कुरुक्षेत्र युद्ध स्थान की भूमि, अपने में कई रहस्यों को समेटे हुए है

कुरुक्षेत्र युद्ध स्थान की भूमि, अपने में कई रहस्यों को समेटे हुए है

कुरुक्षेत्र, जी हाँ यह वही भूमि है़ जहाँ 5600 ईसा पूर्व महाभारत का घमासान युध्द हुआ था। क्या यह आपको मालूम है़ कि इस युध्द में पांडवो की तरफ से 1530900 सैनिक और कौरवों की ओर से 2405700 सैनिकों ने युध्द किया था। इस युध्द में पांडवो के सेनापति धृष्टघुम्न और कौरवों के सेनापति भीष्म थे। इस युध्द में भारी नरसंहार हुआ था।

कहा जाता है़ कि महाभारत के युध्द में लगभग 1 करोंड़ लोग मारे गये थे। 18 दिनों तक चलने वाले महाभारत युध्द में बहुत संख्या में योद्धा वीरगति को प्राप्त हुये। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस युद्ध में जीवित बचने वाले योद्धाओं की  संख्या इतनी कम थी कि जिनकी गिनती अंगुलियों पर की जा सकती है़। महाभारत के युद्ध में जिंदा बचने वालों में पांडव पक्ष में श्री कृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल ,सहदेव, सात्यकि और युयुत्सु थे। जबकि कौरवों की सेना में केवल तीन योद्धा जीवित बचे थे जिसमें अश्व्स्थामा ,कृपाचार्य और कृत वर्मा थे।

कुरुक्षेत्र की भूमि रहस्यों से भरी हुई है़

कुरुक्षेत्र देवताओं की वही भूमि है़ जिसका वर्णन प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से किया गया है़। यह वही स्थान है़ जहाँ परशुराम जी ने अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए इतने क्षत्रियों की हत्या की कि जिनके रक्त से पाँच कुण्ड भर गये। ये रक्त से भरे कुण्ड बाद में चमत्कार से पानी में बदल गये। बताया जाता है़ कि यह पानी के जलाशय इतने पवित्र हैं की इनका जल अमृत के समान माना जाता है़।

कुरु वंश के आदिपुरुष राजा कुरु ने सोने के हल से जोता था इस भूमि को 

यही वह कुरुक्षेत्र की धरती है़ जिसकी जमीन को सोने के हल से जोता गया था। जानते हैं वह राजा कौन था जिसने  सोने के हल से यहाँ की धरती को जोता था। दरअसल अपनी कीर्ति के लिए विख्यात राजा संवरण के पुत्र राजा कुरु ने स्वर्ण धातु से निर्मित हल से कई बार इस कुरुक्षेत्र भूमि की जुताई की थी। जिससे कारण महाभारत के युद्ध के पहले से ही रक्तरंजित यह भूमि पुनः पवित्र और उपजाऊ हो गयी थी।

वर्ष 1017 में महमूद गजनवी ने आक्रमण कर यहाँ की पहचान को मिटाने की कोशिश की, लेकिन जहाँ भगवान कृष्ण ने स्वयं अपने उपदेश रूपी वाणी से पूरी धरती को सींचा था, ऐसे स्थान का कोई अहित करना असंभव है। कुरुक्षेत्र  की भूमि 48 कोस अर्थात 145 किलोमीटर में बसी हुई है। इस क्षेत्र में कुरुक्षेत्र के अतिरिक्त करनाल ,पानीपत और जिंद आदि स्थान आते हैं। कुरुक्षेत्र की भूमि इस संपूर्ण सृष्टि में वह अलौकिक स्थान है कि जिसका वर्णन ऋग्वेद और यजुर्वेद में भी किया गया है। यहाँ की आदि नदी सरस्वती का जल अमृत के समान है। जो धरती पर रहने वाले लोगों के कल्याण के लिए प्रकट हुई थी।

श्री स्थानेश्वर महादेव मंदिर ,जहाँ भगवान शंकर अर्जुन को आशीर्वाद देने के लिए स्वयं प्रकट हुये थे

