प्राचीन मिस्र में जन्मी, वो दोबारा लौट कर आयी…


प्राचीन मिस्र की सभ्यता के रहस्यों को समेटने और सहेजने का काम तीव्र गति से हो रहा है, और ये आज से नहीं बल्कि जब से पश्चिमी जगत की निगाह वहां के पिरामिडों और मंदिरों पर गयीं हैं, तब से हो रहा है | अभी भी कुछ रहस्य ऐसे हैं जिनका शोधकर्ताओं के पास कोई जवाब नहीं है | हद तो तब हो जाती है जब, भूत की तरह कोई इन्सान अचानक से सामने आ कर कहता है कि देखो मै ही उस काल में था…

लन्दन, 16 मार्च 1904, यहाँ के एक धनी मानी परिवार में एक लड़की ने जन्म लिया, नाम था उसका डोरोथी लुइस एडी (Dorothy Louise Eady) | डोरोथी बचपन से ही थोड़ी नटखट और शरारती थी | एक बार, जब वह मात्र तीन वर्ष की थी, घर की सीढ़ियों से उसका पैर फिसला और काफ़ी ऊंचाई से लुढ़कते हुए नीचे गिरी |

दुर्योग कुछ ऐसा रहा कि जिन डॉक्टर को बुलाया गया था वो थोड़ी देर से आये | आने के बाद उन्होंने डोरोथी का निस्तेज शरीर देखा, नब्ज़ की जाँच की और उसे मृत घोषित कर दिया | परिवार को रोता हुआ छोड़कर डॉक्टर थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर आये और दूसरे कमरे में नर्स को कुछ आवश्यक निर्देश देने के बाद वापस उस कमरे में लौटे, तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी | डोरोथी ने आँखे खोल दी थी और अपने परिवार के बीच में खुद को पा कर मुस्कुरा रही थी |

वो पूरी तरह चैतन्य और स्वस्थ थी | डॉक्टर ने दो बार जांच की और आश्चर्यचकित हो कर वापस लौट गया | लेकिन इस हादसे के बाद से डोरोथी के स्वभाव में विचित्र तरह के परिवर्तन दिखाई देने लगे | वह अपने घर में अक्सर कुर्सी, मेज के नीचे या किसी फर्नीचर के पीछे छिपी रहती | अपने माता-पिता से अपने घर जाने की जिद करती | बेचारे माता-पिता ये समझ ही नहीं पाते कि डोरोथी किसके घर जाने की जिद कर रही है |

उसके अन्दर फॉरेन एक्सेंट सिंड्रोम के लक्षण उभरने लगे | ये एक दुर्लभ चिकित्सकीय अवस्था होती है जिसमे रोगी के अन्दर एक ऐसी भाषा के बोलने और उच्चारण करने के लक्षण प्रगट होने लगते हैं जो उसकी मात्र-भाषा नहीं होती बल्कि कोई विदेशी भाषा होती है | इन सब के चलते डोरोथी को अपने प्रारंभिक जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा |

उसकी, सन्डे स्कूल (ये इसाई धर्म की शिक्षाओं का विद्यालय होता है) की अध्यापिका ने उसके माता-पिता से उसकी शिकायत की और उसे कक्षाओं से दूर रखने की सलाह दी | कारण पूछने पर उनको बताया गया कि डोरोथी ने ईसाई धर्म की तुलना, हीथेन (Heathen) नाम के प्राचीन मिस्र के धर्म से कर दी थी जो की मूर्तिपूजक होते थे | थोड़ा बड़े होने पर उसे दुल्विच गर्ल्स स्कूल (Dulwich Girls School) से एक दिन बाहर कर दिया गया क्योकि उस दिन उसने ईश्वर के उस भजन को गाने से मना कर दिया था जिसमे, स्वार्थी और द्वेषपूर्ण मिस्रियों को ईश्वर से श्राप देने की प्रार्थना की गयी थी |

