मृतात्मा से संवाद


shadowईश्वरचन्द जी एक सरकारी विभाग में कर्मचारी थे | एक आज्ञाकारी पुत्र और धर्मपत्नी के साथ उनका जीवन सुखमय बीत रहा था | उनकी पत्नी, दूसरी संतान को जन्म देने जा रही थी लेकिन प्रसव के समय परिस्थितियाँ बिगड़ गयी और अनहोनी हो गयी | हॉस्पिटल में ही एक नवजात कन्या को जन्म देने के बाद उनके धर्मपत्नी की मृत्यु हो गयी | कुछ ही घंटे में वह नवजात कन्या भी चल बसी |

जैसा की आजकल अक्सर शिक्षित वर्ग में हो रहा है, दाह-संस्कार से ही अंत्येष्टि कर्म की भी इति श्री हो गयी | ईश्वरचन्द जी (गोपनीयता के अनुरोध की वजह से यहाँ पात्रो के नाम बदल दिए गए हैं) और उनके बेटे का रो रो कर बुरा हाल हो गया था | लेकिन समय हर घाव का मलहम है और फिर ‘उसके’ आगे किसका वश चला है… कुछ दिनों बाद वो लोग भी शांत हो गए और अपने दैनिक क्रिया-कलाप और व्यापार में व्यस्त हो गए | ईश्वरचन्द जी के यहाँ एक नौकर था जो उत्तराखण्ड से था, वो उनके यहाँ काफ़ी समय से था | पहले वह घर की मालकिन की देख-रेख में सबका भोजन बनाता था, अब ईश्वरचन्द जी को उधर भी ध्यान देना पड़ रहा था |

एक दिन छुट्टी का दिन था, दोपहर के भोजन के बाद ईश्वर चन्द जी पत्र लिख रहे थे किसी को, कि अचानक उनका नौकर उल्टियाँ करने लगा फिर खड़ा होकर एकदम से कांपने लगा | उसके चेहरे की आकृति बदल रही थी, थोड़ी सी टेढ़ी हो रही थी | अब वो उनकी मृत धर्मपत्नी के हावभाव और उसी की आवाज़ में बोल रहा था | यह सब देखकर ईश्वर चन्द जी भौचक्के हो कर उसके पास आ गए | उस समय वहां खड़ा हर व्यक्ति ये अच्छे से समझ रहा था कि उनकी धर्मपत्नी उस नौकर के माध्यम से उनसे बात कर रही थी |

मृतात्माउसने कहा “आपने ना तो मेरे नाम से और ना ही अपनी बेटी के नाम से वस्त्र-दान किया | हमदोनो वस्त्र हीन हैं | मुझे बड़ा संकोच होता है और मै यहाँ वटवृक्ष के नीचे पड़ी हूँ | इसलिए आप मेरे लिए और बच्ची के लिए एक-एक जोड़ा कपड़ा किसी वस्त्र-हीन को या निर्धन को हमारे नाम से दे दीजिये” | ईश्वरचन्द जी हड़बड़ा चुके थे, पिछले कुछ सेकंड्स में जो कुछ हुआ वो उनके समझ से परे था, लेकिन उन्होंने तुरंत इन सब के लिए हामी भरी जिससे उनका नौकर एकदम से सामान्य हो गया | उनके नौकर को भी कुछ समझ में नहीं आया कि उसके साथ क्या हुआ |

