बगल सीट वाली लड़की

बगल सीट वाली लड़कीमैं लखनऊ रेलवे स्टेशन से ट्रेन पर चढ़ा था। मेरे बगल वाली सीट पर एक साँवले रंग की तीखे नैन-नक्श वाली लड़की थी, जो वाराणसी से आ रही थी। यह संयोग ही था कि मेरी बर्थ उसके नजदीक वाली ही थी। जैसे ही मैं अपनी सीट पर पहुंचा वह बगल सीट वाली लड़की उस समय अपने मोबाइल से किसी से बातें कर रही थी। उसकी वार्तालाप में प्रयोग होने वाले शब्दों में काशी सी पावनता झलक रही थी।

मैं उसके द्वारा मोबाइल पर की जा रही बातों में दिलचस्पी लेकर थोड़ी देर सुनता रहा, लेकिन कुछ समय बाद ही आलस्य के बादल मेरे मन -मस्तिष्क के ऊपर उमड़ने घुमड़ने लगे। मैंने अपनी बर्थ पर चादर बिछाई और अपना हवा वाला तकिया निकाला और लेट गया। मैं अपनी थकावट मिटाना चाहता था।

दरअसल वाराणसी-दिल्ली एक्सप्रेस पूरे एक घंटे विलंब से लखनऊ स्टेशन पर आई थी। मैं स्टेशन पर अपनी इस ट्रेन का इंतजार करते-करते बोर हो गया था। इस ट्रेन को पकड़ने के चक्कर में रात- भर चैन की नींद नहीं आयी थी। इसलिए मैंने अपनी बर्थ पर थोड़ी देर झपकी मारने में ही अपनी भलाई समझी और लेट कर खर्राटे भरने लगा।

लगभग डेढ़ घंटे बाद चाय-चाय की आवाज ने मेरी नींद तोड़ डाली। लगता था कि शायद कोई स्टेशन आ गया था। मैंने खिड़की से हाथ बढ़ाकर कुल्हड़ वाली चाय ली और उसका लुत्फ उठाने लगा। अब मैं अपने आप को बहुत रिलैक्स महसूस कर रहा था। मैं लेटा-लेटा अपने घर के बारे में सोंच रहा था। मन में बार-बार अपने माता-पिता के कहे शब्द ध्यान में आ रहे थे।

वे आज कह रहे थे कि बेटा शादी कर लें ताकि हमें भी बहु की सेवा का सुख मिल सके। मैं यही सोंचता हूँ कि कोई लड़की तो अच्छी मिले। शादी करने के लिये तो मैं तैयार बैठा हूँ।

घर की यादों से बाहर निकल कर मैनें अपनी बगल सीट वाली की ओर देखा तो आश्चर्य चकित रह गया। मेरे सोने से पहले जो लड़की बगल वाली बर्थ पर थी उसकी जगह दूसरी लड़की आ चुकी थी। अब उस साँवली लड़की की जगह एक अत्यंत खूबसूरत लड़की बैठी थी। हॉरर मूवी देखने में रुचि लेने वाला, मैं सोंचने लगा कि वह पहले वाली लड़की कहाँ गायब हो गई या तो वह भूतनी थी या तो ये भूतनी है।

लेकिन फिर मैनें इन बेकार की बातों से अपना मन हटाया। वह लड़की खिड़की से बाहर का दृश्य निहार रही थी। मेरे मन में हसरत थी कि वह केवल एक बार मेरी तरफ देख लेती तो मेरा भी सफर सुहाना हो जाता। थोड़ी देर बाद उसने मेरी ओर पलट कर देखा तो मेरे दिल की धड़कने बढ़ने लगीं।

लेकिन फिर मैनें अपने आप को संभाला। एकाएक वह खूबसूरत लड़की मुझे देखकर मुस्कराने लगी। मैं उसकी मुस्कराहट पर पूरी तरह फिदा हो गया। मैं उससे दोस्ती करने के लिये उतावला होने लगा। लेकिन बार-बार मेरे मन में यही सवाल उठ रहा था कि वह पहले जो बगल की सीट पर लड़की बैठी थी वह कहाँ चली गयी। उसे भी तो दिल्ली तक जाना था?