एक दिन डोरोथी, अपने माता-पिता के साथ ब्रिटिश म्यूजियम (British Museum) देखने गयी | थोड़ी देर तक घूमने के बाद वो अपने परिवार के साथ, म्यूजियम के उस हिस्से में पहुंची जहाँ मिस्र के इतिहास से सम्बंधित वस्तुएं रखी थी | अचानक से न जाने क्या हुआ कि, सब कुछ देख कर डोरोथी ख़ुशी से पागल हो गयी और घूम-घूम कर कभी इस मूर्ती के पैर चूमती कभी उस मूर्ती को प्रणाम करती और एक ममी को देख कर तो लिपट कर रोने लगी |

और फिर एक मंदिर के बड़े से चित्र को देखकर ख़ुशी से उछल पड़ी, उसने पीछे मुड़कर अपने माता-पिता से लगभग चिल्लाते हुए कहा “देखो वो है मेरा घर,…लेकिन ये क्या वो बगीचे कहाँ हैं…..और…..वो विशालकाय पेड़” | डोरोथी नहीं जानती थी कि जिस समय की वो बात कर रही थी, उस समय का सब कुछ, सिवाय उस मंदिर के, रेत में दफ़न हो चुका था | अब तक उसकी आवाज़ में भी परिवर्तन आ चुका था, उसकी आवाज़ थोड़ी भारी लग रही थी | अब वो चीखती तो ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई युवा औरत कुछ कह रही हो |

डोरोथी के पिता ने उस मंदिर को ध्यान से देखा, वो मंदिर “सेती” प्रथम (Seti-I) का था जो की महान फ़राओ शासक “रामेसस” (Rameses) के पिता थे | उस दिन उसके माता-पिता बड़ी मुश्किल से उसको संभाल कर घर ला पाए | अगले दिन, थोड़ा सामान्य होने पर, डोरोथी ने अपने माता-पिता को बताया कि वो सेती -प्रथम को जानती थी, वो एक बहुत ही नेक और दयालु इन्सान था |

मिस्र के इतिहासकार बताते हैं कि सेती के पिता “रामेसस-प्रथम” (Rameses-I) थे और उनकी माँ का नाम सित्र (Sitre) था | सेती के माता-पिता का नाम, हिन्दू धर्म के भगवान राम और उनकी अर्धांगिनी माँ सीता के नामों से मिलता-जुलता नाम लगता है, कोई आश्चर्य नहीं कि प्राचीन मिस्र का धर्म, वैदिक धर्म से प्रेरित रहा हो | सेती के पुत्र का नाम “रामेसस-द्वितीय” (Rameses-II) था | यह मिस्र के महानतम सम्राटों में से एक था | कहीं-कहीं इसे Rameses the Great भी कहा जाता है | यह उन्नीसवें राजवंश का तीसरा फ़राओ शासक था |

इस घटना के बाद से डोरोथी, ब्रिटिश म्यूजियम जाने का कोई भी मौका हाँथ से जाने नहीं देती | वहां उसकी मुलाकात इ. ए. वालिस (E. A. Wallis) से हुई | वालिस ने युवा डोरोथी के उत्साह को देखते हुए उसे प्राचीन मिस्र की लिपि सीखने को प्रेरित किया | जिस तेजी और आसानी से उसने उस कठिन भाषा पर अधिकार पा लिया, उसे देख कर तो वालिस भी दंग रह गये | उसने अपनी इस उपलब्धि को ये कहकर टाल दिया कि यह उसके लिए कोई नई भाषा नहीं थी बल्कि वो तो केवल अपनी पुरानी यादों को ताज़ा कर रही थी |

1931 में डोरोथी मिस्र चली आयी | यहाँ उसने यहीं के एक स्थानीय निवासी इमाम अब्देल मेगुइड (Emam Abdel Meguid) से विवाह कर लिया | इमाम से वो लन्दन में ही मिल चुकी थी जब वो Egyptian Public Relations मैगज़ीन के लिए आर्टिकल लिखती थी और कार्टून बनाती थी | उसने अपने एकमात्र पुत्र का नाम ‘सेती’ रखा था और अपना नाम उसने डोरोथी से बदल कर ‘ओम सेती’ (Om Seti) रख लिया था | प्राचीन मिस्र की भाषा में इस नाम का मतलब होता है ‘सेती की माँ’ |

