क्या वेदों, उपनिषदों, एवं ब्राह्मण ग्रंथों में भी भगवान के अवतार का वर्णन हुआ है


क्या वेदों, उपनिषदों, एवं ब्राह्मण ग्रंथों में भी भगवान के अवतार का वर्णन हुआ है अवतार शब्द किससे बना है
उपसर्गपूर्वक तृ धातु से ‘अवतार’ शब्द बना है। शाब्दिक रूप से समझे तो, ‘उच्च स्थान से नीचे स्थान पर उतरना’, इसे ‘अवतार’ कहते हैं। अवतार किसका? कब? और किसलिये होता है? इन प्रश्नों के उत्तर भगवान श्री कृष्ण ने भगवदगीता (4।7-8) में इस प्रकार दिये हैं-

“हे अर्जुन! जब-जब धर्म की ग्लानि (हानि) होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं जन्म (अवतार) धारण करता हूं। साधुजन (सत्पुरूषों) के रक्षण हेतु, दुर्जनों के विनाशार्थ तथा धर्म की स्थापना के लिये मैं (भगवान) युग-युग में अवतीर्ण (प्रकट) होता हूं”।

इससे स्पष्ट होता है कि भगवान के अवतार का प्रथम प्रयोजन साधुस्वभाव के सत्पुरूषों का परित्राण (रक्षण) करना ही है। भगवान श्री कृष्ण आगे कहते हैं कि “हे अर्जुन! मेरे दिव्य जन्म एवं कर्म को जो व्यक्ति तत्वतः जानता है, वह देह त्याग करने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, अपितु मुझे ही प्राप्त होता है”।

वैदिक धर्म ग्रन्थों में प्रतिपादित ‘अवतार तत्व’, हिन्दू धर्म का एक प्रमुख तत्व है। वैकुण्ठ धाम छोड़ कर अपने विशेष कार्य पूर्ण करने के लिये भगवान के भूलोक में पधारने को ‘अवतार’ कहा जाता है। भगवान जब प्राणी का अथवा मनुष्य का देह धारण कर कुछ समयपर्यन्त अथवा जीवनपर्यन्त उस देह में निवास करते हैं, तब उस देह धारण को अवतार कहते हैं।

उत्पत्ति, स्थिति एवं लय, ये सृष्टि के स्वभाव धर्म हैं और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर, ये तीन देव धर्म के कारक माने गये हैं। उनमे से सृष्टि पालन का उत्तरदायित्व विष्णु पर है। अतः जब-जब सृष्टि में उपद्रव प्रारम्भ होता है और विनाश की प्रक्रिया अपनी वृद्धि करने लगती है, मानव-समाज में धर्म की हानि होने लगती है, तब-तब धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु युग-युग में अवतार लेते हैं। ऐसी धारणा सनातन धर्मावलम्बियों की है। सनातन मत के सभी धर्म ग्रन्थ इस धारण को परिपुष्ट करते हैं।

जन्म और अवतार में अंतर

मनुष्य का जन्म होता है, जबकि भगवान का अवतार होता है। मनुष्य अपना जन्म लेने से स्वतंत्र नहीं है, जबकि भगवान अपना अवतार लेने में स्वतन्त्र हैं।
श्रीमद भगवदगीता (4।6) में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि “हे अर्जुन! मै। अज (अजन्मा) हूं, अव्यय (अविनाशी) हूं, समस्त प्राणियों का ईश्वर हूं तथापि मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी माया द्वारा जन्मता हूं। मैं जन्म लेने में स्वतन्त्र हूं”।

वेदों में अवतार तत्त्व के जो बीज प्राप्त होते हैं, पुराणों में उनका उपबृंहण कर आख्यान रूप में विस्तार हुआ है। वैदिक वाङ्ग्मय में अवतारों का जो मूल प्राप्त होता है, उसका संक्षेप में कुछ वर्णन यहां प्रस्तुत है-

