दादा जी की आत्मा

दादा जी की आत्मागिरधर गोपाल श्रीवास्तव के परिवार में छह लोगों की संख्या थी। गिरधर ओर उनकी पत्नी, दो बच्चे और गिरधर के माता-पिता। गिरधर की छोटी सी प्राइवेट नौकरी थी। गिरधर क़े पिता रेलवे विभाग से रिटायर हुये थे। गिरधर की छोटी सी तनख्वाह ओर पिता जी की पेंशन मिलाकर घर का खर्चा चल जाता था।

गिरधर का बड़ा बेटा अजय इस साल क्लास टैन्थ में था। इस बार उसका बोर्ड एग्जाम था लेकिन गिरधर की इतनी आमदनी नहीं थी कि वह अपने बेटे अजय की बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिये ट्युटर लगा सके।

रिटायरमेंट के बाद गिरधर के पिता ने ही अपने पोते अजय की पढ़ाई-लिखाई का पूरा जिम्मा ले रखा था। दादा जी रोज अजय को छत पर ले जाते, जहाँ वह उसे ट्युशन दिया करते थे। अजय अपने दादा जी के मार्ग निर्देशन के कारण ही क्लास में हमेशा अव्वल रहता था। दादा जी को प्रसन्नता होती थी कि उनकी मेहनत रंग ला रही है।

इस बीच एक हादसा हो गया। दादा जी को डेंगू बुखार हो गया। इलाज के बावजूद उनकी प्लेट्लेट्स गिरती गयीं ओर दादा जी गुजर गये। गिरधर के परिवार का मनोबल टूट गया। अब गिरधर का बेटा अजय दुखी रहने लगा। सोचा करता कि दादा जी के चले जाने बाद अब उसकी पढ़ाई में कौन हेल्प करेगा।

एक रात दादा जी अजय के सपने में आये उन्होने अजय से कहा दुखी मत हो। तुम्हारी तैयारी पहले की तरह चलती रहेगी। तुम पहले की तरह छत पर चटाई बिछाकर पढ़ने बैठ जाया करो। दादा जी की सपने में आने की बात अजय ने किसी को नहीं बतायी। वह उसी दिन शाम को अपनी कॉपी -किताबें लेकर छत पर पहुँच गया और मैथ्स के सवाल हल करने लगा।

प्रैक्टिस करते-करते एक सवाल फंस गया। काफी कोशिश के बावजूद उस सवाल का उत्तर नहीं आ रहा था। अब अजय सोचने लगा कि काश आज दादा जी जिंदा होते तो उसकी इस प्रॉब्लम का हल चुटकियों में निकाल देते। वह मायूस हो गया लेकिँन अगले ही क्षण चौंक गया। वह देखता है कि दादा जी सफेद वस्त्रों में उसके सामने बैठे हैं।

एक पल को उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। दादा जी बोले हाँ मैं ही हूँ। लेकिन मेरी आने की बात किसी को बताना मत। पूछो क्या पूछना है? अजय ने अपने वे सारे सवाल पूछ लिये जो उसे नहीं आ रहे थे। दादा जी ने उसकी सारी प्रॉब्लम सॉल्व कर दी।

अब अजय रोज शाम छत पर आ जाता। फिर पहले की तरह दादा ओर पोते बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जुट गये। जब एग्जाम हुये तो अजय पूरे कॉलेज में नंबर वन पोजीशन पर आया। गिरधर के घर में खुशी की लहर दौड़ गयीं। शाम को अपना रिजल्ट लेकर अजय दादा जी को दिखाने छत पर ले गया तो अजय के पिता गिरधर गोपाल श्रीवास्तव को यह बात अजीब लगी कि अजय अपने परीक्षा का परिणाम छत पर किसे दिखाने ले गया है।

वह भी धीरे से उसके पीछे-पीछे गये। वहाँ जो कुछ देखा तो आश्चर्य चकित रह गये। अजय किसी अदृश्य व्यक्ति को अपना रिजल्ट दिखा रहा था। गिरधर ने अनुमान लगा लिया कि यह उसे पिता जी की आत्मा होगी, जिसे अजय अपना रिजल्ट दिखा रहा है और उन्होने यह भी जान लिया यह उसके पिता जी की ही आत्मा थी जो अब तक अपने पोते की परीक्षा की तैयारी कराती रही।

गिरधर दबे पाँव वापस आ गये। छत से नीचे आकर वह सीधे कमरे में लगी अपने पिता जी की तस्वीर के सामने गए ओर उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए। उनकी आखों से आँसू छलक आये थे।