डोरोथी में सर्पों को आकर्षित करने और उन्हें सम्मोहित करने की जबरदस्त क्षमता थी, जो की प्राचीन मिस्र में मंदिर के पुजारियों और धार्मिक अनुष्ठान कराने वालों के लिए आम बात थी | क्लाउस बेयर (Klaus Baer) उसकी धार्मिकता का ज़िक्र करते हुए बताते हैं की कैसे उसने एक बार सक्कर में उनास के पिरामिड में प्रवेश करने के पहले अपने जूतों को बाहर निकाल दिया था |

वो लगातार एक अदृश्य परछाईं दिखने की बात कहती थी और इस दौरान उसे अक्सर अपने शरीर से बाहर होने का अनुभव होता | उसके इन अतीन्द्रिय अनुभवों की वजह से कभी-कभी उसके पारिवारिक जीवन में टकराव की स्थिति पैदा हो जाती | मिस्र में रहने के दौरान, शुरुआत के दिनों में उसे अक्सर रात्रि में, स्वप्नावस्था में चलते हुए देखा गया | उसने बताया कि इस दौरान उसे मिस्र के देवता Hor-Ra की परछाईं दिखती थी | उन्होंने डोरोथी को धीरे-धीरे उसके पूर्व जन्म का सारा वृत्तान्त सुनाया | पूरी कथा लगभग 70 पेज की प्राचीन मिस्री भाषा में लिपिबद्ध है |

ये कथा है प्राचीन मिस्र की एक युवा स्त्री की जिसका नाम था बेन्त्रेषित (Bentreshyt) | बेन्त्रेषित का पुनर्जन्म होता है डोरोथी लुइस एडी (Dorothy Louise Eady) के रूप में | बेन्त्रेषित (जिसका प्राचीन मिस्री भाषा में अर्थ होता है ‘खुशियों की वीणा’) की माँ एक सब्जियों की विक्रेता थी और पिता एक सैनिक थे | जब वह मात्र तीन वर्ष की थी तो उसकी माँ का देहांत हो गया | पिता ने अकेले पुत्री का पालन-पोषण करने में अपने को असमर्थ पाया तो उसका दाखिला मंदिर में करा दिया | बेन्त्रेषित अब मंदिर के प्रशासन की देख-रेख में बड़ी होने लगी |

थोड़ा बड़ी होने पर उसे मंदिर में पुजारिन का पद मिला | जब वो मात्र बारह वर्ष की थी तो मंदिर के वरिष्ठ पुरोहित ने उससे कहा कि अब वो चाहे तो बाहरी दुनिया में जा सकती है और चाहे तो आजीवन कुंवारी रह कर ईश्वर की आराधना में अपना जीवन व्यतीत कर सकती है | बेन्त्रेषित की आयु अभी कम थी इन सारी चीजों को समझने के लिए लेकिन फिर भी उसने शपथ ले ली | अगले दो वर्ष में उसने वहां होने वाले वार्षिक समारोह में ‘ओसिरिस के पुनुरुज्जीवन’ की नाट्य रचना में देवी आइसिस (Isis) की भूमिका निभाना शुरू  कर दिया था, ये वो भूमिका थी जिसे केवल आजीवन कुंवारी रहने वाली पुजारिन, जिसने अपना जीवन देवी आइसिस को समर्पित कर दिया हो, ही निभा सकती थी |

