अंगूठा कट जाने बाद भी एकलव्य ने धनुष-बाण चलाने की नयी विद्या का आविष्कार कर डाला

एकलव्यअजीब संयोग था वह सब, न पांडव राजकुमारों का वह कुत्ता ईश वंदना में तल्लीन एकलव्य का ध्यान भंग करने के लिए उनके पास पहुंचता, न ही उनकी प्रार्थना में विध्न पहुंचता, न ही एकलव्य उस कुत्ते को भौंकने से रोकने के लिए वह उसके मुंह में धनुष बाण से निशाना लगाते और तब न गुरू द्रोणाचार्य को पता चलता कि धरती पर कोई अर्जुन से भी बड़ा धनुर्धर पैदा हो गया है।

ऐसे में न दक्षिणा में एकलव्य से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा जाता। लेकिन यह सब विधाता को मंजूर था। क्योंकि ऊपर वाला इस घटना के द्वारा कुछ और ही चाहता था। जिस रहस्य से परदा आज हम उठाएंगे।अब प्रश्न यह उठता है कि क्या एकलव्य के अंगूठा कटने के बाद उन्होंने धनुष बाण चलाना छोड़ दिया था ? जानेंगे इस सवाल का उत्तर आगे ! क्योंकि एकलव्य के अंगूठा कटने की घटना के पीछे विधाता की कुछ और ही मंशा थी, जिसे आप जानेंगे तो आश्चर्य चकित रह जाएंगे।

एकलव्य कौन थे 

एकलव्य कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। वह एक राज परिवार से संबंध रखते थे। दरअसल वह श्रृंगवेरपुर के राजा हिरण्य धनु नामक निषाद के बेटे थे। बाद में एकलव्य स्वयं श्रृंगवेरपुर राज्य के शासक बने। एकलव्य एक कुशल शासक थे। उन्होंने अपने पराक्रम से अनेक राजा- महाराजाओं को हराया और अपने राज्य को आगे बढ़ाया।

बचपन से ही एकलव्य को धनुष बाण चलाने में बहुत रुचि थी। इसलिए वह एक दिन गुरू द्रोणाचार्य से धनुष विद्या की शिक्षा लेने के लिए उनके पास गये। लेकिन दुर्भाग्य से गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा एकलव्य को तीरंदाजी की शिक्षा देने के लिए मना कर दिया गया।

तब एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य की अपने हाथ से मिट्टी की मूर्ति बनायी और उस मूर्ति के सामने खड़े होकर संकल्प लिया कि वे तब तक अपने राज महल में पैर नहीं रखेंगे, जब तक धनुष बाण चलाने की कला नहीं सीख लेंगे। उन्होंने वनवासियों की भांति जंगल में रहकर अपनी धनुष चलाने की कला का विकास किया।

द्रोणाचार्य द्वारा, दक्षिणा में, एकलव्य से उनका अंगूठा माँगना 

द्रोणाचार्य को कब और किस तरह तरह पता चला कि श्रृंगवेरपुर राज्य में रहने वाले एकलव्य अर्जुन से भी बढ़कर धनुर्धर बन गये हैं, यह कथा बड़ी दिलचस्प है। गुरू द्रोणाचार्य जंगल में अर्जुन, भीम, युधिष्टिर और नकुल व सहदेव के साथ जंगल में शिकार करने के लिए आए थे। उनके साथ उनका एक कुत्ता भी था।

उस दिन गुरु द्रोणाचार्य, पाण्डवों के साथ जंगल में शिकार करने के लिए निकल गये। उनके साथ आया, पांडव राजकुमारों का कुत्ता भी कहीं दूसरी ओर घूमने निकल पड़ा। कुत्ता घूमते -घूमते श्रृंगवेरपुर राज्य में पहुंच गया। यह एकलव्य का ही राज्य था। वहाँ उनके राजमहल में घुस कर वह कुत्ता जोर-जोर से भौंकने लगा।

उस समय एकलव्य अपनी ध्यान मुद्रा में तल्लीन थे। वह कुत्ता उपवन में बैठे एकलव्य के सामने पहुंच गया। वहां भी जोर-जोर से भौंकने लगा। उस कुत्ते के भौंकने से एकलव्य का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने कुत्ते को भोंकने से रोकने की बहुत कोशिश की। लेकिन कुत्ता मानने को ही तैयार ही नहीं था।

