क्या पुनर्जन्म में योनिपरिवर्तन संभव है ?


Punarjanma-Rahasyamayaये प्रश्न बड़ा ही गूढ़ है, लेकिन इसका निश्चित उत्तर (Ultimate Answer) हाँ है | किसी भी तकनीकि विस्तार में जाने की बजाय सीधे घटना पर चलते हैं | प्रस्तुत घटना हिंदी समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान’ के दिल्ली के संस्करण में छपी थी, तारीख थी 8 फ़रवरी 1966. रोहतक, हरियाणा का गोल पर्वांपुर गाँव, यहाँ की चंचल कुमारी ने अपने पिछले जन्म की घटनाओं को बताकर अपने माता-पिता और आस-पड़ोस की जनता को स्तब्ध कर रखा था |

चंचल कुमारी की उम्र, उस समय नौ वर्ष थी | उस दिन हुआ यूँ कि, चंचल की माँ अपने पड़ोस में किसी के घर कथा सुनने गयी हुई थी | जब वह कथा सुनकर वापस घर आयी तो घर की कुछ समस्याओं को लेकर उनके मन में कुछ चिंता थी | उसी समय चंचल ने उससे पूछा “माँ ! क्या सुन कर आयी हो” ? माँ ने उत्तर दिया “पता नहीं….मुझे कुछ याद नहीं” |

बिटिया बोली “क्या माँ…तुझे अभी की सुनी कथा याद नहीं…..मुझे देख, मुझे अपनी पिछली जन्म की कथा याद है” | माँ ने हँस के कहा “अच्छा बता तो…क्या थी तू पिछले जनम में” ? चंचल को पता था कि उसकी माँ, उसकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रही थी लेकिन फिर भी उसने, जितना उसको याद था, विस्तार से बताया |

चंचल कुमारी ने अपने पिछले जन्म का वृत्तान्त सुनाते हुए कहा कि “पिछले जन्म में, मै पानीपत के एक स्कूल में टीचर थी | मेरा नाम कृष्णलाल था | मेरे पिता का नाम रामप्यारा नागपाल था | मै पच्चीस साल का था, जब एक दिन मेरे पेट में भयंकर दर्द हुआ | मेरी हालत ख़राब होती गयी और उसी दिन मेरी मौत हो गयी |

मेरी सगाई हो चुकी थी लेकिन विवाह नहीं हुआ था | मुझे अपने भाइयों और माता का नाम भी याद है |” शुरू में परिवार वालों ने इसे एक मन-बहलाव की तरह लिया | जैसा की मनुष्य का स्वभाव होता है कि जो चीजें उसके अनुकूल होती हैं, उसे जल्दी समझ आती हैं-जैसे कि कोई कन्या अपने पूर्वजन्म का वृत्तान्त सुनाती है तो ये उम्मीद की जाती है कि वो पूर्वजन्म में भी कोई कन्या या स्त्री ही रही होगी |

ऐसे ही कोई बालक अगर पूर्वजन्म की बात बताता है तो सामान्य बुद्धि यही सोचेगी की पूर्वजन्म में ये कोई बालक या पुरुष रहा होगा | लेकिन यहाँ मामला उल्टा था | हलके में लेने के बावज़ूद परिवार वालों का माथा ठनक चुका था | चंचल ने अपने पुनर्जन्म को लेकर केवल इतना ही नहीं बताया बल्कि एक और स्तब्ध कर देने वाली बात बतायी |

चंचल ने बताया कि “कृष्णलाल ने मरने के बाद फिर एक गाय के रूप में जन्म लिया | यह गाय शाहदरा, जिला लाहौर के एक मुस्लिम परिवार के पास रही | गाय ने मरने के बाद गाँव पर्वांपुर में आपके घर जन्म लिया |” बात आसानी से स्वीकार करने योग्य नहीं थी, लिहाज़ा परिवार वालों ने इसकी पुष्टि करने की सोची |

चंचल कुमारी के मन में भी उत्सुकता थी अपनी बात की सत्यता जांचने की | उसके घर वाले उसको पानीपत लेकर गए | पानीपत में उसने स्कूल की बिल्डिंग को पहचान लिया और अपने पुराने घर को भी उसने देखा | उसका घर जिस मोहल्ले में था, उस मोहल्ले के कुछ पुराने परिवारों ने इस बात की तस्दीक की कोई सात-आठ साल पहले इस गली में एक स्कूल मास्टर की मौत, पेट में दर्द की वजह से हुई थी |

चंचल कुमारी के पिछले जन्म के परिवार के लोग पानीपत छोड़ चुके थे इसलिए उन लोगों की कोई जानकारी नहीं मिल पायी | रह गए केवल कुछ अधूरे और अस्पष्ट से प्रश्न जिनका उत्तर चंचल कुमारी के पास भी नहीं था | भारतीय तत्व ग्रंथों में ईश्वर को पुरुष की संज्ञा दी गयी है और प्रकृति अर्थात महामाया को स्त्री की संज्ञा दी गयी है |

शिव-शक्ति के अर्धनारीश्वर रूप की परिकल्पना भी इसी ज्ञान को बोध कराती है | पुराणों में कहा भी गया है कि शक्ति के बिना शिव, शव हैं | शक्ति से युक्त हो कर ही वह समस्त ब्रह्मांडों के अधीश्वर ‘शिव’ होते हैं | पुरुष और प्रकृति की अभिन्नता का बोध कराती एक दिव्य घटना इस प्रकार है-एक बार महादेव, देवी उमा के साथ कैलाश पर ही विराजमान थे |

उमा ने महेश्वर से कहा “इस बार भू-मंडल पर मै पुरुष रूप में जाती हूँ,..आप मेरी प्रिया बन कर आइयेगा” | महेश्वर उस समय ध्यान में निमग्न थे लेकिन उन्होंने देख लिया था कि देवी उमा किस घटना की बात कर रही थी |

अपनी अर्धोन्मीलित आँखें खोलते हुए महेश्वर मुस्कुराये और कहा “ठीक है” | ज्ञानी बताते है कि देवी उमा, जो की समस्त प्रकार की परा और अपरा माया की अधीश्वरी हैं, कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेती हैं और महेश्वर उनकी चिरसंगिनी राधा जी के रूप में जन्म लेते हैं | कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है लेकिन इस रहस्य को बहुत कम लोग जानते हैं कि कृष्ण के रूप में समस्त ब्रह्मांडों की अधीश्वरी शक्ति ही इस धरती पर उतरी थी |

गीता में कृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है “देखो मै ही सब कुछ हूँ, सब मेरे अन्दर ही समाहित हैं, मुझसे अलग कुछ भी नहीं, प्रकृति भी मेरी ही अध्यक्षता में सब कुछ रचती है” | ‘शक्ति तत्व’ को समझना और आत्मसात करना इस दुनिया के सबसे कठिनतम कार्यों में से एक है, स्वयं परमेश्वर (महादेव) भी निरंतर उसी के ध्यान में निमग्न रहते हैं और उसका चिंतन करते रहते हैं |

शून्य से शिखर तक की यात्रा में ये आवश्यक नहीं की जीवात्मा योनी के बंधन में फंसी रहे, आखिर जब सृष्टि की रचना करने वाले ने स्वयं अपने लिए ये प्रतिबन्ध नहीं रखा तो हम इस बंधन में कैसे हो सकते है ?

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