भाग-२ (क्या लोहे को सोने में बदलना संभव है ?)


ब्रह्माण्ड और प्रति-ब्रह्माण्ड

Shri_Surya_Bhagvan“तुम लोगों ने शास्त्रों में जिन विद्याओं के नाम मात्र सुने हैं, वे तथा उनके अतिरिक्त और भी न मालूम कितनी और हैं ?” इसी प्रकार बातें होते-होते शाम हो चली थी | पास में ही घड़ी रखी थी, महापुरुष ने देखा अब समय नहीं है, वे तुरंत उठ खड़े हुए और अपने गृह में प्रवेश कर गये | हम सब लोग भी अपने-अपने स्थानों को लौट आये |

इसके बाद मै अक्सर ही उनके पास चला जाता और सत्संग करता और इस प्रकार से क्रमशः अन्तरंगता बढ़ती गयी | मै वहां कई तरह की अलौकिक बातें प्रत्यक्ष होते देखने लगा | कितनी देखी, उनकी संख्या बताना कठिन है | दूर से, नज़दीक से, स्थूल रूप से, सूक्ष्म रूप से, भौतिक जगत में, दिव्य जगत में-यहाँ तक की आत्मिक जगत में भी-मै उनकी असंख्य प्रकार की लोकोत्तर शक्ति के खेल को देख-देख कर स्तंभित होने लगा |

केवल. मैंने स्वयं जो कुछ देखा और अनुभव किया, उसी को लिख दिया जाय तो एक महाभारत जैसा ग्रन्थ बन सकता है लेकिन यहाँ उन सब का वर्णन नहीं किया जा सकता | मै यहाँ निरपेक्ष रूप से, यथासंभव, स्वामी जी द्वारा बताये गए सूर्य-विज्ञान के सम्बन्ध में कुछ बातें ही लिखूंगा | हाँलाकि काल के प्रभाव से हम सौर विज्ञान या सावित्री विद्या को भूल गए फिर भी ये सत्य है कि प्राचीन काल में यही विद्या ब्राह्मण-धर्म की और वैदिक साधना की भित्तिस्वरूप थी |

सूर्य-मंडल (यहाँ कृपया इसे आज का सौर-मंडल न समझे) तक ही संसार है, सूर्य-मंडल का भेद करने पर ही मुक्ति मिल सकती है- यह बात प्राचीन काल के ऋषि-मुनि जानते थे | वास्तव में सूर्यमंडल तक ही वेद या शब्द ब्रह्म है- उसके बाद सत्य या परब्रह्म है |

शब्द ब्रह्म में निष्णात (यानि शब्द ब्रह्म का विशेषज्ञ) ही परब्रह्म को पा सकता है | वो लोग जानते थे कि बिना शब्द ब्रह्म का अतिक्रमण किये या सूर्यमंडल को लांघे सत्य में नहीं पहुंचा जा सकता | श्रीमद्भागवत में इसको इस तरह से लिखा है-

य एष संसारतरू: पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते || द्वे अस्य बीजे शत्मूलास्त्रिनाल: पन्च्स्कंधः पंचरसप्रसूतिः |

अर्थात- ‘ये वृक्ष रुपी संसार कर्मात्मक है जिसके दो बीज (पुरुष और प्रकृति) सौ मूल, तीन नाल, पांच स्कंध, पांच रस, ग्यारह शाखाएँ हैं | इसके तीन वल्कल और दो फल हैं | ये संसार-वृक्ष सूर्य-मंडल तक व्याप्त है’ | शौनक जी ने, वृहद्देवता में काफ़ी जोर दे कर कहा है कि-एकमात्र सूर्य से ही भूत-भविष्य-वर्तमान के समस्त स्थावर और जंगम (All kinds of Matter of this World) पदार्थ पैदा होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं |

sunयह अक्षर, अव्यय और शाश्वत ब्रह्म है | ये तीन भागों में विभक्त (Divide) हो कर तीनों लोकों में वर्तमान हैं, समस्त देवता इनकी रश्मि में ही समाहित हैं | वेदों में कहा गया है कि प्रणव या ॐकार या ‘उद्गीथ’ (ये तीनो एक ही हैं) ही सूर्य हैं- ये नादब्रह्म हैं, निरंतर ‘रव’ (ध्वनि सम्बंधित) करते हैं, इसीलिए इनको ‘रवि’ कहा जाता है |