एक दिन जब सेती प्रथम इस समारोह में था उसने बेन्त्रेषित के अभिनय को देखा और उस पर मुग्ध हो गया | आने वाले समय की कुछ मुलाकातों में दोनों एक दूसरे के प्रेम-पाश में बांध गए | लेकिन इस बात की खबर न तो दुनिया को थी और न ही मंदिर प्रशासन को | कुछ समय बाद जब बेन्त्रेषित गर्भवती हो गयी तो वरिष्ठ धर्माधिकारी अत्यंत क्रोधित हुए | उनके पूछने पर बेन्त्रेषित ने बताया की इस बच्चे के पिता सेती प्रथम हैं | धर्माधिकारी ने उसे बताया की उसका अपराध इतना बड़ा है कि उसकी पहली सज़ा ही मौत है | इतना सम्मान पा जाने के बाद, समाज में कलंकित होने के भय से अंततः बेन्त्रेषित ने आत्महत्या कर ली | इससे पहले की सेती कुछ कर पाता, बेन्त्रेषित ने दुनिया को अलविदा कह दिया था |

डोरोथी के पारिवारिक जीवन में समस्याएँ बढ़ती ही जा रही थी | अंततः 1935 में उसने अपने पति इमाम से अलग रहने का फ़ैसला कर लिया और आजीविका के लिए इराक़ में एक अध्यापक की नौकरी कर ली | उसका पुत्र सेती उसके साथ ही था | दो वर्ष बाद उनका विवाह टूट गया और वो अपने पुत्र के साथ गीज़ा के पिरामिड के निकट नज़लत-अल-सम्मन चली गयी | वहां उसकी मुलाकात मिस्र के पुरातत्व विभाग के अर्कियोलोजिस्ट सलीम हसन से हुई | सलीम ने डोरोथी की प्रतिभा को देखते हुए उसे अपना सचिव नियुक्त कर लिया |

कहते हैं की अपने प्राचीन मिस्री भाषा एवं साहित्य के अप्रतिम ज्ञान एवं अपनी रहस्यमय क्षमताओं से उसने कई तत्कालीन पुरातत्ववेत्ताओं की सहायता की | हसन ने अपने कार्य “गीज़ा की खुदाई” के दसवें भाग में विशेष रूप से डोरोथी का आभार व्यक्त किया और अपनी कृतज्ञता दिखाई | इस दौरान डोरोथी अक्सर रात्रि का समय गीज़ा के पिरामिड में ही व्यतीत करती और मिस्र के देवताओं से अपनी आत्मा को मुक्त करने की प्रार्थना करती | पिरामिड में रात्रि के समय में पूजा करने और होरस तथा स्फिंक्स महान जैसे देवताओं से अपनी आत्मा की मुक्ति की प्रार्थना करने की वजह से वह स्थानीय निवासियों में चर्चा का विषय बन गयी थी |

हाँलाकि स्थानीय लोग, कुछ हद तक उसकी सच्चाई जानते थे और उसका काफ़ी सम्मान करते थे | 1956 के शुरुआत में ही वो पिरामिड रिसर्च प्रोजेक्ट समाप्त हो गया जिसमे डोरोथी नौकरी कर रही थी | अब उसके सामने आजीविका की फिर से समस्या थी | ऐसे समय उसके पास दो नौकरियों के प्रस्ताव आये | एक, मिस्र की राजधानी काहिरा में अच्छे वेतन की नौकरी का विकल्प था और दूसरी वही सहायक के पद की, कम वेतन वाली, नौकरी जो एबिडोस (Abydos) में थी |

उसने एबिडोस में सहायक के पद की नौकरी को चुना क्योकि एबिडोस उसके लिए विशेष मायने रखता था | उसने बताया था कि एबिडोस वही जगह थी जहाँ कभी बेन्त्रेषित रहती थी | 3 मार्च 1956 को ‘ओम सेती’ यानि डोरोथी ने एबिडोस के लिए प्रस्थान किया | वहाँ उसने अराबेत एबिडोस (Arabet Abydos) में अपना घर बनाया | आज के आधुनिक एबिडोस और रेगिस्तान के बीच का स्थान, जो की पश्चिम में चूना पत्थर के पर्वत तक फैला हुआ है, प्राचीन मिस्र के चकित कर देने वाले पुरावशेषों से भरा पड़ा है |

