आतिवाहिक देह का रहस्य


%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9मृत्यु के बाद जब जीवात्मा इस भौतिक शरीर को छोड़ता है तो वह “आतिवाहिक देह” ग्रहण करता है | इस आतिवाहिक देह से ही वह आगे की यात्रा करता है फिर यथा समय भोग देह प्राप्त करता है | हमारे देश में यह प्रसिद्ध है कि जब प्रेत-शरीर को भोजन और जल अर्पण किया जाता है तो कहा जाता है—

आकाशस्थो निरालम्बो वायुभूतो निराश्रयः | इदं नीरमिदं क्षीरं स्नात्वा पीत्वा सुखी भव ||

इस श्लोक के अनुसार ये आतिवाहिक देह वायव्य देह होती है | इन स्थूल इन्द्रियों से उसे देखा सुना और समझा नहीं जा सकता | हांलाकि शास्त्रों में एक मत के अनुसार ये वायवीय देह होती है लेकिन एक, दूसरे मत के अनुसार इसमें अग्नि, वायु और आकाश तीनो तत्व रहते हैं | लेकिन उस आतिवाहिक देह में पृथ्वी और जल तत्व का अंश नहीं रहता |

मनुष्य की मृत्यु हो जाने के बाद उसे तुरंत आतिवाहिक देह ग्रहण करनी पड़ती है, या इसे इस तरह से कहे कि मृत्यु होने पर वह, आतिवाहिक देह ग्रहण करने के साथ ही भौतिक शरीर छोड़ता है, तो ज्यादे उचित होगा | स्थूल शरीर (भौतिक शरीर) पांच तत्वों से मिल कर बना होता है | जीवन जीते समय ये पाँचों तत्व एक दूसरे से पूरी तरह मिले हुए होते हैं लेकिन वर्तमान जन्म के लिए प्रारब्ध-कर्म के समाप्त होते ही ये मिश्रण या इनका आपस में बंधन, छिन्न-भिन्न हो जाता है |

स्वर्ग तब उस समय इन पांच तत्वों में से दो तत्व- पृथ्वी और जल, जो की गुरुत्व (Gravitation) से संपन्न होते है, शरीर के पार्थिव अंशो के साथ नीचे गिर पड़ते हैं और अग्नि, वायु और आकाश ऊपर उठते हैं | यह देह जिसमे केवल अग्नि, वायु और आकाश रहते तो हैं, लेकिन उनमे परस्पर घना संश्लेषण (Dense Forces of Attraction) नहीं रहता, आतिवाहिक देह कहलाता है |

ये आतिवाहिक देह, मृत्यु के बाद केवल मनुष्य को ही मिलती है, पशु-पक्षी को नहीं | यहाँ पर ये नहीं भूलना चाहिए कि ये आतिवाहिक देह, भोग देह नहीं होती | कहीं-कहीं इस आतिवाहिक देह को ही लोग प्रेत शरीर समझ लेते हैं जबकि ऐसा नहीं होता | मृत्यु के बाद जब पिंडदान किया जाता है तो धीरे-धीरे दान किये गए उस पिंड के अणु-परमाणुओं के द्वारा उस आतिवाहिक देह के लिए भोग देह का निर्माण होता है | दाह्काल में जो पिंडदान किया जाता है और दस दिनों तक जो पिंड दिया जाता है उसके फलस्वरूप क्रमशः भोग शरीर का निर्माण होता है |

एक बार भोग देह का निर्माण हो जाने पर, उस जीवात्मा के पाप-पुण्य के अनुसार यदि, पुण्य की अधिकता एक सीमा (Threshold Value) से अधिक  होती है तो उसे ‘दिव्य देह’ की प्राप्ति होती है और उच्च लोकों यानि देवलोक आदि में गति होती है और यदि पाप की अधिकता एक सीमा (Threshold Value) से अधिक होती है तो ‘यातना-देह’ की प्राप्ति होती है और नीचे के लोकों यानी नर्क इत्यादि की तरफ़ गमन होता है | उस सीमा (Threshold Value) से कम पाप-पुण्य होने पर वह वापस पुनः इसी मृत्यु लोक में आता है |

जब हम बात करते हैं स्वर्ग कि तो वहां असंख्य देवलोक विद्यमान हैं (समय और स्थान के भेद से) इसी प्रकार से नर्कों की संख्या और प्रकार भी असंख्य हैं | वास्तव में इन सारे लोकों में भोग शरीर के साथ ही प्रवेश होता है | स्वर्ग प्रकाशमय है वहाँ एक स्तर तक एक ज्योति का प्रकाश हमेशा बना रहता है | इसी प्रकार से नर्क अन्धकारमय है वहाँ एक स्तर तक अन्धकार हमेशा बना रहता है |

krishna_and_sagesदेह या देह की स्थिति कोई भी हो, वो वज्र के सामान दृढ़ हो या उसकी असाधारण आयु हो, युगान्त में, महायुग के अंत में, कल्प के अंत में या महाकल्प के अंत में, उसका पतन होगा ही होगा अर्थात उसका पतन अवश्यम्भावी है | इस प्रकार से हम देख सकते हैं की हिन्दू धर्म में आत्मा (जो कि अनंत और अविनाशी है) की जीवन-यात्राओं और विभिन्न ब्रह्माण्डों एवं लोकों में उसके क्रिया-कलापों के सिद्धांतों को परिभाषित किया गया |

हिन्दू धर्म के, मृत्यु-उपरान्त जीवात्मा के शरीर का निर्माण, विभिन्न लोकों में गमन, आदि के सिद्धांतों से प्रेरित है प्राचीन मिस्र की सभ्यता के कर्मकाण्ड और सिद्धांत | दुर्भाग्य से प्राचीन मिस्र की सभ्यता के खँडहर ही बचे हैं अपनी कहानी कहने को | इसी तरह से माया सभ्यता के भी कर्मकांड और सिद्धांत हिन्दू धर्म से प्रेरित हैं | इन सभ्यताओं के वंशज आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन समय के अन्तराल में खोई इन सभ्यताओं से जब भी कोई रौशनी की किरण फूटेगी, लोगों की आँखे चकाचौंध होंगी |

धन्य है वे प्राचीन ऋषि-मनीषी जिन्होंने सैकड़ों-सहस्त्रों वर्षों तक तप किया और प्रकृति और ब्रह्म द्वारा रचे गए इस सृष्टि के रहस्यों को न केवल समझा बल्कि उसे लिपिबद्ध भी किया और हमारे लिए छोड़ गए | यहाँ पर तप का अर्थ केवल समाधि अवस्था में बैठ कर ध्यान लगाने से ही नहीं लेना चाहिए बल्कि तप का अर्थ यहाँ अनुसन्धान से है | ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, पुलत्स्य, अगत्स्य आदि के त्यागपूर्ण जीवन को दुनिया कभी नहीं भूल सकती और उनके द्वारा लिपिबद्ध किये गए ज्ञान की मानवता हमेश ऋणी रहेगी |





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