1- शतपथ ब्राह्मण (1।8।1।1-6)में कथा आयी है कि प्रलयकाल में मनु ने अपनी नौका की रस्सी एक महा मत्स्य के श्रृंग के साथ बांधी थी। उस मत्स्यराज ने महाप्रलय से मनु और उनकी नौका का रक्षण किया था। शतपथ ब्राह्मण की इस सूक्ष्म कथा का आगे पौराणिक ग्रंथों में मत्स्य अवतार कथा के रूप में विस्तार हुआ।

2-तैत्तिरीय आरण्यक में कथा है कि प्रजापति का शरीर कूर्मरूप में जल में फिरता था, वहीं ‘सहस्रशीर्षा पुरूषः’ इस स्वरूप में प्रजापति ने उन्हें विश्व निर्माण करने के लिये कहा। उसने प्रत्येक दिशा में जल फेंक कर आदित्यादि सृष्टि का निर्माण किया। जबकि तैत्तिरीय ब्राह्मण (1।1।3।6) में कथा है कि प्रजापति ने वराह रूप धारण कर समुद्र तल से पृथ्वी को जल से बाहर निकाला। कल्पान्तर से से कथाओं में यह भेद मिलता है | आगे चल कर यही कथा वराह-अवतार के रूप में हमें पुराणों में मिलती है।

3-ऋग्वेद (8।14।13) में कथा है कि नमुचि दैत्य का मस्तक इन्द्र ने जल का फेन फेंक कर उड़ाया था। इस कथा से नृसिंह-अवतार की कथा विकसित हुई। नृसिंह का प्रथम उल्लेख तैत्तिरीय आरण्यक में आया है।

4-ऋग्वेद (1।22।17) में है कि ‘इद विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्।’ इस विश्व को तीन पाद (चरण) रख कर विष्णु ने आक्रान्त किया। इससे वामन ने बलिराज के पास जाकर त्रिपाद भूमि मांग कर आखिर में त्रिभुवन व्याप्त किया | हम जानते हैं कि इसी प्रकार से वामन-अवतार की कथा विकसित हुई है।

5-शतपथ ब्राह्मण (1।2।5।5) में कहा है कि विष्णु ही प्रथम वामन (ठिंगु) थे ‘वामनो ह विष्णुरास।’ विष्णु का अर्थ यज्ञ भी है। इसके योग से देवों ने अर्चा और श्रम करके सम्पूर्ण पृथ्वी प्राप्त कर डाली।

6-अथर्ववेद (5।19।1-11) में कथा है कि ‘सृचय वैतहव्य’ नामक राजा भृगु एवं ब्राह्मणों की हिंसा करने पर पराभूत हुए। इस कथा से परशुराम अवतार की कथा सूचित होती है।

7-छान्दोग्योपनिषद (3।17।6) में देवकी पुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है। द्वापर युग में यदुनन्दन श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है-‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।।’ श्री कृष्ण का बाल चरित्र गोकुल और वृन्दावन में गोप-गोपियों के साथ व्यतीत हुआ। उन्होंने बालपन में दैत्यों का संहार किया, कालियदमन एवं कंस का वध किया इत्यादि। वे बड़े होकर वृष्णियों के राजा माने गये, यद्यपि वे मूलतः यादवों और सात्वतों के देव के रूप में प्रसिद्ध थे।

8-रामायण आदि धर्म ग्रन्थों के अनुसार भगवान् का राम अवतार त्रेतायुग के अंत में हुआ। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण द्वारा राम (दशरथ पुत्र राम) लोकविश्रुत हुए। वे सत्यवादी, निर्भीक, दृढ़प्रतिज्ञ, पितृभक्त, बन्धुवत्सल, महा पराक्रमी होने से अगणित लोकों मे आदरणीय हुए।
राम भक्ति साहित्य में अध्यात्म रामायण तथा श्री रामचरितमानस का उच्च स्थान है।

वैष्णव-सम्प्रदाय में विष्णु की अपेक्षा उनके अवतार राम एवं कृष्ण अवतार को विशेष महत्व देकर पूजा की जाती है। भगवान् विष्णु के अनन्त अवतार है। विविध ग्रन्थों में विविध नाम रूपों में उनके अवतार का वर्णन हुआ है।