उसके स्थान पर यह दूसरी खूबसूरत लड़की कहाँ से आ गयी? मैनें हिम्मत करके उससे पूछ ही लिया “यहाँ सीट पर जो पहले बैठीं थीं वह लड़की कहाँ चली गयीं?” वह दूसरी आयी लड़की मेरे प्रश्न को सुन कर बहुत मुस्करायी। मैनें सोंचा कि क्या मैंने कुछ गलत पूछ लिया। फिर उसने बताया कि जो पहले यहाँ बैठी थी वह लड़की मेरी सिस्टर थी।

मैंने उससे पूछा कि “वह आपकी सिस्टर थी शब्द से आपका क्या मतलब? क्या वह अब नहीं है? आप कहना क्या चाहती है?” मेरी बात सुनकर वह सकपकायी। फिर वह बोली “मैं गलत बोल गई। दरअसल वह मेरी बर्थ नंबर L26 पर चली गयीं और मैं उसकी जगह यहाँ चली आयी।” मैनें मन ही मन सोंचा अच्छा हुआ कि वह पहले वाली लड़की यहाँ से चली गयी। उसकी जगह उसकी यह खूबसूरत बहन आ गयी। इसके साथ सफर अच्छा कटेगा।

हो सकता है मेरी इससे अच्छी टियुनिंग बैठ जाये और इस सफ़र में मुझे मेरा हम सफर मिल जाये। मैं खयाली पुलाव पकाने लगा। उस खूबसूरत लड़की से बातों का सिलसिला बढ़ाने के उद्देश्य से मैंने उससे पूछ ही लिया “क्या आप भी दिल्ली तक जा रही हैं?” उसने फिर मुस्काते हुये कहा, ‘हाँ।’ फिर उस लड़की ने मुझसे पूछा, “क्या आप भी अकेले ही यात्रा कर रहे हैं या कोई साथ है?”

मैनें हिम्मत जुटाकर कहा कि मैं भी आप ही की तरह अकेले यात्रा कर रहा हूँ। मैं मन ही मन सोंच रहा था कि यह खूबसूरत लड़की कितनी मीठी- मीठी बातें कर रही है। अच्छा शगुन है। मैं थोड़ी देर खिड़की से बाहर देखने लगा।

फिर कनखियों से बगल सीट वाली लड़की को देखा। अब वह बड़े मजे से अंग्रेजी का कोई उपन्यास पढ़ रही थी। एकदम ग्रामीण परिवेश में दिखने वाली वह खूबसूरत लड़की शेक्सपियर की लिखी हुई कोई किताब पढ़ रही थी। अब मुझे पता लगा कि वह वास्तव में अंग्रेजी भाषा की अच्छी जानकार है। वह फिर मेरी तरफ मुखातिब हुई। उसने अपनी इंग्लिश की वह पुस्तक रखी और मुझसे अंग्रेजी में गिट-पिट बातें करने लगी।

अब तो मेरी हालत ख़राब। मैं कोसने लगा उस रिज़र्वेशन सिस्टम को, जिसने मुझे इस इंग्लिश भाषी महिला की बगल में जगह दे दी। मैं भी उसकी बातों को अनसुना करके खिड़की के बाहर देखने लगा। अंग्रेजी के अखाड़े में मेरी वीकनेस भाँपकर उसने फिर से हिंदी में बोलना शुरू किया। अरे भाई साहब जो उसने हिन्दी बोली उसकी हिंदी के सामने सारे विद्वान फेल।

मैंने अपनी हिम्मत जुटाई और अपना परिचय दिया। ‘जी, मैं सुबोध लखनऊ से।’ “अच्छा तो आप अंतर्मुखी हैं?” उसने सवाल दागा। उसने कहा ‘अंतर्मुखी’, मैं अंदर ही अंदर हिल गया। मन ही मन सोचने लगा कि यह अंतर्मुखी किस चिड़िया का नाम है? जो मेरे घर में रहती है लेकिन आज तक मैंने उसका नाम नहीं सुना?

