क्या वास्तव में श्रापित देवताओं को कष्ट भोगने के लिए धरती पर मनुष्य योनि में भेजा जाता है?

क्या वास्तव में श्रापित देवताओं को कष्ट भोगने के लिए धरती पर मनुष्य योनि में भेजा जाता है?

यह बड़ा रहस्यमय विषय है कि क्या देवता भी श्राप से ग्रस्त होते थे। देवताओं से बड़ा कौन था? जो उन्हें श्राप देता था। कभी कभी मन को यह सब झूठ और मनगढ़ंत कहानी लगती है। लेकिन आपको विश्वास हो या नहीं, लेकिन यह सच है कि अनेकों बार देवताओं को ऋषि-मुनियों द्वारा धरती पर मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया गया। जिसके कारण उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा।

साथ ही उन देवताओं को आम इंसान की तरह दुखों को भोगना पड़ा। पौराणिक गाथाओं में अनेकों स्थान पर इस बात का उल्लेख मिलता है। कि जब भी तपस्वीगण देवताओं से क्रोधित हो जाते थे तो वे उन्हें धरती पर मनुष्य योनि में पैदा होने का शाप दे देते थे। जो सच होता था।

इसका अर्थ यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल से ही इस बात को जाना जाता है कि मनुष्य योनि में जन्म लेने का अर्थ है कष्टों को भोगना। क्योंकि यह बात जग जाहिर है कि भू लोक का जीवन कितना कठिन है। आज हम आपको एक ऐसी ही अदभुत कहानी से परिचित करायेंगे जिसमें देवता गणों को ऋषि-मुनि से श्राप मिलने के बाद उन्हें देवता से मनुष्य बनना पड़ा।

लेकिन उस श्राप से बचने के लिए उन्होंने जो उपाय निकाला वह बहुत ही आश्चर्य चकित कर देने वाला था। जब आप इस कहानी को जानेंगे तो यही सोचेंगे कि इतनी छोटी सी गलती का इतना बड़ा दण्ड कितना अन्याय पूर्ण था। यह कहानी है अति प्राचीन, समय था महाभारत काल के पूर्व का।

एक बार की बात है कि राजा पृथु के पुत्र गण जिन्हें वसुओं के नाम से जाना जाता था, वन में भ्रमण कर रहे थे कि उन्हें घूमते-घूमते महर्षि वशिष्ठ की गायें वन में चरती हुई दिखाई दी। अति श्वेत वर्ण की महर्षि वशिष्ठ की वे गायें बहुत मनमोहक थी। ऐसा कहा जाता था कि जो भी महर्षि वशिष्ठ की उन गायों का दूध पी लेता था तो उसके चेहरे एवं शरीर के सौंदर्य में चार गुना वृध्दि हो जाती थी।

राजा पृथु के पुत्र द्यो के मन में लालच आ गया । उसने सोचा महर्षि वशिष्ठ की कुछ गायों को चोरी से राजमहल की गौशाला में ले चलते हैं, इन गायों का दूध पीकर हम भाइयों की पत्नियाँ और अधिक सुंदर हो जायेंगी। राजा पृथु के पुत्र द्यो ने अपनी यह योजना अपने अन्य भाइयों को बतायी।

भाई द्यो की यह बात सभी को पसंद आयी। महर्षि वशिष्ठ की गायों को बांधकर राजा पृथु के पुत्र अपने राजमहल में ले आये। शाम को जब ऋषि वशिष्ठ को पता चला कि उनकी कुछ गायें, जो प्रातः वन में चरने गयीं थीं लेकिन सायंकाल तक वापस आश्रम नहीं लौटीं। इस बात से महर्षि वशिष्ठ चिंतित हो उठे।

वे अपनी खोयी हुईं गायों का पता लगाने के लिए ध्यान मुद्रा में बैठ गये। महर्षि वशिष्ठ को ध्यान मुद्रा में तल्लीन हो जाने पर ज्ञात हुआ कि उनकी गायों को राजा पृथु के पुत्र चोरी करके अपने राजमहल की गौशाला में ले गये हैं। महर्षि वशिष्ठ राजा पृथु के पुत्रों की इस धृष्टता से अत्यंत क्रोधित हो गऐ। वे गुस्से में लाल तमतमाते हुए राजमहल पहुँच गये।