महाभारत शान्तिपर्व के नारायणी उपाख्यान में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, भार्गवराम (परशुराम), दाशरथी राम एवं वासुदेव कृष्ण-इन छः अवतारों की चर्चा है, आगे हंस और कल्कि आदि अवतार लेकर दस अवतारों का उल्लेख है। कहीं-कहीं यह संख्या बारह है। श्रीमद भगवदगीता (6।2।7) में 24 अवतारों का निर्देश हुआ है।

ये सभी अवतार लीला अवतार नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें भी दस अवतार विशेष प्रसिद्ध हैं, जो इस प्रकार हैं-1. मत्स्य, 2. कूर्म, 3. वराह, 4. नृसिंह, 5. वामन, 6. परशुराम 7. दाशरथी राम, 8. कृष्ण, 9. बुद्ध और 10. कल्कि

बौद्ध साहित्य में बुद्ध को दशरथ पुत्र राम का अवतार माना गया है। हिन्दुओं के अवतार-सिद्धांत को बौद्धों के महायान-पन्थ ने स्वीकार किया और उसको अपने पन्थ में प्रविष्ट किया। बोधिसत्व को बुद्ध का अवतार माना गया। महायान पन्थ ने ऐसा घोषित किया कि बुद्ध निर्वाण प्राप्ति के बाद भी पुनः अवतार लेने की क्षमता रखते हैं। भविष्य में वे (बुद्ध) मैत्रेय बुद्ध रूप में पुनः अवतार ग्रहण करने वाले हैं।

धर्म ग्रन्थों में अवतार के दो प्रकार कहे गये हैं-1. अंश अवतार 2. पूर्ण अवतार। थोड़े-थोड़े उपद्रवों की शान्ति के लिये उतने समयपर्यन्त भगवान अवतार लेते हैं और अपना वह कार्य समाप्त कर वे अन्तर्धान हो जाते हैं। इस प्रकार के अवतार को अंश अवतार कहते हैं। नीति धर्म का उच्छेद करने वाले एवं भूमि के भारभूत होने वाले रावण, कंस आदि विरोधी विग्रहों के निर्दलन के लिये भगवान जब अपने शक्ति समूह सहित अवतार लेते हैं और वह कार्य पूर्ण हो जाने के बाद भी कुछ समयपर्यन्त इस पृथ्वी पर रहते हैं, ऐसे अवतार को पूर्ण अवतार कहते हैं।

इस दृष्टि से राम-कृष्ण आदि को पूर्ण अवतार कहा गया है। राम के लघु बन्धु लक्ष्मण को तथा कृष्ण के ज्येष्ठ बन्धु बलराम को शेष अवतार माना गया है, रूक्मिणी को लक्ष्मी का अवतार तथा गोप-गोपियों को देव-देवियों का अवतार कहा गया है।

किन-किन देवों ने कौन-कौन अंश अवतार लिये, इस विषय में महाभारत के आदि पर्व (अध्याय 54-64) में कहा गया है। उसमें कतिपय अवतार इस प्रकार वर्णित हैं-नित्यावतार, गुणावतार, विभवावतार, तत्वावतार, अर्चावतार, अन्तर्यामी-अवतार, लीलावतार, मन्वन्तरावतार, युगावतार, आवेशावतार आदि।
अवतार के मुख्य सिद्धांत इस प्रकार है-

1. परमेश्वर का एक रूप में नित्य लोक में नित्य विहार होता है और दूसरे रूप में जगत्प्रवृत्ति होती है।
2. परमेश्वर एक होने पर भी स्वतः को अनेक रूप में प्रकट कर सकता है।
3. अवतार नित्य रूप है, मायिक नहीं।
4. सभी अवतार सच्चिदानन्द विग्रह हैं।
5. कुछ अवतार मनुष्य रूप में होते हैं तो कुछ परिस्थितिवश एवं कुछ अवतार भक्त की इच्छावश होते हैं।
6. अवतार का मानुष तन ही दिव्य होता है और उसमें दिव्य शक्ति का निवास होता है।
7. प्रत्येक अवतार की विशिष्ट देह लीला होती है और विशिष्ट लोक भी होता है।
8. परमेश्वर अवतार के रूप में पृथ्वी पर आने पर भी अपने दिव्य एवं पूर्ण रूप में निज धाम में विराजमान रहते हैं।

