महाभारत कालीन असीरियन सभ्यता का रहस्य


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फ्रेडरिक मायेर्स (Fredric W. H. Myers), इंग्लैंड की साईंकिकल रिसर्च सोसाइटी के संस्थापकों में से एक थे | उन्होंने परामनोविज्ञान पर काफी शोध किया, विशेष रूप से ‘अवचेतन मन, इसकी कार्यविधि तथा संभावनाओं’ पर कार्य किया |

यद्यपि मुख्य धारा के वैज्ञानिकों ने उनके कार्यों को कभी स्वीकार नहीं किया लेकिन तत्कालीन समाज के विद्वानों (विशेष रूप से परामनोवैज्ञानिकों) में उनके शोधकार्यों का काफी प्रभाव था |

इन्होने अपनी पुस्तक ‘Human Personality’ (मानवीय व्यक्तित्व) में एक विचित्र एवं चकित कर देने वाली घटना का ज़िक्र किया है जो प्राचीन ऐतिहासिक पात्रों के असंदिग्ध होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है |

उस घटना के अनुसार आज से चार से पाँच हज़ार वर्ष पूर्व (महाभारत काल में) पश्चिम एशिया में, जहाँ आज ईराक़, ईरान, टर्की, जॉर्डन आदि देश हैं वहाँ, असीरिया नाम का साम्राज्य था | वहाँ के निवासियों को असीरियन कहा जाता था |

असीरिया की राजधानी बेबीलोन (Babylon) थी | आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार असीरियन लोग बहुत क्रूर हुआ करते थे | युद्धबंदियों को वो हाँथ-पैर बाँध कर लोहे के पिंजड़ों में बंद कर देते थे फिर उनके साथ अमानवीय बर्ताव जैसे उनकी आँखें फोड़ देना, उनका अंग-भंग कर देना, इत्यादि वहां के प्रसिद्ध खेल हुआ करते थे और सबसे बड़ी बात इन सब कार्यों में उनके बच्चे भी आनंदित हुआ करते थे और बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे |

खुद को असीरियन लोग ‘असुर’ (Assur) कहा करते थे | ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथो जैसे महाभारत आदि में जिस असुर जाति का उल्लेख मिलता है वो यही थे | उस जगह की खुदाई से प्राप्त अन्य जानकारियाँ भी इसी तरफ इशारा करती हैं | जैसे असीरियन साम्राज्य के प्रसिद्ध राजाओं के नाम, ‘असुर नरम सिन’, ‘असुर नासिरपाल’, ‘असुर बनिपाल’ आदि भारतीय भाषा के नाम जैसे प्रतीत होते हैं |

फ्रेडरिक मायेर्स ने अपनी घटना में हिल प्रेशेट (Hill Pratchett) का ज़िक्र किया है जो पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय (University of Pennsylvania) में असीरियन सभ्यता के प्रोफेसर थे | प्रोफेसर हिल प्रेशेट उस क्षेत्र की खुदाई में निकली कुछ बहुमूल्य वस्तुओं पर शोध-कार्य कर रहे थे जब एक दिन वह रहस्यमय घटना घट गयी |

Assyrian Civilisation-Rahasyamaya

प्रोफेसर हिल के शब्दों में-“ मैं खुदाई में मिली आगेट मणि (गोमेद) पर कार्य कर रहा था | इस मणि के दो खंड थे | इन खण्डों पर अक्षर तथा रेखाएँ खुदी हुईं थीं जो स्पष्ट नहीं हो पा रही थी | मैं इनके स्पष्टीकरण के प्रयास में जी-जान से लगा हुआ था |

मुझे ऐसा लग रहा था कि ये मणियाँ बेबीलोन राज्य के किसी अधिपति के अँगूठी के नग़ के रूप में ज़ड़ी हुई थी जिसका जीवन काल ईसा के जन्म से 1000 वर्ष पूर्व से लेकर 1140 वर्ष पूर्व तक होना चाहिए था | काफी समय तक परिश्रम करने के बाद भी जब गुत्थी नहीं सुलझी तो मणि के एक खंड को मैंने महाराजा ‘कुरिगाल जू’ से सम्बंधित कर दिया और दूसरे खंड को उन वस्तुओं की श्रेणी में डाल दिया जो अनसुलझी थीं |

उसी रात को मैंने एक विचित्र स्वप्न देखा | मुझे स्वप्न में निप्पुर शहर (सुमेरियन सभ्यता का निबिरू शहर) के एक पतले लेकिन लम्बे पुजारी के दर्शन हुए | मैं उस समय उसी काल-खण्ड में पहुँच चुका था |

वो पुजारी मुझे एक मंदिर के कोषागार में ले गए और वहाँ ले जा कर कहा कि “देखो ये दोनों खंड अलग-अलग नहीं हैं, ये एक ही मणि के दो खंड किये गए हैं | महाराजा कुरिगाल जू ने एक बार एक बेलनाकार गोमेदक मणि को बेल देवता के मंदिर में ‘अपनी भक्ति की भेंट के रूप में’ भेजा था जिस पर यही चीज़ खुदी हुई थी |

दैव योग से इसके कुछ समय बाद हम पुजारियों को ये आज्ञा हुई कि ‘निलिब’ देवता के लिए गोमेदक मणि के कुंडल बनवाये जायें | उस समय गोमेदक मणि सुलभ नहीं थी यहाँ | तब हमने उसी मणि के तीन खण्ड कर के तीन कुंडल बना लिए जिन पर पहले से ही अक्षर खुदे हुए थे | यदि तुम तीनों खंडो को मिलाओगे तो मेरे वचन की सत्यता की पुष्टि हो जायेगी” |

स्वप्न से जागने के बाद मैं बड़ी बेसब्री से प्रातः काल की प्रतीक्षा कर रहा था | दूसरे दिन जैसे ही मैंने मणि के दोनों टुकड़ों को आपस में मिलाया, मुझे स्वप्न में मिले पुजारी की बातें यथार्थ समझ में आने लगी | डॉक्टर हिल प्रेशेट ने उसके बाद इस्ताम्बुल, जो उस समय टर्की की राजधानी था, की यात्रा की |

वहाँ के राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) में निप्पुर की खुदाई में निकली वस्तुएँ सुरक्षित थी | उस संग्रहालय से उन्होंने उस गोमेदक मणि के तीसरे खण्ड को प्राप्त किया | उस मणि के तीनो खण्डों को आपस में जोड़ने पर जो शब्द लिखे दिखाई दिए वो इस प्रकार थे “कुरिगाल जू ने बेलपुत्र भगवान निलिब के लिए अर्पण किया” | डॉक्टर प्रेशेट को ऐसा लगा मानो वो पुजारी वही खड़े थे…और उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे |

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