मुझे अंतर्मुखी का तमगा पहनाने वाली उस लड़की के अंतर्मुखी के अर्थ को जाने बिना जी कहकर मुस्कुरा दिया। मेरे मुस्कराते ही बस उस बगल सीट वाली लड़की ने मेरी वह मुस्कुराहट पकड़ ली और कहने लगी ‘आपकी स्माइल में भी लखनऊ वाली नजाकत है।’

मैंने सोचा कि ये लड़की क्या कह रही है? इतनी पढ़ी-लिखी योग्य लड़की मुझ जैसे मामूली इंसान को इतने भारी भरकम शब्दों से नवाज रही है। उसका बोझ मैं कैसे उठा पाऊंगा? लेकिन उसकी बातों ने मेरे मन को मोह लिया था।

सुबह के नाश्ते का समय हो चला था। मैंने अपनी ट्रेन यात्रा का पारंपरिक भोजन पूरी-सब्जी खाने के लिये निकाली। लेकिन उस बगल सीट वाली लड़की ने कागज की प्लेट पर चार पांच प्रकार के फल निकालकर काटे और बड़े प्रेम से उस पर नमक छिड़कने लगी। मुझे लगा कि वह मेरे ही कलेजे पर नमक छिड़क रही है।

मैं सोचने लगा कि हर मुकाबले में मैं उस बगल सीट वाली लड़की पीछे हूं। एक वह है जो हैल्दी फूड ले रही है और मै अस्वास्थ्यकर तली हुई चीजों को अपना खाद्य पदार्थ बनाए हुए हूँ। मैंने उस लड़की की तरफ से स्नेहपूर्ण नजरों से देखा। उसने अपने साथ लाए फलाहार के लिए मुझे आमंत्रित किया।

पहले मैंने अपने दिल पर पत्थर रखकर साफ मना तो कर दिया, क्योंकि रास्ते में अजनबियों से खाने-पीने का सामान ना लेने की जो हिदायत मुझे बचपन में ही दे दी गई थी, वह मैंने आज तक गांठ बांध कर रखी हुईं थी। लेकिन फिर मन न माना उसका दिल रखने के लिये मैनें फल का एक टुकड़ा उठा लिया। उसकी निश्छल हंसी और मनमोहक मुस्कान मेरे हृदय में स्थान बना चुकी थी।

हम दिल्ली के रास्ते आगे बढ़ते चले जा रहे थे। रास्ते के बड़े और छोटे स्टेशन विदा होते हुए निकलते जा रहे थे। मैं बार-बार बगल सीट वाली खूबसूरत लड़की को देखकर मन ही मन खुश हो रहा था कि काश मैं भी बगल सीट वाली लड़की के गुणों में से एक-आध पा लेता तो मेरा जीवन भी धन्य हो जाता। कभी-कभी मन में यह भी इच्छा उठती थी कि बगल की सीट वाली लड़की की ही तरह कोई मुझे भी मिल जाता, तो वाकई मेरी जिंदगी भी सुरमई गीत गाने लगती।

मन कल्पना की उड़ान भरने लगा। यदि बगल सीट वाली इसी सर्वगुण संपन्न देवी जी से मेरी शादी हो जाती तो मेरे बच्चे भी अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान होंगे। मेरे घर का सारा वातावरण उस लड़की की खूबसूरती से सुंदर हो जायेगा। मेरे दिल की घंटियां बजने लगी। मैं सपनों की दुनिया में खोने लगा।

खिड़कियों से आने वाली ठंडी हवा का झोंका मुझे नींद की आगोश में लेने लगा। लेकिन आँखों में नीदं कहाँ थी। मन तो उस खूबसूरत लड़की से जुड़ गया था। मैनें सोंच लिया था कि जब इसकी साँवली वाली बहन आयेगी तो उससे इस खूबसूरत लड़की का अपने लिये रिश्ते की बात करूंगा। शायद वह मान ही जाये।