आस-पास के गाँवों से घिरा हुआ वो पर्वत अद्भुत अर्ध-चन्द्र का आकार लिए हुए है | और इसके बीचो-बीच एक खाली स्थान है जिसके बारे में मान्यता है कि प्राचीन मिस्र के लोग यहाँ से सीधे ‘मृतकों के साम्राज्य’ (Kingdom of Dead) से जुड़ जाते थे | डोरोथी ने इसी पर्वत के पास अपना घर बनाया था | प्राचीन मिस्र के लोग मानते थे कि ये पर्वत मृतकों की आत्माओं का वो निवास स्थान था जहाँ देवता ओसिरिस उनके कर्मों के अनुसार उनका भाग्य तय करते थे | अच्छे कर्म वाली आत्माओं को, सुख-सुविधा युक्त उच्च लोकों में और दुष्ट तथा घृणित कर्म वाली आत्माओं को कई तरह के नर्कों में भेजा जाता |

यहाँ के स्थानीय लोगों ने डोरोथी को ‘ओम सेती’ कहना शुरू कर दिया था क्योकि प्राचीन मिस्र में रिवाज़ था कि किसी स्त्री को अक्सर उसके ‘सबसे बड़े बेटे की माँ’ कहकर पुकारा जाता था | ये रिवाज़ भारत वर्ष में भी कही-कहीं देखने को मिलता है | सन 1964 में जब डोरोथी साठ वर्ष की हो चुकी थी, मिस्र के पुरातत्व विभाग ने उसे स्वयं से सेवानिवृत्ति लेने को कहा और काहिरा में एक अंशकालिक नौकरी का प्रस्ताव दिया | वो काहिरा गयी भी लेकिन एक दिन रहकर ही वापस एबिडोस लौट आई |

पुरातत्व विभाग ने केवल डोरोथी के लिए अपने नियमो में बदलाव किये और उसके लिए सेवानिवृत्ति की उम्र पांच साल और बढ़ा दी | 1969 में सेवानिवृत्ति होने पर विभाग ने उसकी पेंशन 30 डॉलर प्रति माह निर्धारित की | सन 1969 से 1975 तक डोरोथी ने कई सारे आर्टिकल्स लिखे जिसमे उसने प्राचीन समय के कई रीति-रिवाजों का उल्लेख किया जो आज भी अलग-अलग सभ्यताओं में किसी-न-किसी रूप में देखने को मिलते हैं लेकिन उन सब का यहाँ विवरण देना संभव नहीं |

1972 में ओम सेती को एक हल्का हार्ट-अटैक आया उसके बाद उसने अपने पुराने घर को बेच दिया और सेती के मंदिर के बिलकुल पास ही एक साधारण से घर में रहने लगी | वह अपनी डायरी में लिखती है कि जिस दिन उसने पहली बार अपने नए घर में प्रवेश किया उसी रात उसके कमरे में सेती-प्रथम प्रगट हुआ | सेती ने डोरोथी (पूर्व जन्म की बेन्त्रेषित) के साथ ओसिरिस और आइसिस की मूर्तियों (जिसे डोरोथी ने एक छोटी सी जगह पर थोड़ी ऊंचाई पर रखा था) को प्रणाम किया और उस घर में उनको प्रतिष्ठित किया | इसके बाद सेती ने उससे कई सारी बातें की |

सेती ने बताया कि उसने केवल एक बार देवता ‘सेत’ (जिनके नाम पर उसका नाम रखा गया) को देखा था | उसने बताया कि मिलने से पहले उसने दस दिनों तक उपवास रखा था और अंतिम दिन जब वो अपने उपासना गृह में प्रवेश किया तो वहां उसे एक अद्वितीय और अलौकिक प्रकाश के साथ सेत देवता के दर्शन हुए | सेती ने बताया वो ऐसा दृश्य था जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था |

अपने अंतिम दिनों में ओम सेती

प्राचीन मिस्र में सेत बुराई का देवता था | दुनिया में फ़ैली हर प्रकार की निर्दयता और संहार शक्ति का देवता था सेत | फिर सेती ने पश्चाताप करते हुए डोरोथी से कहा “जीवन में कभी संहारक शक्तियों की पूजा नहीं करनी चाहिए और ना ही कभी उनकी भक्ति करनी चाहिए,….भले ही संसार में उनका कितना भी महिमामंडन हुआ हो” |