वस्त्र-दान वाला काम दो-तीन दिन में ही हो गया, इसके कुछ दिन बाद उनके नौकर पर फिर असामान्य आवेश चढ़ा | अबकी बार उनकी धर्मपत्नी ने उनको बताया कि “वस्त्र तो मिल गए हैं लेकिन हम शहर में नहीं जा सकते…क्योकि हमारी गति नहीं हुई है” ईश्वरचन्द जी ने बीच में टोका “जैसा पण्डित ने कहा था मैंने क्रिया-कर्म वैसे ही कराया था, अब मै क्या करूँ ?” पत्नी ने जवाब दिया “उस पंडित को विधि-विधान का ज्ञान नहीं था….आप मेरे लिए हरिद्वार में हरिशर्मा नाम के पंडित से, जो की भीमगोड़ा की बस्ती में रहते हैं, पूजा करवाइए, जैसा वे कहे वैसा करिये” ईश्वरचन्द जी ने तुरंत इन सब के लिए हामी भरी और सब कुछ सामान्य हो गया |

हरिद्वार में ईश्वरचन्द जी के एक मित्र सिन्हा जी रहते थे | उन्होंने सिन्हा जी से संपर्क किया और उनसे भीमगोड़ा की बस्ती में हरिशर्मा नाम के पण्डित जी का पता लगाने का आग्रह किया | सिन्हा जी ने अपने नौकर को इस काम के लिए भेजा | उस नौकर ने सारी जगह पता लगाया, उसे इस नाम का कोई पंडित नहीं मिला | यही उत्तर सिन्हा जी ने अपने मित्र ईश्वरचन्द जी को दे दिया |

shantiइसके कुछ दिनों बाद उस नौकर पर फिर जब आवेश हुआ तो ईश्वरचन्द जी ने वही, अपने मित्र सिन्हा जी वाला, नकारात्मक उत्तर दिया | इसके जवाब में उनकी धर्मपत्नी ने कहा “पण्डित जी वही रहते है लेकिन वे सारा दिन एकांत में किवाड़ बंद किये रहते हैं | शाम को चार बजे के बाद उनसे मिला जा सकता है | उनके घर का दरवाज़ा पूरब मुखी है और इस समय दरवाज़ों पर नीला पोलिश हो रहा है” | इतनी विस्तार से उनकी पहचान मिलने के बाद सिन्हा जी ने कहलवाया कि “पण्डित जी मिल गए हैं और वो उचित कर्मकांड कराने को सहमत भी हो गए हैं” |

ईश्वरचन्द जी, पुत्र सहित हरिद्वार गये और उन पण्डित जी से विधि-विधानपूर्वक कर्मकांड कराकर आ गये | अबकी बार उनकी पत्नी ने कहा कि “अब उनको वहाँ के शहर (इसका नाम उन्होंने प्रेमनगर बताया) में बसने की अनुमति मिल गयी है” ईश्वरचंद जी द्वारा थोड़ा और पूछने पर उन्होंने बताया कि “ये जगह हरिद्वार के आस-पास ही कहीं अन्तरिक्ष में हैं लेकिन मानवीय दुनिया के लोगों के लिए अदृश्य है” | इस घटना के बाद उनकी धर्म पत्नी सप्ताह में एकाध बार उनके घर में आ जाती और बच्चे एवं पति को देख जाती | उन्होंने अपने पति से कहा था कि “तुम्हारे पुत्र और कन्या दोनों संतान है, अब दूसरा विवाह न करना” |

कहने को ये सिर्फ एक घटना है लेकिन इस घटना के कई पहलू हैं जैसे हिन्दू धर्म में मृत्यु की अवधारणा, अंतिम संस्कार और उससे जुड़े विधि-विधान का महत्व, मृत्यु के उपरांत जीवात्मा की गति और विभिन्न मानवेतर लोक और उनकी समय तथा स्थान में स्थिति | हर पहलू पर अलग-अलग भी विचार करें तो भी एक बात अच्छे से समझ में आती है कि हिन्दू-धर्म में ठीक ही लिखा कि ‘मृत्यु’ एक पड़ाव मात्र है उस अंतहीन यात्रा का जिसका आदि और अंत एक ही बिंदु (पॉइंट) है लेकिन जब तक ये बिंदु समझ में नहीं आता तब तक ये यात्रा जारी रहती है…अनवरत जारी रहती है |

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