प्राचीन भारत के ग्रन्थों में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एवं ब्रह्माण्ड के रहस्य


आधुनिक विश्व के मनीषी जितना ब्रह्माण्ड सम्बन्धी खोजों में तत्परता से लगे हुए हैं, उतना शायद अन्य खोजों में नहीं | कारण स्वयं (मनुष्य जाति) के अस्तित्व से सम्बंधित है | मनुष्य सदा से अपनी उत्पत्ति सम्बन्धी खोजों के लिए प्रयत्नशील रहा है | उसके ये प्रयास उसको इस ब्रह्माण्ड के सृजन के पल के निकट ले जाते हैं जहाँ पहुँच कर वो विस्मृत हुआ जा रहा है |

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एवं ब्रह्माण्ड के रहस्यों के अन्वेषण में जितना सार्थक कार्य प्राचीन भारतीय मनीषा ने किया है उतना अन्यत्र किसी सभ्यता या संस्कृति में नहीं मिलता | प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों ने न केवल शोध कार्य किये बल्कि उनको ग्रंथों में लिपिबद्ध भी किया |

विडम्बना ये है कि आधुनिक समय के कुछ तथाकथित ‘बुद्धिपिशाचों’ ने उन ग्रंथों को विशुद्ध रूप से धर्म-ग्रन्थ बताकर उन्हें कपोल-कल्पित सिद्ध करने का कुत्सित प्रयास किया और इससे पहले की सरकारों ने उन्हें हर तरह का समर्थन भी दिया | अपनी सीमित दृष्टी के कारण, यद्यपि ये वामपंथी बुद्धिपिशाच ये देखने में असमर्थ हैं कि समय करवट ले रहा है और युगपरिवर्तन की धमक, धीमी ही सही, लेकिन सुनाई पड़ने लगी है |

आइन्स्टीन के समय (Time) तथा स्थान (Space) के सातत्य (Continuity) के सिद्धांतों ने वैज्ञानिकों के सामने सोचने के नए आयाम रखे जिसके फलस्वरूप विश्व में ऐसे विद्वानों का अभ्युदय हुआ जो ये मानने लगे कि अतीत में भी इस धरती पर परग्रही और बुद्धिमान प्राणी, धरती वासियों के सहायता के लिए, आते रहें हैं जिन्हें शायद हमारे पूर्वज देवता या भगवान मानते थे |

लेकिन ये परग्रही बुद्धिमान प्राणी आखिर ब्रह्माण्ड के किस कोने से हमारे ग्रह में आते थे या कहीं ऐसा तो नहीं कि ये किसी और ब्रह्माण्ड के प्राणी थे | देखा जाय तो आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिया गया बिग बैंग थ्योरी (Big Bang Theory) का सिद्धांत अपूर्ण है, अभी इसमें महत्वपूर्ण संशोधन होने बचे हैं लेकिन फिर भी इसने प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथों में आये रहस्यमय शब्द ‘महत्तत्व’ को फिर से जीवित किया है |

बिग बैंग थ्योरी हमें बताती है कि सबसे पहले जब कुछ नहीं था तब केवल एक चीज थी ‘The Great Grand Matter’ इस द्रव्य का घनत्व (Density) 1095 Kg/Cm3 था | इसी महान द्रव्य में एक अज्ञात रहस्यमय कारण से भयंकर विस्फोट होता है और उसका समय तथा स्थान में विस्तार आरम्भ हो जाता है |

सबसे पहले उससे गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) अलग होता है, ये प्रक्रिया पूरी होती है 10-43 सेकंड में | फिर उससे सबल नाभिकीय बल (Strong Nuclear Force) अलग होता है और ये प्रक्रिया पूरी होती है 10-35 सेकंड में | सबल नाभिकीय बल, किसी परमाणु की नाभिक में स्थित न्यूट्रॉन और प्रोटोन के बीच लगने वाला बल होता है |

इसके बाद इससे विदुत-चुम्बकीय बल (Electro-Magnetic Force) अलग होता है और इसका समय होता है 10-23 सेकंड | और इसके बाद इससे अलग होता है दुर्बल नाभिकीय बल (Weak Nuclear Force) जिसका अंतराल होता है 10-14 सेकंड | दुर्बल नाभिकीय बल किसी परमाणु में स्थित इलेक्ट्रान और उसकी नाभिक में स्थित प्रोटोन के बीच लगने वाला बल होता है |