आने वाले हफ़्तों में सेती ने कई बार डोरोथी को दर्शन दिए लेकिन उन मुलाकातों में होने वाली बातचीत का विवरण डोरोथी ने कहीं नहीं दिया है | उस समय के लगभग सभी प्रमुख और मशहूर मिस्र के इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता जैसे लेनी बेल (Lanny Bell), जॉन रोमर (John Romer) और शिकागो हाउस के विलियम मुर्नेन (William Murnane), उसके पास जाना और उससे प्राचीन मिस्र की बातें सुनना पसंद करते थे | वे उसके लिए कई तरह के उपहार भी ले जाते थे |

सन 1979 में कनाडा, राष्ट्रीय फिल्म बोर्ड के निकोलस किनडल (Nicholas Kendall) मिस्र आये | वो एक वृत्तचित्र फिल्म “The Lost Pharaoh: The Search for Akhenaten” बना रहे थे | उन्होंने ओम सेती से अनुरोध किया कि वे भी उस वृत्तचित्र का हिस्सा बने लेकिन ओम सेती ने इसमें अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई | उसने बताया कि वो (सेती) अखेनाटन को पसंद नहीं करता था | उसके अनुसार अखेनाटन एक ही दिशा में सोचने वाला व्यक्ति था |

इससे पहले 1970 में एक बार ओम सेती ने बताया था कि उसे पता है कि नेफेर्तिती का मक़बरा ज़मीन के अन्दर कहाँ पर है लेकिन फिर लोगों के पूछने पर उसने ‘उस अविश्वसनीय जगह’ का खुलासा करने के प्रति अपनी अनिच्छा जता दी थी | उसने कहा था कि “हम (मै और सेती) नहीं चाहते कि उस परिवार (अखेनाटन और नेफेर्तिती) के बारे लोगों को और पता चले”| ओम सेती ने एक बार कहा था कि “मुझे मौत से डर नहीं लगता…ना ही तब लगा था और ना ही अभी लगता है…मै बस अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ करना चाहती हूँ क्योकि मैंने पिछली बार आत्महत्या करके बड़ा पाप किया था” |

अक्टूबर 1980 में BBC से जूलिया केव (Julia Cave) और उनकी टीम एक वृत्तचित्र “Omm Sety and Her Egypt” बनाने एबिडोस पहुंची | जिस समय इसकी शूटिंग चल रही थी उसी समय एक अमेरिकन फिल्म निर्माता जो नेशनल जियोग्राफिक चैनल (National Geographic Channel) के लिए एक वृत्तचित्र “Egypt: Quest for Eternity” बना रहा था, उसने ओम सेती से अपनी वृत्तचित्र का हिस्सा बनने का अनुरोध किया | ये वृत्तचित्र सेती प्रथम के पुत्र रामेसस द्वितीय पर आधारित थी | इस वृत्तचित्र की शूटिंग मार्च 1981 में हुई, संयोगवश उसी महीने ओम सेती ने अपने जीवन के 77 वर्ष पूरे किये | उसके जन्मदिन की पार्टी शिकागो हाउस में चल रही थी जिसका फिल्मांकन इस वृत्तचित्र में भी हुआ है |

उस समय ओम सेती काफ़ी दर्द में थी लेकिन चेहरे पर उसने हमेशा मुस्कान बनाये रखी | फिल्म यूनिट के सदस्यों ने उसके साथ सेती के मंदिर की शूटिंग पूरी की | कहते हैं कि इस बार उसके कदम उस मंदिर में आखिरी बार पड़े थे जिसमे उसने तीन हज़ार साल पहले बेन्त्रेषित के रूप में अपने जीवन की अनमोल यादों को समेटा था | 21 अप्रैल 1981 को ओम सेती इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गयी…उस दुनिया के लिए जहाँ वो ‘अपनों’ से मिलने वाली थी |





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