ऐसे ही ख़्वाबों को बुनने में व्यस्त मेरी अलसायी आँखों ने जब थोड़ी देर बाद बगल में देखा तो वह बगल सीट वाली लड़की करवट लेकर सो गई थी। मैं भी इत्मीनान से सो गया। मेरी नींद ने शायद थोड़े से क़दमों में ज़्यादा लम्बी दूरी का सफ़र तय कर लिया था क्योंकि आंखें खुली तो दिल्ली स्टेशन आने वाला था।

मैनें देखा कि वही पहले साँवली वाली लड़की फिर बर्थ पर थी। वह खूबसूरत लड़की गायब थी, जिससे मुझे कुछ-कुछ प्यार हो गया था। मैनें उस साँवली वाली लड़की से पूछा कि ‘तुम्हारी वह गोरी वाली सिस्टर कहाँ हैं?’ मेरे इस सवाल से वह लड़की चौंक कर मुझे देखने लगी। उसने थोड़ी सी तेज़ आवाज़ में पूछा “तुम मेरी कौन सी सिस्टर की बात कर रहे हो, मैं तो इस ट्रेन में अकेली यात्रा कर रहीं हूँ।”

मैनें फिर पूछा कि “अब तक आप कहाँ थीं?” उसने बताया कि ‘मैं वाशरूम गयी थी कि बाहर से किसी ने वाशरूम को लॉक कर दिया था। जब किसी ने लॉक खोला तो बाहर निकल सकी।’ अब मेरा माथा ठनका कि अब तक जो मुझसे बातें कर रही वह खूबसूरत लड़की कौन थी? मुझे याद आया कि उसने बताया था कि वह बर्थ नंबर L-26से आयी है।

मैं दीवानों की तरह उसके प्यार में पागल होकर दौड़ता हुआ उसके बताये नंबर पर उसे देखने के लिये गया। लेकिन उस बर्थ नंबर पर कोई लड़की नहीं थी। L-26 बर्थ पर एक सरदार जी खर्राटे भर रहे थे। मैं तो भौचक्का रह गया। अब तरह -तरह के सवाल मेरे मन में उठने लगे कि वह खूबसूरत लड़की कौन थी? वह कहाँ से आयी थी और कहाँ चली गयी।

मेरे लौटने पर उस साँवली वाली लड़की ने मुझे इस तरह परेशान देखकर उसका कारण पूछा। मैनें उस खूबसूरत लड़की की सारी बात उस साँवली वाली लड़की को बतायी कि किस तरह उसकी बहन बन कर एक लड़की उसके बर्थ पर आयी और मुझसे ढेर सारी बातें की और, मुझे उससे प्यार हो गया।

मेरी बातें सुनकर उस साँवली लड़की ने जो कुछ मुझे बताया उसके बाद तो दिसंबर की ठंड में भी मैं पसीने-पसीने हो गया। उसने बताया कि मेरी एक बहुत खूबसूरत बहन थी। वह मुझसे दो साल छोटी थीं। वह पढ़ने में बहुत तेज थी। इंग्लिश उसका फेवरेट सब्जेक्ट था। वह खुद अंग्रेजी में कविता लिखती थी। वह एम. बी. ए. कर रही थी। हम दोनों बहनों की खूब बनती थी।

लेकिन अफसोस एक दुर्घटना में पिछ्ले साल उसकी मौत हो गयी। उसने यह भी बताया मैं और मेरी बहन ही हर वर्ष ट्रेन से घूमने निकलते थे। आज जब मैं वाशरूम में बंद हो गई तो रह-रह कर मेरे मन में यही ख्याल आ रहा था कि आज मेरी बहन जिंदा होती मेरी बर्थ पर मेरे सामान का ध्यान रख रही होती।

मेरे ऐसा सोंचने के कारण ही शायद मेरी बहन की आत्मा मेरे बर्थ पर आ गयी होगी। ऐसा कहते हुए उस लड़की की दोनों आँखों की पलके अश्रुओं के सैलाब में भीगने लगी थी।