वे राज महल के द्वार पर खड़े होकर राजा पृथु को आवाज लगाने लगे। द्वारपालों ने भागकर राजा पृथु को बताया कि राजमहल के द्वार पर स्वयं महर्षि वशिष्ठ आये हैं जो देखने में बहुत क्रोधित लग रहे हैं। राजा पृथु यह समाचार सुनकर अत्यंत चिंतित हुए और राजमहल के बाहर दौड़े-दौड़े आये।

राजा पृथु ने देखा कि महर्षि वशिष्ठ वास्तव में उनके राज महल के द्वार पर खड़े है और बड़े गुस्से में हैं। राजा पृथु ने उन्हें अपने महल के अंदर बुलाना चाहा लेकिन वह नहीं माने। महर्षि वशिष्ठ ने राजा पृथु को बताया कि उनके पुत्र उनकी आश्रम की गायों का हरण कर अपने साथ ले आये हैं।

पहले राजा पृथु को विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब उन्होंने अपने पुत्र द्यो को बुलाकर पूछा तो सारा मामला समझ में आ गया। राजा पृथु के पुत्र द्यो को देखते ही महर्षि वशिष्ठ क्रोध से आग बबूला हो गये। उन्होंने तुरंत श्राप दे डाला कि मैं महर्षि वशिष्ठ राजा पृथु के सभी पुत्रों को देव योनि से मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप देता हूँ।

राजा पृथु ने हाथ जोड़कर महर्षि वशिष्ठ से प्रार्थना की कि वे उनके पुत्रों को शाप मुक्त कर दें।लेकिन महर्षि वशिष्ठ न माने। राजा पृथु के सभी पुत्र श्राप ग्रस्त होकर दुखी हो गये थे । इस श्राप से मुक्ति पाने के उद्देश्य से वे सभी देवी गंगा के पास गये। देवी गंगा ने राजा पृथु के पुत्रों को बताया कि वह उन्हें श्राप मुक्त तो नहीं कर सकतीं, लेकिन महर्षि वशिष्ठ के इस शाप के दण्ड को कुछ कम कर सकती हैं।

देवी गंगा ने बताया कि अगले जन्म में, मैं तुम भाइयों को मनुष्य योनि में जन्म लेने का माध्यम बनूंगी। लेकिन जन्म के बाद ही मैं उन्हें गंगा में डुबोकर मार डालूंगी । जिससे तुम सब भाई फिर देव योनि को प्राप्त कर लोगे। इससे महर्षि वशिष्ठ का श्राप भी पूरा हो जायेगा और तुम राजा भृगु के पुत्र मनुष्य योनि के कष्ट भोगने से भी बच जाओगे।

अगले जन्म में वही सब कुछ हुआ जो देवी गंगा ने कहा था। राजा शान्तनु और गंगा के आठ पुत्र हुए। लेकिन गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म लेते ही गंगा नदी में डुबो कर मार डाला। लेकिन जब गंगा अपने आठवें पुत्र को नदी में डुबोकर मारने जा रही थी कि राजा शान्तनु ने उसे मारने से रोक दिया।

इस तरह गंगा अपने आठवें पुत्र को पानी में डुबोकर न मार सकी। राजा शान्तनु द्वारा गंगा के आठवें पुत्र को मार डालने से रोका जाना विधाता की मंशा थी। क्योंकि पूर्व जन्म में राजा पृथु के इस पुत्र को मनुष्य योनि का कष्ट जो भोगना था। पूर्व जन्म में यह राजा पृथु वही बेटा द्यो था, जिसने महर्षि वशिष्ठ की गायें चोरी करने की योजना बनायी थी। गंगा का यह पुत्र भीष्म के नाम से प्रसिध्द हुआ। उन्हें मनुष्य योनि के तमाम दुख झेलने पड़े।