वह लगातार भौंके जा रहा था। एकलव्य के मना करने पर वह कुत्ता काटने दौड़ा। तब एकलव्य ने नाराज होकर अपना धनुष बाण उठाया और अपना निशाना उस कुत्ते पर लगाया ,जो भौंके जा रहा था। उन्होंने उस कुत्ते को धनुष- बाण से आहत करने के बजाय बीच का रास्ता निकाला।

एकलव्य ने कुत्ते का मुँह बंद करने के लिए अद्भुत धनुर्विद्या का प्रयोग किया 

एकलव्य ने अपने धनुष से बाण इस तरह छोड़े की उसके छोड़े बाण वह उस कुत्ते के मुंह में भरते चले गए। उसका मुंह पूरी तरह बाणों से भर गया था। उस कुत्ते का मुंह बाणों से भर जाने के कारण वह अब भौंकने लायक नहीं रह गया था । अब उस कुत्ते ने एकलव्य के सामने से भागने में ही अपनी भलाई समझी।

कुत्ता वापस द्रोणाचार्य और पांडव राजकुमारों के पास आ गया था। द्रोणाचार्य और पांडव राजकुमारों ने जब कुत्ते की यह दशा देखी तो आश्चर्यचकित रह गए। उस कुत्ते का मुंह बाणों से भरा हुआ था। गुरु द्रोणाचार्यको यह समझ नहीं आ रहा था की धनुर्धर अर्जुन तो उनके साथ ही शिकार पर गये थे, फिर ऐसा कौन सा दूसरा अर्जुन से बड़ा धनुर्धर है, जिसने इस कुत्ते के मुंह में बाणों को चलाया।

कुत्ते के मुंह में चलाये जाने वाले बाणों का निशाना इतना सटीक था कि वे सारे बाण, कुत्ते के मुंह के अंदर जा घुसे। गुरू द्रोणाचार्य के मन में प्रश्न उठा कि कुत्ते को बिना कोई चोट पहुंचाएं उसके मुंह को बाणों से भरने वाला अर्जुन से बड़ा यह धनुर्धर कौन हो सकता है? यह प्रश्न गुरु द्रोणाचार्य के मन में लगातार घूम रहा था।

अब द्रोणाचार्य को अपने मस्तिष्क में उठ रहे सवालों का उत्तर जानने के लिए एक ही रास्ता था। वह कुत्ता ही उस महान धनुर्धर तक पहुंचा सकता था। उस कुत्ते को बाणों से मुक्त करने के बाद गुरू द्रोणाचार्य ने कुत्ते को उस ओर चलने का संकेत किया, जिस व्यक्ति ने उसके मुंह में बाणों की बौछार की थी।

वह कुत्ता गुरू द्रोणाचार्य का संकेत पाते ही उस ओर चलने लगा जिस जगह उसके मुँह में बाण लगे थे। गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन से भी बड़े धनुर्धर की तलाश में स्वयं उस कुत्ते के साथ साथ चल रहे थे। वह कुत्ता चलते-चलते राजा हिरण्य धनु के राज्य ऋंगवेरपुर पहुँच गया और राजमहल के सामने पहुँचकर भौंकने लगा।

एकलव्य से द्रोणाचार्य के मिलने पर उन्होंने उनका स्वागत सत्कार किया 

द्रोणाचार्य को इस बात का आभास हो गया कि इस राज भवन में ही ऐसा कोई व्यक्ति रहता है जिसने इस कुत्ते के मुंह को बाणों से भरा था। एकलव्य उस समय अपने राजमहल में अंदर थे। जब उन्हें द्वारपालों से गुरू द्रोणाचार्य के आने का समाचार मिला तो वह दौड़े-दौड़े राज भवन के बाहर आये। उन्होंने जब अपने द्वार पर गुरू द्रोणाचार्य को देखा तो भावुक हो उठे, क्योंकि आज उनके परम गुरू स्वयं चलकर उनके घर आये थे।

एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। एकलव्य ने देखा कि गुरू द्रोणाचार्य के साथ वही कुत्ता था जो कल प्रार्थना के राजमहल में भौंक रहा था और जिसके मुँह को एकलव्य ने बाणों से भर दिया था। फिर एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य से पूछा कि क्या यह कुत्ता आपके साथ आया है। एकलव्य के इस प्रश्न पर गुरू द्रोणाचार्य ने उनसे कहा कि तुमने ठीक अनुमान लगाया है। यह कुत्ता आखेट में हमारे साथ ही आया है।

तब एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य को बीते हुये कल का सारा किस्सा सुनाया। कि किस तरह वह कुत्ता उनके राज महल में घुस आया और जोर-जोर से भौंकने लगा। तब उन्होंने ही इस कुत्ते की कर्कश आवाज को बंद करने के लिए उसके मुँह में बाणों की बौछार कर दी थी। उस समय गुरू द्रोणाचार्य को स्मरण हुआ कि यह वही एकलव्य है जो उनके पास धनुष विद्या की शिक्षा लेने आया था। लेकिन उन्होंने मना कर दिया था।

फिर गुरू द्रोणाचार्य के मन में प्रश्न उठा कि लेकिन मेरे द्वारा धनुष चलाने की शिक्षा न देने के बाद भी एकलव्य धनुष विद्या में अर्जुन से भी अधिक पारंगत हो गये । फिर गुरू द्रोणाचार्य ने सोंचा कि मेरे शिक्षा देने से मना करने बाद संभवतः एकलव्य को मुझसे बड़ा गुरू मिल गया होगा, जिन्होंने एकलव्य को धनुष चलाने की इतनी उत्कृष्ट शिक्षा दी, जिससे की वह इस विद्या में अर्जुन के भी आगे निकल गये।

गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य से जिज्ञासा वश पूछा कि तुमने यह धनुष चलाने की शिक्षा किससे ली? तब एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य को बताया कि गुरू जी आपकी ही प्रेरणा से मैंने धनुष बाण चलाना सीखा है। गुरू द्रोणाचार्य समझ नहीं पाये कि एकलव्य क्या कह रहा है? उन्होंने एकलव्य से फिर पूछा कि मैंने तो तुम्हें धनुष कला सिखाने से मना कर दिया था तब तुमने मुझसे कैसे सीख लिया?

द्रोणाचार्य द्वारा स्वार्थ में अँधा हो कर एकलव्य के दाहिने हाँथ का अंगूठा, उनसे दक्षिणा में माँग लेना 

तब एकलव्य गुरू द्रोणाचार्य कों उस स्थान पर ले गये जिस स्थान पर एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य की विशाल मूर्ति स्वयं अपने हाथों से बनायी थी। गुरू द्रोणाचार्य उस मूर्ति को देखकर बहुत आश्चर्य चकित रह गये। वे मन ही मन एकलव्य की भूरी -भूरी प्रशंसा करने लगे। क्योंकि एकलव्य की सच्ची लगन ने ही उसे अर्जुन से भी बड़ा धनुर्धर बना दिया।

लेकिन दूसरे ही पल उन्हें याद आया कि उन्होंने अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का संकल्प लिया था। लेकिन संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर तो एकलव्य बन गया था। तब गुरू द्रोणाचार्य ने दक्षिणा में एकलव्य से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा माँग लिया। ताकि वह धनुष चलाने की विद्या से वंचित रह जाये। एकलव्य ने निःसंकोच गुरू द्रोणाचार्य को अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काट कर दे दिया।

लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती है। कहानी अभी बाकी है। अंगूठा कट जाने के बाद भी कोई एकलव्य की धनुष चलाने की धुन को कोई रोक न सका। उन्होंने बिना अंगूठे के धनुष बाण चलाने की उस विद्या का विकास कर लिया,जो विश्व में कहीं नहीं थी।

दरअसल एकलव्य द्वारा गुरू द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा दक्षिणा में देने के बाद उन्होंने अपनी तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग करके धनुष बाण चलाने का अभ्यास करने लगे। धनुष चलाने की यह विद्या बिल्कुल नयी थी। जो विकसित होती चली गयी। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज धनुष-बाण चलाने की कला वही प्रचलित है जो एकलव्य ने अपना अंगूठा कट जाने के बाद विकसित की। अर्जुन की तरह धनुष चलाने की कला आगे नहीं बढ़ सकी।