भगवान शिव के अवतार

विष्णु की तरह ही भगवान शिव ने भी विविध प्रसंग में अनेक अवतार लेकर साधु परित्राण और दुष्ट विनाश किया। इस विषय में शिव पुराण में वर्णन है। काल भैरव, शरभ, यज्ञेश्वर, महाकाल, एकादश रूद्र, हनुमान, नर्तक नट (नटराज), अवधूतेश्वर, वृषेश आदि उनके प्रमुख अवतार हैं। शिव की प्रथम भार्या दक्ष कन्या सती ही बाद में हिमालय-सुता के रूप में अवतरित होकर ‘पार्वती’ नाम से शिव की अर्धागिंनी हुईं।

पार्वती को आदिमाया या आदि शक्ति भी कहते हैं। उन्होंने भी असुर मर्दन के लिये अनेक अवतार लिये हैं। मुख्य देवता के कुछ परिवार देवता भी होते हैं। वे भी अपने स्वामी की अनुज्ञा से या विशिष्ट कार्यों के लिये मानव अवतार धारण करते हैं। गणपति के भी युग-युग में गणेश, विघ्नेश, मयूरेश, सिद्धि विनायक इत्यादि अनेक अवतार धारण करने के वृत्तान्त गणेश तथा मुदगल पुराण में हैं।

दक्षिण भारत के 12 आलवार विष्णु के आयुधों के अवतार माने गये हैं। महाराष्ट्र प्रदेश के भागवत-सम्प्रदाय में ज्ञानदेव (ज्ञानेश्वर) को विष्णु का अवतार नामदेव को उद्धव का अवतार मानते हैं। मध्यकाल के सभी सम्प्रदायों में अवतारों की चर्चा वर्णित है।

महाभारत, शान्तिपर्व (346।10।11, 348।6।8) में नारायणीय धर्म का विवेचन है। इस धर्म को सर्वप्रथम भगवान ने अर्जुन से कहा है, बाद में नारद जी को भी उपदेश दिया है। नारद जी ने आगे नारायण धर्म के अन्तर्गत व्यूह-सिद्धांत स्थापित किया है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध-ये चार मिलकर चतुव्र्यूह होता है। इस व्यूह में वासुदेव को परमात्मा तथा सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता माना गया है।

संकर्षण उनका दूसरा रूप है। वे प्राणि मात्र के प्रतिनिधि माने गये है। संकर्षण से प्रद्युम्न की उत्पत्ति हुई। प्रद्युम्न माने मन, फिर उनसे अनिरूद्ध हुए। वे अहंकार के प्रतिनिधि हैं। ये चारों हो नारायण की मूर्तियां हैं। उनमें से आगे महाभूत और उसके गुण उत्पन्न होते हैं। उसी समय ब्रह्मा की भी उत्पत्ति होती है और तत्वों की सामग्री से वे भूत सृष्टि की रचना करते हैं।

नारायणीय-आख्यान ने व्यूह वाद के अनुषंग में भगवान के अवतार की चर्चा आयी है। उसमें भगवान के केवल छः अवतारों का उल्लेख है।
वैदिक साहित्य में मित्र, वरूण, अग्नि, इन्द्र इत्यादि देवता को एक ही देवाधि देव का भिन्न-भिन्न स्वरूप माना गया है। इस प्रकार नारायणीय-उपाख्यान में कथित मूल भागवत या एकान्तिक धर्म आगे वैष्णव धर्म में परिणत हुआ।

व्यूह वाद में नारायण के केवल सृष्टिकारक गुणों को ही प्राधान्रू दिया गया है, तो अवतारवाद में भगवानके षड्गुणैश्चर्य एवं उनकी अनंत लीला को महत्व प्राप्त हुआ है। राम, कृष्ण आदि अवतार विशेषतः पूजनीय, भजनीय हुए। इस प्रकार वेद तथा अन्य धर्म ग्रन्थों में अवतार रहस्य का विस्तृत वर्णन हुआ है।