इस प्रकार से सभी बलों के अलग हो जाने के बाद कुछ काल में परमाणुओं का निर्माण प्रारंभ हो जाता है और फिर आकाशगंगा, ग्रह तथा तारों का निर्माण भी | लेकिन ये सिद्धांत अपूर्ण है | इसका मूल प्रश्न ही अनुत्तरित है कि उस महान द्रव्य में विस्फोट किस ‘कारण’ से होता है | साथ ही ये ब्रह्माण्ड में स्थित विभिन्न आयामीय मंडलों (Dimensional Planes) के अस्तित्व की भी समुचित व्याख्या नहीं करता |

लेकिन वैज्ञानिक उस The Great Grand Matter से होते हुए प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित ‘महत्तत्व’ तक पहुँच गए हैं और उस पर शोधकार्य जारी है | भारतीय मनीषियों का दृष्टिकोण अलग था | वो आशावादी था | उन्होंने किसी प्रश्न को अनुत्तरित नहीं छोड़ा वो हर रहस्य के तह तक गए और उन्होंने ‘अन्तिम सत्य’ (Ultimate Truth) को प्राप्त किया |

आज आवश्यकता है तो उनके द्वारा किये गए खोज कार्यों पर दोबारा शोध करने की | आज जिस ब्रह्माण्ड में हम लोग रहते हैं- “यह प्रकृत से उत्पन्न रमणीय ब्रह्माण्ड चौदह लोकों में व्याप्त है |

ब्रह्माण्ड के उपरी हिस्से (Upper Half) में सात लोक जिनके नाम हैं-भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक, ब्रह्मलोक, सत्यलोक तथा ब्रह्माण्ड के निचले हिस्से (Lower Half) में सात लोक जिनके नाम हैं अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल | मध्य में हमारा लोक यानि भूलोक है |

समस्त भूमंडल, सप्त महाद्वीपों सप्त महासागरों तथा चार प्रकार के प्राणियों (स्वेदज, अंडज, जरायुज तथा उद्भिज) से युक्त है | इस प्रकार से हम समझ सकते हैं कि हमारी पृथ्वी के अलावा इस ब्रह्माण्ड में चौदह अलग-अलग आयामीय मंडल (Dimensional Plane) हैं | ऐसा कहा गया है कि जिस प्रकार से वस्त्र की परतें होती हैं उसी प्रकार से ये ब्रह्माण्ड दस उत्तरोत्तर विशाल आवरणों से घिरा हुआ है |

ये दस विशाल आवरण वास्तव में इस ब्रह्माण्ड का दस आयामों (Dimensions) में विस्तार है | ब्रह्मा जी ने प्रकृति की सहायता से इस ब्रह्माण्ड को ग्यारह आयामों (Dimensions)  में रचा है | ग्यारहवें आयाम, जिसमे स्वयं ब्रह्मा जी स्थित हैं, में बाकी दसो आयाम का विस्तार है | यहाँ आयामों (Dimensions) को आयामीय मंडल (Dimensional Plane) नहीं समझना चाहिए |

आयामीय मंडल (Dimensional Plane) को एक पृथक लोक समझ सकते हैं आप जो बाकी लोकों से भिन्न होगा जबकि ब्रह्माण्ड का प्रत्येक आयाम (Dimensions) अपने से नीचे वाले आयाम (Dimensions) की तुलना में, समय तथा स्थान में अधिक विस्तार लिए हुए होगा | विचित्र बात ये है कि ब्रह्माण्ड के एक ही आयाम (ग्यारहवें आयाम) में बाकी दसों आयामों का विस्तार हुआ है |

मृत्यु के बाद, चेतना का जितना विस्तार हुआ होता है, उसी अनुसार उसकी आयामों में गति होती है | पुराणों में आया है है कि ये प्राकृत ब्रह्माण्ड साठ करोड़ योजन ऊंचा और पचास करोड़ योजन विस्तार वाला है (पूरी तरह गोल नहीं है ये ब्रह्माण्ड) | यह अंड अपने इर्द-गिर्द तथा ऊपर-निचे रखे हुए कड़ाहे के समान कठोर भाग से उसी तरह से सब ओर घिरा हुआ है जैसे अनाज का बीज कड़ी भूसी से घिरा रहता है |

इस ब्रह्माण्ड में भूमंडल जिसमे पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक भी आ जाते हैं, का घेरा एक करोड़ योजन का है | इनके ऊपर महर्लोक का परिमाण भी एक करोड़ योजन का है | उसके ऊपर दो करोड़ योजन परिमाण का जनलोक है | उसके ऊपर चार करोड़ योजन परिमाण का तपोलोक है | और उसके ऊपर आठ करोड़ योजन का सत्यलोक है | उसके बाहर सप्तावरण नामक बाहरी घेरा है (‘उपासनात्रयसिद्धांत’ नामक ग्रन्थ में उद्धृत सदाशिव संहिता से) |

