपाने वाले भीषण यातना देने पर भी उस स्थान का पता बता नहीं सके जहाँ उन्होंने उनको छिपाया था |

भीषण रक्तपात देखने वाले मयूर सिंहासन के ख़जाने के अवशेष आज भी वहीँ, समन्दर की गहराइयों में सो रहे हैं मानो कह रहे हों कि इससे अच्छा तो हम निर्जीवों की दुनिया है जो खुद भी चैन से रहते हैं और दूसरों को भी चैन से रहने देते हैं |