भगवान शिव के राधावतार और भगवती महाकाली के कृष्णावतार का रहस्य

भगवान शिव के राधावतार और भगवती महाकाली के कृष्णावतार का रहस्यएक बार की बात है देवर्षि नारद जी ने भगवान शिव जी से निवेदन किया-प्रभो! अनेक तत्व ज्ञानी लोग बताते हैं कि परात्पर विद्या स्वरूपिणी भगवती काली हैं। उन्होंने ही स्वयं पृथ्वी पर श्री कृष्ण रूप में अवतार ग्रहण कर कंसादि दुष्टों का संहार कर पृथ्वी का भार दूर किया, अतः आप बताने की कृपा करें कि महेश्वरी ने पुरूष रूप में क्यों अवतार धारण किया|

इस पर भगवान महादेव जी ने नारद जी की जिज्ञासा को शान्त करने के लिये उनके द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपनी ही कथा बताते हुए कहा “वत्स्! एक समय की बात है-कौतुकी भगवान शिव कैलास शिखर पर मंदिर में पार्वती के साथ एकान्त में विहार कर रहे थे। भगवती पार्वती की अचिन्त्य सुंदरता देख कर शम्भु सोचने लगे कि ‘नारी जन्म तो अत्यन्त शोभन है’-‘चेतसा चिन्तयामास नारीजन्मातिशोभनम्।।’

ऐसा सोचते हुए भगवान शिव ने पार्वती जी से अनुरोध किया कि मेरी इच्छा है कि पृथ्वी पर आप पुरूष रूप से एवं मैं आपकी पत्नी के रूप में अवतीर्ण होऊँ |भगवती पार्वती मुस्कुरायी | उन्होंने भगवान शिव जी से कहा कि हे प्रभु ! मै आपकी प्रसन्नता के लिये पृथ्वी पर वसुदेव के घर में पुरूष रूप में श्री कृष्ण होकर अवश्य जन्म लूंगी और हे त्रिलोचन! मेरी प्रसन्नता के लिये आप भी स्त्री रूप में मेरी प्रेयसी बन कर जन्म ग्रहण करें |

इस पर श्री शिव जी ने कहा ‘हे शिवे! आपके पुरूष रूप से श्री कृष्ण के रूप में अवतरित होने पर मैं आपकी प्राण प्रिया, वृषभानु पुत्री राधा रूप होकर आपके साथ विहार करूँगा। साथ ही मेरी त्रिमूर्तियां (जो मेरा ही अंश रूप होंगी) भी रूक्मिणी, सत्यभामा और जांबवंती के रूप में मृत्यु लोक में अवतरित होंगी और मेरे प्रस्थान करने के बाद आपकी पत्नी के रूप में आपके साथ रहेंगी’ |

उन परमेश्वरी महामाया ने यह भी कहा कि मेरी दोनों सखियां-विजया एवं जया उस समय श्रीदामा एवं वसुदाम के नाम से पुरूष रूप में जन्म लेंगी ।

देवी पार्वती ने आगे बताया “पूर्वकाल में विष्णु जी के साथ की गयी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मेरे कृष्ण होने पर श्री विष्णु मेरे अग्रज बलराम के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे। पूर्वकाल में भगवती एवं विष्णु जी ने युद्ध में जिन राक्षसों का संहार किया था; वे कंस, दुर्योधन आदि के रूप में जन्म लेंगे। पूर्वकाल में जो महान राक्षस मारे गये थे, वे अपने प्रारब्ध के अनुसार विभिन्न अधर्मी राजाओं के रूप में जन्म ग्रहण करेंगे, और मेरे द्वारा मारे जाएंगे । मेरी भद्रकाली की मूर्ति वसुदेव के घर में पुरूष रूप में ‘श्याम’ के नाम से अवतार लेगी |

भगवान विष्णु भी अपने अंश रूप में पाण्डु पुत्र, अर्जुन के रूप में मेरे सखा बनेंगे, धर्मराज अपने अंश रूप से युधिष्ठिर के रूप में, पवन देव अपने अंश से भीमसेन के रूप में, अश्विनी कुमार अपने अंश से माद्री पुत्र नकुल-सहदेव के रूप में जन्म लेंगे एवं मेरे अंश से ही कृष्णा-द्रौपदी का जन्म होगा।

मैं पाण्डु पुत्रों की विशेष सहायता करके युद्ध के लिये उत्सुक रहूंगी। मैं युद्ध में महान माया फैलाकर समर क्षेत्र में सम्मुख उपस्थित होकर परस्पर मारने की इच्छा वाले वीरों का संहार करूंगी। मेरी ही माया से मोहित होकर दुष्ट राजा एक-दूसरे को मार डालेंगे। इस युद्ध में धर्मनिष्ठ पांच पाण्डव, बालक एवं वृद्ध मात्र शेष रह जायेंगे। मैं पृथ्वी को भार से मुक्त करके पुनः यहां लौट आऊँगी” |

यहाँ कुछ लोगों को संदेह हो सकता है कि बलराम जी तो शेषनाग जी के अवतार थे और पाण्डुपुत्र अर्जुन तो इंद्रदेव के अंश से पैदा हुए थे | उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी कद्रु से ही नागवंश की उत्पत्ति हुई | कद्रू के समस्त पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ शेषनाग जी भगवान विष्णु के ही अंश थे | अपने बाकी भाइयों से अलग शेषनाग जी अतुलनीय और अपरिमित बल के स्वामी होने के बावजूद संत स्वभाव के थे | भगवान विष्णु के प्रति उनकी अनन्य भक्ति थी | उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान विष्णु की ही सेवा में ही बिताने का संकल्प लिया है |

अपने पति पाण्डु की अभिलाषा और अनुमति से जब कुंती ने पुत्र प्राप्ति के लिए, शक्तिशाली मन्त्र द्वारा, देवराज इंद्र का आवाहन किया तो इंद्र ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया | इंद्र के तेज से कुंती ने जिस पुत्र को प्राप्त किया वो अर्जुन थे | तो इस प्रकार से इंद्र के अंश से अर्जुन पैदा हुए थे | किन्तु अर्जुन का जीव भगवान विष्णु की अष्टकलाओं से ही व्यक्त हुआ था | नर और नारायण में, नर ही अर्जुन के रूप में पैदा हुए थे जो भगवान विष्णु के ही अंश थे |

ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर साक्षात भगवती पार्वती ही देव कार्य सिद्धार्थ अपने अंश से वसुदेव पुत्र श्री कृष्ण के रूप में तथा भगवान विष्णु वसुदेव के घर बलराम एवं पाण्डु पुत्र अर्जुन के रूप में अवतीर्ण हुए | भगवान शिव उनकी प्रेयसी राधा बनकर उनके साथ तब तक रहे जब तक कन्हैया गोकुल में रहे | कंस वध के पश्चात कन्हैया स्वयं गोकुल आये और पुत्र वियोग में विक्षिप्त हुई अपनी मैया यशोदा एवं अपनी चिर संगिनी राधा जी को एक दिव्य विमान में बैठा कर अपने अलौकिक धाम में भेज दिया |