यद्यपि ग्रंथों में वर्णित ‘योजन’ का, आज के समय में प्रचलित ईकाई से (जैसे किलोमीटर में) कितना मान बैठेगा इसका आकलन कुछ विद्वानों ने अपने लेखों में किया है लेकिन उनमे अंतर होने से वे संदेहास्पद हैं अतः उनका ज़िक्र यहाँ नहीं किया गया है | प्रकृत द्वारा रचित पंचतत्वों का भी अपना सीमा क्षेत्र है | इनका विस्तार ब्रह्माण्ड से भी परे है |

इनका विस्तार इस प्रकार है | पृथ्वी तत्व का विस्तार एक करोड़ योजन का है | जल तत्व का घेरा दस करोड़ योजन तक कहा गया है | अग्नि का घेरा सौ करोड़ (एक अरब) योजन परिमाण का है | वायु का घेरा एक हज़ार करोड़ (दस अरब) योजन परिमाण का है तथा आकाश का आवरण दस हज़ार करोड़ (एक खरब) योजन का है |

इन सबके परे ‘अहंकार’ का आवरण एक लाख करोड़ (दस खरब) योजन का है और प्रकृति का आवरण असंख्य योजन का है | प्रकृति के अंतर्गत समस्त लोक काल रूप अग्नि के द्वारा (प्रलयकाल में) जला दिए जाते हैं | लेकिन ये ब्रह्माण्ड अविद्यारूपी घने अन्धकार से व्याप्त है, इसके ऊपरी भाग में ‘विरजा’ नाम की एक अत्यंत रहस्यमय नदी बहती है जिसकी सीमा के बारे में कही किसी पुराण या ग्रन्थ में ज़िक्र नहीं है |

वह विश्व-ब्रह्माण्ड के उस पार उसका आवरण बनी हुई स्थित है | यह विरजा नदी, प्रकृति तथा पर्व्योम (सच्चिदानन्द स्वरुप परमेश्वर का नित्य धाम) के बीच में विद्यमान है | उस नदी के आगे हिरण्यगर्भ अपने साकार रूप में साक्षात् विराजमान हैं | वो नित्य धाम प्रकृति के परे, सदा रहने वाला, अपने ही प्रकाश से प्रकाशित, माया रुपी मल से रहित, काल तथा प्रलय के प्रभाव से मुक्त होता है |

उसे न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और ना ही अग्नि, जहाँ पहुँचने पर चेतना अपने उस परम विस्तार को प्राप्त होती है जहाँ से (कर्म बंधन में फंस कर) वापस लौट के आना संभव नहीं | लेकिन भारतीय मनीषी, केवल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, उसकी रचना, उसकी आयु सम्बन्धी रहस्यों को जानकर ही संतुष्ट नहीं हो गए, बल्कि वो उससे आगे भी गए |

उन्होंने देखा की जिस ब्रह्माण्ड को हम इतना विशाल और जटिल समझ रहे थे वैसे एक, दो नहीं बल्कि असंख्य ब्रह्माण्ड है और सब एक से बढ़कर एक है | उन सबको इसी प्रकृति ने रचा है | उन्होंने उन ब्रह्मांडों के ब्रह्मा को भी देखा जिनकी गिनती करना उनके लिए संभव नहीं था | धन्य है वे मनीषी जिन्होंने अंतिम सत्य को जानने की उत्कट अभिलाषा में उसके बाद भी शोधकार्य जारी रखा और पाया की प्रकृति भी अंत नहीं है |

हमारी प्रकृति जैसी अनंत प्रकृतियाँ हैं | प्रत्येक प्रकृति अपने ‘प्रक्रत्यंड’ में असंख्य ब्रह्मांडों की रचना किये हुए है | ब्रह्मांडों की ही तरह प्रक्रत्यंड भी असंख्य हैं | इन सारे प्रक्रत्यंडों को मिला कर बनता है ‘मायांड’ |

मायांड का विनाश मतलब प्रलय का भी अंत | मायांड के विनाश के बाद अशुद्ध माया नहीं बचती | मायांड की अधीश्वरी ही सर्वेश्वरी हैं | समस्त प्रकार की शुद्ध और अशुद्ध माया की साक्षात् स्वरूपा हैं वो ‘महामाया’ | प्राचीन भारतीय मनीषियों ने देखा की महामाया ही सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर की प्रेयसी हैं और उनके द्वारा रची गयी सृष्टियों की तुलना में हम इतने लघु होते हुए भी साक्षात् उनके ही स्वरुप हैं |

इस अंतिम सत्य का भान होते ही उनका मन उस नित्य और अविनाशी आनंद से भर गया जिसको सिर्फ वही जान सकता है जिसने उसको अनुभव किया हो |

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