कुरुक्षेत्र की भूमि पर शिव जी का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर, श्री स्थानेश्वर महादेव मंदिर है। जिसकी महाभारत काल में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही वह मंदिर है जहाँ महाभारत के युध्द के दौरान पांडवों को आत्मबल प्राप्त होता रहा। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्री कृष्ण और पाँचो पांडव ने इस मंदिर में भगवान शिव की स्तुति की थी तो महादेव ने स्वयं प्रकट होकर ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद दिया था।

हरियाणा का ज्योतिसर, जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था

कुरुक्षेत्र की भूमि पर श्री स्थानेश्वर महादेव मंदिर तीर्थ स्थल के अतिरिक्त ब्रम्ह सरोवर, भद्रकाली मंदिर, ज्योतिसर आदि हैं। हरियाणा प्रदेश का ज्योतिसर वही स्थान है जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। आज भी पर्यटकों की भीड़ इस स्थान पर देखते ही बनती है। ज्योतिसर स्थान आज भी अदभुत शक्तियाँ समेटे हुये है। आज भी लोग इस जगह पर आकर अपने जीवन को धन्य मानते हैं। ऐसा लगता हैं कि आपने ज्योतिसर पहुँचकर संपूर्ण ब्रम्हांड के तीर्थों का लाभ प्राप्त कर लिया हो।

भारत वर्ष के प्रकांड विद्वान पंडित वेद व्यास जी ने कुरुक्षेत्र में हुये महाभारत के युद्ध को कविता की पंक्तियो  में पिरोया हैं। जिसे जो कोई पढ़ता है वह मंत्रमुग्ध हो जाता है। संस्कृत के महान विद्वान वेद व्यास जी ने कुरुक्षेत्र के महाभारत युध्द को श्लोकों में बांधकर गंगा को धरती पर लाने जितना महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने 1,40,000 श्लोकों में विश्व के सबसे बड़े युध्द महाभारत का वर्णन किया है।

यहाँ पर हुए महाभारत युद्ध का वर्णन महाभूत वेदव्यास जी ने अपने महाकाव्य में किया 

यह महाकाव्य संस्कृत भाषा में लिखा गया है। जिसको पढ़ने से पता चलता है कि महाकवि वेद व्यास के पास रचना करने की दैवीय शक्ति थी। कहा जाता है कि महाकवि वेद व्यास जी पर गणेश जी की महान कृपा थी। पुराणों में कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि भगवान गणेश ने स्वयं बोल-बोलकर महाभारत ग्रंथ की रचना करायी थी।

यद्यपि इस महाग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने ही की और गणेश जी ने इस महाकाव्य को लिपिबद्ध किया था, यही सर्वमान्य तथ्य है। लोग बताते हैं कि इस महाभारत ग्रंथ की रचना करने में, पृथ्वी के समय के हिसाब से, पूरे तीन वर्ष का समय लगा। लेकिन इस ग्रन्थ की रचना और निर्माण कार्य, वेदव्यास जी और गणेश जी ने किसी और ही आयाम में किया था जहाँ इसका निर्माण कार्य बहुत ही कम समय में पूर्ण हुआ।

राजा कुरु की जोती जमीन आज भी सोना उगल रही है

कुरुक्षेत्र महाभारत के युध्द की वही भूमि है जहाँ के किसानों को आज चावल के रिकार्ड उत्पादन के लिए पुरस्कार दिया जाता है। हरियाणा प्रदेश के कुरुक्षेत्र में आज सबसे उच्च क्वालिटी का चावल उत्पादन किया जाता है। यह क्षेत्र सबसे अधिक स्वादिष्ट, खुशबूदार और महंगे चावल ‘बासमती’ के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

कुरुक्षेत्र हरियाणा प्रदेश का वह क्षेत्र है जहाँ चावल के अतिरिक्त गन्ना, आलू आदि की पैदावार भी बहुतायत मात्रा में होती है। यह स्थान पूरे भारत में, दुग्ध उत्पादन में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कुरुक्षेत्र की उन्नत खेती और विकास के लिए यहाँ के राजा कुरु का प्राचीन गौरवशाली इतिहास रहा है। वहीं भगवान श्री कृष्ण के गीता उपदेश की कल्याणकारी वाणी है । जो यहाँ के परिवेश में रच-बस गयी है। जो क्षेत्रीय निवासियों का कल्याण कर रही है।