छान्दोग्य उपनिषद  में एक महत्वपूर्ण घटना का ज़िक्र आता है | उसमे पहले बताया गया है कि ‘त्रयी विद्या’ या छंद रुपी तीनो वेदों ने इस प्रणव या सूर्य को आच्छादित कर (ढक) रखा है | इसके बाहर मृत्यु राज्य है | एक बार मृत्यु के भय से डर कर, देवताओं ने सबसे पहले वेद की शरण ग्रहण की और छंदों द्वारा अपने को आच्छादित किया और मृत्यु से अपनी रक्षा की | अब वो मृत्यु यानि कालराज्य की सीमा से बाहर आ गए थे | लेकिन मृत्यु ने उनको देख लिया था |

जिस प्रकार साफ़ पानी के अन्दर मछली स्पष्ट दिखाई पड़ती है उसी प्रकार मालूम पड़ता है कि ये वेदत्रयी विद्याएँ भी जल के सामान पारदर्शी हैं | मधुविद्या में भी वेद को ‘आपः’ या जल कहा गया है | फिर देवताओं ने उसी समय वेद से निकल कर नाद का आश्रय लिया | इसी से वेद-अंत में नाद का आश्रय लिया जाता है |

तत्ववेत्ता गोपीनाथ कविराज जी ने इस घटना का ज़िक्र सूर्य-विज्ञान के सिद्धांतों के सन्दर्भ में किया है लेकिन ये घटना महत्वपूर्ण होने के साथ ही दिलचस्प भी है लेकिन इसके हर पहलू के वैज्ञानिक विवेचन की आवश्यकता है-तभी इसमें से कुछ सार निकल के आएगा | दुर्भाग्य से अभी हम सब इसमें सक्षम नहीं हैं | इसके बाद (छान्दोग्य-उपनिषद में) कहा गया है कि हमेशा (अनाहत) नाद करने वाले इन प्रणव या सूर्य की दो अवस्थाएं (State) हैं |

एंटी यूनिवर्सएक अवस्था में इनकी रश्मियाँ (All kinds of Waves) चारो ओर विकीर्ण (फैली) हुई हैं और वही दूसरी अवस्था में समस्त रश्मियाँ संह्रित (Concentrate) होकर मध्यबिंदु में विलीन हुई हैं | ये कहना यहाँ उचित होगा की आज से हज़ारो वर्ष पहले लिखे गए छान्दोग्य-उपनिषद में छिपे ज्ञान की आहट आज का आधुनिक विज्ञान भी पा रहा है क्योकि आज के आधुनिक ब्रह्माण्ड वैज्ञानिकों का एक धड़ा ये मानता है कि इस ब्रह्माण्ड (Universe), जिसमे हम रहते हैं, का एक प्रति-ब्रह्माण्ड (Anti-Universe) भी है जिसका विस्तार या फैलाव नहीं बल्कि संकुचन हो रहा है |

उनका मानना है कि हमारे ब्रह्माण्ड का लगातार विस्तार हो रहा है और अगर कहीं हमारे ब्रह्माण्ड का प्रति ब्रह्माण्ड है तो उसका संकुचन हो रहा होगा | वैज्ञानिको की ये परिकल्पना अभी प्रारंभिक स्तर पर है, वजह ये है कि इसके अभी तक प्रमाण नहीं मिले है | छान्दोग्य-उपनिषद जैसे न जाने कितने ऐसे ग्रन्थ हैं जिनके रचयिताओं ने उन्हें अपने वंशजों के लिए (बल्कि पूरी मानव जाति के लिए) इसलिए लिखा कि एक दिन वे भी इस सृष्टि के रहस्य को जानेंगे, समझेंगे और मानवता के कल्याणार्थ इसके रहस्यों को उजागर करेंगे |

ऋषि कौषीतक प्राचीन काल में इसी सूर्य-विज्ञान के उपासक थे | उनका कहना है कि प्रणव-सूर्य की प्रथम अवस्था वास्तव में स्रुष्ट्युन्मुख (सृष्टि रचने की और उन्मुख) अवस्था है | दूसरी अवस्था अवसान की अवस्था है…

…….क्रमशः





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