तो क्या हिटलर के रहस्यमय एलियंस से सम्बन्ध थे


die_glocke_the_nazi_bellहिटलर की जीते जी वो तथाकथित गुप्त हथियार कभी अस्तित्व में न आ सका | विटकोवस्की ने बताया, पहली बार अगस्त १९९७ में एक अज्ञात पोलिश व्यक्ति ने उस तथाकथित दस्तावेज़ की प्रतिलिपि उसको उपलब्ध कराई | उसने एक पूर्व नात्ज़ी सीक्रेट सोसाइटी (SS) ऑफिसर जैकब स्पोरेनबर्ग का ज़िक्र किया जिससे पूछताछ में उसे पहली बार डी ग्लोके का नाम पता चला | ऐसा कहा जाता है कि डी ग्लोके एक तरह का टेक्नोलॉजिकल डिवाइस था जो की एक बहुत ही कठोर और भारी धातु का बना था | लगभग १२ से १५ फीट लम्बा और ९ फीट चौड़ा वो डी ग्लोके दिखने में एकदम किसी मंदिर के बड़े से घंटे जैसा था | विटकोवस्की ने अपने एक साक्षात्कार में कुक को बताया कि प्रगट रूप से इस डिवाइस में दो, एक दूसरे की विपरीत दिशा में घुमने वाले, सिलेंडर लगे हुए थे जो की एक एक पारे जैसे द्रव्य से भरे हुए थे | ये रहस्यमय द्रव्य बैगनी रंग का था | इस धातु-द्रव का कूट नाम (Code Name) Xerum-525 था। जितने अतिरिक्त पदार्थ (जिनमे थोरियम एवं बेरिलियम के पैराकसाइड भी थे) इस एक्सपेरिमेंट में प्रयुक्त होने थे उनको हलकी धातुएं कहा गया | विटकोवस्की ने बताया कि डी ग्लोके जब एक्टिवेट (सक्रिय) होता था तो उसका प्रभाव क्षेत्र उसके आस-पास ४९० फीट से लेकर ६६० फीट तक होता था | इस प्रभाव क्षेत्र के भीतर, डी ग्लोके के सक्रिय होने के बाद, क्रिस्टल पिघल कर जैवीय उतकों में बदल जाते, शरीर के अन्दर का रक्त गाढ़े थक्कों में बदल कर अलग-अलग हो जाता और पौधे विघटित होकर एक ग्रीस जैसे गाढ़े चिपचिपे पदार्थ में बदल जाते |

विटकोवस्की ने आगे यह भी जोड़ा कि इस रहस्यमय प्रयोग पर काम करने वाले सात प्रमुख वैज्ञानिकों में से पांच वैज्ञानिको की खौफनाक मौत इन्ही प्रयोगों के दौरान हुई। डी ग्लोके का क्या हुआ ? वो पूरी तरह से कभी बन पाया या नहीं ? और इस पुरे प्रयोग में इस्तेमाल हो रही अद्भुत टेक्नोलॉजी क्या पर-ग्रही थी ? ये सब कुछ आज भी रहस्य है |

एक नए खुलासे में फिर ये पता चला है कि हिटलर दूसरी दुनिया के जीवों के संपर्क में था | यही नहीं वो ऐसे एयरक्राफ्ट बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा था जो यू. एफ. ओ. की तकनीकि से बना हो और पूरी दुनिया में उसकी कोई काट न हो | इन सब काम को अपने अंजाम तक पहुचाने में हिटलर की “सीक्रेट सोसाइटी” अपने पूरे जी जान से जुटी थी |

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